शामली 30 अक्टूबर 2025
उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले से निकली यह खबर किसी अपराधी के मारे जाने की नहीं, बल्कि सिस्टम की नैतिकता के मारे जाने की कहानी है। यहाँ एक सरकारी डॉक्टर ने वो राज़ खोला है, जिसे अब तक बंद कमरों में दबा दिया जाता था। शामली के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. दीपक चौधरी ने खुलकर कहा है कि पुलिस फर्जी एनकाउंटर करती है और डॉक्टरों पर दबाव डालती है कि वे पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सच्चाई न लिखें। यह सिर्फ़ एक बयान नहीं, बल्कि उस ख़ामोशी का विस्फोट है जो वर्षों से सरकारी अस्पतालों की दीवारों में दबी पड़ी थी।
डॉ. चौधरी का आरोप सीधा और चुभने वाला है। उनका कहना है कि पुलिस कई बार 20 गोलियों से छलनी शव लाती है लेकिन डॉक्टरों को मजबूर किया जाता है कि रिपोर्ट में सिर्फ़ एक गोली की चोट दर्ज करें। यानी मौत के सबूतों को कम कर दिया जाए, ताकि “एनकाउंटर” की कहानी वैध दिखे। उन्होंने कहा कि यह दबाव किसी एक केस में नहीं बल्कि कई बार देखा गया है। शवों के शरीर पर गोलियों के निशान, गनशॉट के चारों ओर कालेपन (blackening) के धब्बे साफ दिखते हैं, जो यह साबित करते हैं कि गोली करीब से चलाई गई — यानी न तो अपराधी भाग रहा था, न गोलीबारी में शामिल था। मगर रिपोर्ट में यह नहीं लिखा जा सकता, क्योंकि पुलिस की “कहानी” पहले से तैयार होती है।
फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने भी टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि इस तरह का ब्लैकनिंग निशान यह दिखाता है कि फायरिंग पॉइंट-ब्लैंक रेंज से हुई थी। इसका मतलब यह है कि व्यक्ति को बहुत पास से मारा गया, जो किसी मुठभेड़ की नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या की पहचान है। लेकिन पुलिस का दावा होता है कि अपराधियों ने पहले गोली चलाई और जवाबी कार्रवाई में मारे गए। यानी कहानी वही, पर सच्चाई हर बार गला घोंट दी जाती है।
यह पूरा मामला तब खुला जब डॉ. चौधरी ने खुद पर हुई चोरी और पुलिस निष्क्रियता की शिकायत की। उनके सरकारी क्वार्टर से ₹5 लाख की चोरी हुई थी, लेकिन पुलिस ने जांच के बजाय उल्टा डॉक्टर से सवाल करने शुरू कर दिए कि “यह पैसा आया कहाँ से?” डॉक्टर ने आरोप लगाया कि चोरी की जांच करने के बजाय पुलिस उन्हें डराने-धमकाने में लगी है ताकि वे फर्जी एनकाउंटर के पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर साइन करते रहें। यह खुलासा सिर्फ़ एक व्यक्ति का व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि सिस्टम की नैतिकता के टूटने का दस्तावेज़ है।
इस बीच, शामली के एसपी एन.पी. सिंह ने सारे आरोपों को “बेसलेस” बताते हुए कहा कि “सभी एनकाउंटर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार होते हैं।” यह बयान सुनने में सधा हुआ लगता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और कहती है। उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर अब शासन की उपलब्धि का प्रतीक बन गया है, जहाँ पुलिसकर्मियों को “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” के तौर पर सम्मानित किया जाता है। सवाल यह है कि क्या यह सम्मान सच्चे अपराधियों के खात्मे का है या सच्चाई के गला घोंटने का?
आज यह सवाल जनता के सामने खड़ा है कि जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसी चिकित्सा दस्तावेज़ों तक को झूठा बनाया जा रहा है, तो न्याय का क्या अर्थ रह गया है? डॉक्टरों पर दबाव डालकर “एनकाउंटर” को वैध ठहराना असल में न्यायपालिका और लोकतंत्र दोनों का अपमान है। जब गोली चलाने वाला ही जांच करने लगे और डॉक्टर को सच्चाई लिखने से रोका जाए, तो देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक संस्थान — न्याय और स्वास्थ्य सेवा — दोनों की आत्मा घायल हो जाती है।
उत्तर प्रदेश की एनकाउंटर नीति अब सिर्फ अपराध नियंत्रण का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रदर्शन का उपकरण बन चुकी है। जिस राज्य में “एनकाउंटर” तालियों के साथ और “सवाल पूछना” अपराध माना जाने लगे, वहाँ सच धीरे-धीरे मरने लगता है। और जब सच की लाश का भी पोस्टमार्टम झूठ से भरा हो, तो समझ लीजिए —
यह सिर्फ़ एक फर्जी एनकाउंटर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के दिल पर चली गोली है।




