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रामलीला रोकने वाले को सुप्रीम कोर्ट की फटकार — पूछा “अब तक कहां थे?”, हाई कोर्ट के आदेश पर भी लगी रोक

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नई दिल्ली, 25 सितंबर 2025 

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद में एक स्कूल के मैदान पर आयोजित हो रही रामलीला को लेकर दाखिल याचिका पर कड़ी नाराज़गी जताई। अदालत ने उस व्यक्ति को जमकर फटकार लगाई जिसने इस आयोजन को रोकने की पहल की थी। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह आयोजन करीब सौ वर्षों से हो रहा है, ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि याचिकाकर्ता ने इतने वर्षों तक चुप्पी क्यों साधे रखी और अब अचानक इस पर रोक लगाने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा क्यों खटखटाया। अदालत ने पूछा, “अब तक कहां थे?”

यह मामला तब सामने आया जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया था कि स्कूल के मैदान पर रामलीला आयोजन बंद किया जाए, ताकि बच्चों को खेलकूद और शिक्षा के लिए मैदान का उपयोग करने से रोका न जा सके। हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पाया कि हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलें सुने बिना ही रामलीला पर तत्काल रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि परंपरागत आयोजनों को इतनी आसानी से बंद नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता न तो उस स्कूल का छात्र है और न ही अभिभावक, ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि वह इस तरह की याचिका दाखिल करने के लिए क्यों आगे आया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस वर्ष का रामलीला आयोजन जारी रहेगा, लेकिन भविष्य के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की संभावना पर विचार ज़रूरी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि बच्चों के अधिकार और परंपरा — दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने के उपाय तलाशे जाएं।

शीर्ष अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर अदालतें संवेदनशील रहती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी पुरानी परंपरा को अचानक खत्म कर दिया जाए। अदालत ने कहा कि अब हाई कोर्ट इस मामले पर विस्तृत सुनवाई करेगा और सभी पक्षों को सुनकर ही आगे का रास्ता तय करेगा। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए वैकल्पिक स्थान तय करना उचित होगा, ताकि स्कूल के मैदान का उपयोग बच्चों के हित में बाधित न हो।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर रामलीला की परंपरा को सुरक्षित रखा तो दूसरी ओर बच्चों के हितों को भी महत्व दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को फटकारते हुए साफ संदेश दिया कि अदालत का समय व्यर्थ करने वाली और देर से उठाई गई आपत्तियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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