ओपिनियन | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार | नई दिल्ली | 28 मार्च 2026
Madhu Kishwar के हालिया आरोपों को केवल सनसनीखेज बयान कहकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन राजनीति में घटनाएं कभी सतही नहीं होतीं। हर बयान, हर आरोप अपने भीतर एक रणनीति छिपाए होता है। यहां भी असली सवाल यह नहीं है कि आरोप कितने प्रमाणित हैं, बल्कि यह है कि इनका राजनीतिक उद्देश्य क्या है और इनका असर किस पर पड़ना है।पहली नजर में स्पष्ट दिखता है कि निशाना Narendra Modi हैं—सीधे, व्यक्तिगत और नैतिक स्तर पर। लेकिन भारतीय राजनीति का अनुभव बताता है कि बड़े नेताओं पर किए गए हमले अक्सर उनके समर्थकों को लक्ष्य बनाकर किए जाते हैं।
मोदी की राजनीतिक शैली और उनका व्यक्तित्व इस तरह के आरोपों से डगमगाने वाला नहीं है। पिछले एक दशक में उन्होंने कई बड़े विवादों और आरोपों का सामना किया, लेकिन हर बार अपने समर्थक आधार को और मजबूत ही किया। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है।
असल खेल यहीं से शुरू होता है—यह हमला मोदी पर कम, उनके समर्थक वर्ग पर ज्यादा है। वह वर्ग जो मीडिया, सोशल मीडिया, संस्थागत ढांचे और नैरेटिव निर्माण में प्रभावशाली भूमिका निभाता है। उसे नैतिक रूप से असहज करना, उसकी वैचारिक दृढ़ता को कमजोर करना—यही इस तरह के आरोपों का असली लक्ष्य नजर आता है।
राजनीति में यह कोई नया फार्मूला नहीं है। इतिहास बताता है कि मजबूत नेता को सीधे गिराना मुश्किल होता है, लेकिन उसके समर्थकों के आत्मविश्वास को तोड़ना अपेक्षाकृत आसान होता है। यही कारण है कि व्यक्तिगत आरोपों का इस्तेमाल अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
इस पूरे प्रकरण में एक और परत उभरकर सामने आती है—स्वयंभू “सेक्यूलर” वर्ग की भूमिका। यह वर्ग खुद को तटस्थ और नैतिक ऊंचाई पर दिखाता है, लेकिन कई बार वही सत्ता के लिए सबसे बड़ा “क्राइसिस मैनेजर” बन जाता है। आरोप लगाने वाले के अतीत को खंगालना, बिना मांगे चरित्र प्रमाणपत्र देना, और बहस को मूल मुद्दे से हटाकर दूसरी दिशा में ले जाना—ये सब उसी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
यही वर्ग कई बार सत्ता और विपक्ष के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है। यह एक साथ अपनी वैचारिक दुकान भी चलाता है और सत्ता को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती भी देता है। राजनीति की यह महीन चाल अक्सर आम आदमी की नजर से छूट जाती है, लेकिन इसका असर गहरा होता है।
आने वाले समय में ऐसे घटनाक्रम और तेज होंगे। महंगाई, आर्थिक दबाव, चुनावी चुनौतियां और विदेश नीति जैसे मुद्दे पहले से मौजूद हैं। ऐसे में व्यक्तिगत आरोप और नैतिक बहसें राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने का प्रमुख हथियार बनेंगी।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संकेत यही है कि भारतीय राजनीति अब “नैरेटिव वॉर” के दौर में प्रवेश कर चुकी है। यहां तथ्य से ज्यादा प्रभाव महत्वपूर्ण है, और प्रभाव वही तय करता है जो कहानी को नियंत्रित करता है।
यह समझना जरूरी है कि हर आरोप का असर उसके सच या झूठ से कम, और उसके समय, संदर्भ और लक्ष्य से ज्यादा तय होता है। और इस बार, लक्ष्य केवल एक व्यक्ति नहीं—बल्कि उसके पीछे खड़ी पूरी विचारधारा और समर्थन संरचना है।




