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भारतीय मुस्लिम महिलाओं की स्थिति: परंपरा, अधिकार और परिवर्तन की राह

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डॉक्टर शालिनी अली, समाजसेवी

16 अगस्त 2025

भारतीय मुस्लिम महिलाएं उस चौराहे पर खड़ी हैं जहां धार्मिक परंपरा, कानूनी अधिकार, राजनीतिक विमर्श और सामाजिक संरचना—चारों का असर एक साथ महसूस होता है। वे एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं जो न केवल अल्पसंख्यक समुदाय से आता है, बल्कि भीतर ही भीतर लिंग-आधारित बहुसंख्यकवाद का भी सामना करता है। इस लेख में हम मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को कुरानिक संदर्भ, भारतीय कानून, समकालीन राजनीति, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक बाधाएं और हालिया सुधारों के परिप्रेक्ष्य से समझने का प्रयास करेंगे।

इतिहास और धार्मिक दृष्टिकोण: क्या कहता है इस्लाम?

कुरान और हदीस में महिलाओं को सम्मान, शिक्षा, विवाह में सहमति, संपत्ति के अधिकार और विरासत में हिस्सा जैसी अनेक स्वतंत्रताएँ दी गई हैं। सूरा निसा (Chapter 4) में महिलाओं को अलग पहचान और सम्मान से नवाज़ा गया है। खदीजा (र.अ.), आइशा (र.अ.), फातिमा (र.अ.) जैसी महिलाओं ने इस्लाम के आरंभिक काल में सामाजिक, व्यापारिक और धार्मिक क्षेत्रों में नेतृत्व किया।

लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम का सामाजिक संस्करण कई बार पितृसत्तात्मक परंपराओं से इतना मिश्रित हो गया कि मूल इस्लामिक अधिकार पीछे छूट गए। उदाहरण के लिए, तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक), हलाला, बहुविवाह और पर्दा जैसी परंपराओं का स्वरूप धार्मिक कम, सांस्कृतिक अधिक बन गया है—जहां निर्णय पुरुष लेते हैं और महिलाएं सहन करती हैं।

तीन तलाक और सुधारों की लहर

2017 में सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक पर ऐतिहासिक फैसले ने मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष को पहली बार मुख्यधारा में लाया। इसके बाद 2019 में संसद द्वारा पारित मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम ने तीन तलाक को अपराध घोषित कर दिया। यह कानून भारतीय लोकतंत्र में एक बड़ा मोड़ था जहां धार्मिक समुदायों की आस्था के भीतर से महिलाओं के अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण मिला।

हालांकि विरोध की आवाज़ें भी उठीं कि यह कानून मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ बनाया गया है, परंतु सैयदा हमीद, शाइस्ता अम्बा, शहजादी अनवर और कई सामाजिक कार्यकर्ता महिलाओं ने इसे अपनी आज़ादी की पहली जीत बताया। यह स्पष्ट हुआ कि धर्म और महिला अधिकार विरोधी नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के पूरक बनाया जा सकता है—अगर राजनीति ईमानदार हो।

वक्फ संपत्तियों में महिलाओं की हिस्सेदारी और हालिया बहस

भारत में 9 लाख से अधिक वक्फ संपत्तियाँ हैं, जिनमें बड़ी संख्या मस्जिद, कब्रिस्तान, दरगाह, स्कूल और सामाजिक संस्थाएँ हैं। परंतु इनमें मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी लगभग नगण्य है। 2024-25 के वक्फ संशोधन विधेयक में महिला सदस्यों को वक्फ बोर्ड में अनिवार्य बनाने, संपत्ति के व्यावसायिक उपयोग में महिलाओं को हिस्सेदार बनाने, और शिक्षा-स्वास्थ्य योजनाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित फंड की मांग की गई है।

अनेकों वक्फ सुधार समर्थकों ने इसे “मुस्लिम महिला उत्थान का सामाजिक आधार” करार दिया है। अगर वक्फ संपत्तियाँ मदरसों और कॉलेजों के ज़रिये लड़कियों की शिक्षा, हॉस्टल और स्कॉलरशिप योजनाओं में लगाई जाएं, तो यह सेकुलर और इस्लामिक दोनों नज़रिए से प्रगतिशील कदम होगा।

शिक्षा, रोजगार और डिजिटल सशक्तिकरण में चुनौतियाँ

मुस्लिम महिला की शिक्षा की राह आज भी असमानताओं से भरी है। Sachar Committee (2006) और Kundu Report (2022) के अनुसार, मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर 51% है जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। प्राथमिक कारण—अभाव, रूढ़िवाद, स्कूल की दूरी, या परिवार की हिचक।

रोजगार में भी मुस्लिम महिलाएं दोहरी चुनौती से गुजरती हैं—पहली, महिला होने के नाते भेदभाव; दूसरी, मुस्लिम होने के नाते अस्वीकार। बहुत सी महिलाएं बुटीक, टेलरिंग, ब्यूटी पार्लर जैसे स्वरोजगार क्षेत्रों में सीमित रह जाती हैं। डिजिटल इंडिया की लहर में अब कुछ उम्मीद दिखी है—ऑनलाइन उद्यमिता, घर से काम, YouTube चैनल, बेकरी स्टार्टअप और रिसेलिंग के जरिए कई मुस्लिम महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रही हैं।

राजनीति में भागीदारी और प्रतिनिधित्व की कमी

भारत की संसद और विधानसभाओं में मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व नगण्य है। आज़ादी के बाद केवल कुछ नाम—सैयदा अनवरी बेगम, नसीम फातिमा, मेहमूदा अली, शबाना आज़मी (राज्यसभा)—ही सामने आए हैं। पंचायतों में भले आरक्षण से महिलाएं चुनी गई हों, पर वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति आज भी पुरुषों के पास केंद्रित रहती है।

महिला आरक्षण विधेयक 2023 के बाद यह उम्मीद जगी है कि मुस्लिम महिलाओं को भी राजनीति में आरक्षण मिलेगा, लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि मुस्लिम समाज भीतर से महिलाओं को नेतृत्त्व के लिए तैयार करे, और राजनीतिक दल उन्हें केवल “प्रतीक” न बनाएं, बल्कि “पॉलिसी-मेकर” बनने का अवसर दें।

 पर्दा बनाम पहचान: धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक अधिकार का संतुलन

हिजाब पर बैन को लेकर कर्नाटक, केरल और अन्य राज्यों में जो बहस चली, वह केवल कपड़े की नहीं, पहचान और आत्मसम्मान की लड़ाई बन गई। कई मुस्लिम छात्राओं ने स्कूल छोड़ दिए, कुछ कोर्ट पहुंचीं, कुछ ने अन्य राज्यों में एडमिशन लिया। सवाल यह नहीं कि हिजाब सही या गलत है, सवाल यह है कि क्या एक महिला को अपने पहनावे की स्वतंत्रता है या नहीं?

संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन जब यह स्वतंत्रता सार्वजनिक शिक्षा और सुरक्षा से टकराती है, तो संतुलन की ज़रूरत होती है। मुस्लिम महिलाओं ने दिखाया कि वे धर्म की समझ भी रखती हैं और संविधान की भी। हिजाब पहनकर IAS बनने वाली आरती खान, डॉ. रुखसाना जहीर, और समरीन फातिमा जैसी महिलाएं इस विचार का जीता जागता प्रमाण हैं।

भारतीय मुस्लिम महिला अब सिर्फ “वंचित” या “विवादित” की पहचान से बाहर निकलकर “निर्माता”, “नेता” और “प्रेरणा” की भूमिका में आ रही है। उसके संघर्ष किसी एक मज़हबी पहचान से नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे से हैं, जिन्हें बदलना पूरे भारत के हित में है। आज़ादी की 100वीं वर्षगांठ तक, अगर भारत को पूर्णतः सशक्त बनाना है, तो मुस्लिम महिला को अधिकार, अवसर और आत्मबल से सुसज्जित करना अनिवार्य है।

 

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