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रूसी तेल पर सच्चाई उजागर: जामनगर में तीन हफ्ते से नहीं आया क्रूड

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आलोक कुमार | नई दिल्ली 6 जनवरी 2026

झूठी रिपोर्ट पर रिलायंस का कड़ा जवाब

भारत की ऊर्जा नीति को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। देश की सबसे बड़ी रिफाइनरी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की जामनगर रिफाइनरी ने साफ कर दिया है कि पिछले करीब तीन हफ्तों से वहां रूसी तेल का एक भी कार्गो नहीं आया है और जनवरी में किसी भी रूसी कच्चे तेल की डिलीवरी की कोई संभावना नहीं है। यह खुलासा उन तमाम दावों के बिल्कुल उलट है, जिनमें कहा जा रहा था कि रूसी तेल से लदे जहाज़ भारत की ओर बढ़ रहे हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने एक तीखे बयान में ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट को “खुले तौर पर झूठा” बताया है। कंपनी ने कहा कि जनवरी में रूसी तेल खरीदने या मंगाने का कोई समझौता नहीं है, इसके बावजूद ऐसी खबरें प्रकाशित की गईं, जिससे कंपनी की छवि को नुकसान पहुंचा। रिलायंस ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें इस बात का गहरा दुख है कि खुद को निष्पक्ष पत्रकारिता का प्रतीक बताने वाले संस्थान ने कंपनी के खंडन को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया।

मोदी सरकार की नीति पर गंभीर सवाल

यह मामला सिर्फ एक कंपनी या एक रिपोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे मोदी सरकार की विदेश और ऊर्जा नीति पर सवाल खड़े करता है। महीनों तक सरकार ने यह संदेश दिया कि भारत “राष्ट्रीय हित” में रूस से तेल खरीद रहा है और किसी दबाव में नहीं झुकेगा। लेकिन अब जब देश की सबसे बड़ी रिफाइनरी में रूसी तेल की सप्लाई रुक चुकी है, तो सवाल उठता है—क्या भारत ने चुपचाप अमेरिकी दबाव में अपनी नीति बदल दी? अगर ऐसा है, तो फिर देश को सच क्यों नहीं बताया गया?

डोनाल्ड ट्रंप ने जिस बात की ओर इशारा किया, वही सच निकला

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही यह दावा कर चुके थे कि भारत रूसी तेल की खरीद कम करेगा। उस वक्त इसे राजनीतिक बयान या चुनावी शोर बताया गया, लेकिन अब हालात बता रहे हैं कि ट्रंप ने सही मायनों में पोल खोल दी। जामनगर रिफाइनरी का बयान इस बात का ठोस संकेत है कि भारत ने रूसी तेल से दूरी बनानी शुरू कर दी है—वह भी बिना किसी आधिकारिक स्वीकारोक्ति के।

“विश्वगुरु” नैरेटिव पर करारा तमाचा

मोदी सरकार लगातार खुद को वैश्विक मंच पर एक मज़बूत और स्वतंत्र फैसले लेने वाला नेतृत्व बताती रही है। लेकिन यह घटनाक्रम उस “विश्वगुरु” नैरेटिव को गहरा झटका देता है। अगर फैसले वाकई स्वतंत्र थे, तो फिर नीति में बदलाव छिपाकर क्यों किया गया? और अगर दबाव में बदलाव हुआ, तो फिर देश को भरोसे में क्यों नहीं लिया गया? सच्चाई यह है कि बड़े-बड़े भाषणों और मंचों के पीछे नीति और व्यवहार में गहरा फर्क साफ दिख रहा है।

मीडिया, बाजार और जनता—सबको गुमराह किया गया?

गलत खबरें सिर्फ कंपनी की छवि नहीं बिगाड़तीं, बल्कि बाज़ार, निवेशकों और आम जनता को भी भ्रम में डालती हैं। तेल जैसे संवेदनशील सेक्टर में एक झूठी रिपोर्ट शेयर बाज़ार से लेकर अंतरराष्ट्रीय रिश्तों तक असर डालती है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ पत्रकारिता की चूक थी, या किसी बड़े नैरेटिव को बनाए रखने की कोशिश?
आज असली सवाल यह नहीं है कि रूसी तेल आया या नहीं। असली सवाल यह है कि मोदी सरकार देश से सच क्यों छिपा रही है? अगर नीति बदली है तो खुलकर क्यों नहीं कहा गया? डोनाल्ड ट्रंप का बयान अब मज़ाक नहीं, बल्कि हकीकत बनता दिख रहा है। और इस हकीकत ने बता दिया है कि ज़मीन पर फैसले कुछ और हैं, जबकि मंचों से कहानी कुछ और सुनाई जाती है।

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