अशोक कुमार पांडे | नई दिल्ली 17 नवंबर 2025
आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास का कोई भी साधारण विद्यार्थी यह समझ सकता है कि कांग्रेस की विचारधारा किसी एक नारे, एक नीति या किसी एक व्यक्ति की वैचारिक छाप तक सीमित नहीं है। यह विचारधारा भारतीय सभ्यता, उसकी विविधता, सामाजिक वास्तविकताओं और स्वतंत्रता संग्राम की सामूहिक चेतना से निर्मित हुई है। इसकी जड़ें पश्चिमी राजनीतिक सिद्धांतों से कम और भारतीय सांस्कृतिक अनुभवों, आध्यात्मिक परंपराओं और सामाजिक सुधार आंदोलनों से अधिक पोषित हैं। इसलिए कांग्रेस की विचारधारा का मूल आधार “सहअस्तित्व”—Peaceful Co-existence—है, जिसे महात्मा गांधी, नेहरू, विनोबा भावे, आचार्य कृपलानी, पंडित मालवीय और अनगिनत नेताओं ने देश की आत्मा में रोपित किया।
कांग्रेस सांप्रदायिकता का उत्तर पश्चिमी सेकुलरिज़्म की तर्ज़ पर नहीं देती थी, जहाँ धर्म को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने पर जोर दिया जाता है। भारतीय संदर्भ में धर्म सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना का अभिन्न तत्व है, इसलिए कांग्रेस ने इसका भारतीय समाधान दिया—‘सर्व धर्म समभाव’, जिसका अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान। क्योंकि इस विचार की कोई सीधी पश्चिमी शब्दावली नहीं थी, इसलिए इसे ‘सेकुलरिज़्म’ कह दिया गया, लेकिन इसकी आत्मा भारतीय थी। यह विचारधारा धर्म को हटाने की नहीं, धर्मों को समान ऊँचाई देने की थी। यही वजह है कि भारत ‘धर्मनिरपेक्ष’ कम और ‘धर्म-सम्मान आधारित’ अधिक लोकतंत्र है—जो विविधता को दमन नहीं, आत्मसात करके आगे बढ़ता है।
आर्थिक सिद्धांतों के मामले में भी कांग्रेस ने किसी उग्र क्रांति, हिंसक उथल-पुथल या पूंजीवादी छलांग की ओर नहीं देखा। कांग्रेस का आर्थिक मॉडल हमेशा Gradual Reform और Inclusive Progress पर आधारित रहा। इसका केंद्र ‘अंत्योदय’—पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति का उत्थान—था, जिसे विनोबा भावे की धारणाओं, गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत और नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था में समाहित किया गया। भारत जैसे विविध, विषम और जटिल सामाजिक संरचना वाले देश में यह रास्ता उग्र बदलावों की तुलना में अधिक स्थिर और दीर्घकालिक माना गया। कांग्रेस के आर्थिक चिंतन का यह पहलू दिखाता है कि वह केवल विकास की बात नहीं करती, बल्कि समतामूलक विकास की बात करती है।
जाति उन्मूलन पर कांग्रेस का दृष्टिकोण भी व्यवहारिक और भारतीय संरचना के अनुकूल था। उसने जातियों को एक झटके में समाप्त करने का दावा कभी नहीं किया, बल्कि जाति से जुड़े भेदभाव, असमानताओं और कुरीतियों को धीरे-धीरे समाप्त करने तथा योग्यतानुसार सभी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया। यह दृष्टिकोण आदर्शवादी कम और व्यावहारिक अधिक था—यह स्वीकार करता था कि जातीय पहचानें मिटाए जाने योग्य नहीं, बल्कि परिवर्तित और समरस किए जाने योग्य हैं। इसलिए सामाजिक न्याय का रास्ता संघर्ष से कम और भागीदारी से अधिक होकर उभरता दिखा।
और राष्ट्रवाद—कांग्रेस का राष्ट्रवाद किसी एक धर्म, एक भाषा या एक क्षेत्र के ऊपर आधारित नहीं था। यह राष्ट्रवाद व्यापक था, सर्व-समावेशी था, जिसमें तमिलनाडु से लेकर कश्मीर तक, नागालैंड से लेकर गुजरात तक, हर पहचान को सम्मान दिया गया। यह राष्ट्रवाद ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ या ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की तरह संकुचित नहीं था। यह एक आधुनिक, बहुलतावादी, नागरिक राष्ट्रवाद (Civic Nationalism) था, जिसने भारत को एक विचारधारा, एक संविधान और एक साझा भविष्य की डोर में बांधने का काम किया। इसी से ‘अनेकता में एकता’ जैसा कालातीत नारा जन्मा—जो भारत की सभ्यता का सार और कांग्रेस की विचारधारा का केंद्र बना।
इन सभी तत्वों—सर्वधर्म समभाव, सहअस्तित्व, अंत्योदय, सामाजिक भागीदारी और सर्व-समावेशी राष्ट्रवाद—को मिलाकर कांग्रेस की विचारधारा बनती है। यह विचारधारा किसी imported ideology की परछाई नहीं, बल्कि भारतीय अनुभवों से बनी अपनी विशिष्ट पहचान है। आज जब वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है और राजनीति अधिकतर नारों, विरोध और ध्रुविकरण पर खड़ी हो रही है, ऐसे समय में कांग्रेस की यह वैचारिक रीढ़ हमें याद दिलाती है कि भारत सिर्फ देश नहीं, बल्कि विचार, संस्कृति, विविधता और साझा भविष्य की एक जटिल, सुंदर रचना है—और इस रचना की नींव उन्हीं सिद्धांतों से बनी है जो कांग्रेस ने अपने इतिहास में वहन किए हैं।




