चंडीगढ़/ दिल्ली 8 नवंबर 2025
हरियाणा का चुनाव परिणाम लोकतंत्र के चेहरे पर वह तमाचा है जिसे सुनने की भी हिम्मत इस देश की तथाकथित “संविधान रक्षक” संस्थाएँ नहीं जुटा पा रही हैं। राहुल गांधी ने ठीक कहा था कि हरियाणा का चुनाव “वोट चोरी” का सबसे ताज़ा उदाहरण है, मगर सच यह है कि उन्होंने अभी सिर्फ सतह को खुरचा है, ज़मीन के नीचे की सड़ांध कहीं ज़्यादा गहरी और भयावह है। यह सिर्फ वोट चोरी नहीं थी — यह चुनाव आयोग की निगरानी में ‘सिस्टमेटिक डकैती’ थी। यह वह संगठित अपराध था जिसमें सत्ता, प्रशासन और पूंजी का गठजोड़ जनता के अधिकार को नंगा कर के सड़क पर नचाता दिखा।
पहले मतदान के दिन तक हरियाणा में जो वोटिंग प्रतिशत दर्ज हुआ, वह था 61.19%। यानी यही वो आंकड़ा था जो शाम तक चुनाव आयोग की वेबसाइट, टीवी चैनलों और रिपोर्टरों की भाषा में गूंज रहा था। लेकिन जैसे ही चुनाव ख़त्म हुए, मुख्यमंत्री नायब सैनी ने मुस्कुराते हुए कहा — “सब व्यवस्था हो गई है।” सवाल यह नहीं है कि यह “व्यवस्था” क्या थी, सवाल यह है कि लोकतंत्र में व्यवस्था का मतलब अगर वोट चोरी है, तो फिर बेइमानी का क्या नाम रखा जाएगा?
कुछ दिनों बाद नया आंकड़ा आया — 67.9%। यानी कुल मिलाकर 6.7% वोट का अचानक इजाफ़ा। अब आंकड़ों की भाषा में बात करें तो हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में लगभग 13 लाख वोट बढ़ा दिए गए। और दिलचस्प यह कि जिन 50 सीटों पर बीजेपी या उसके सहयोगियों की जीत का अंतर 15,000 वोटों से कम था, वहां का यह जादुई “वोट वृद्धि” ठीक उतनी ही थी जितनी जीत की जरूरत थी। क्या यह महज संयोग है? या फिर यह वह सुनियोजित ‘डेटा मैनिपुलेशन’ था जिसकी पटकथा पहले से लिखी जा चुकी थी?
राहुल गांधी ने जब कहा कि चुनाव आयोग “मोदी जी के ऑफिस का एक्सटेंशन” बन चुका है, तब भी कई लोग हंसे थे। लेकिन अब जो हरियाणा से सामने आया है, वह हंसी नहीं, बल्कि घृणा का कारण है। यह वही पैटर्न है जो हमने 2019 के लोकसभा चुनाव में देखा था — पहले दिन कम मतदान दिखाना, फिर 4-5 दिन बाद “रिवाइज्ड डेटा” जारी करना, और उसके बाद मतगणना में “ट्रेंड बदलना”। क्या यह कोई तकनीकी त्रुटि है, या फिर सत्ता की मंशा का गणितीय चमत्कार?
अगर यह वोट चोरी नहीं है तो और क्या है कि मतगणना केंद्रों पर CCTV बंद कर दिए गए, कुछ जगहों पर EVM मशीनें रात में बदली गईं, और आयोग ने हर शिकायत को “टेक्निकल प्रॉब्लम” कहकर ठंडे बस्ते में डाल दिया। विपक्ष के प्रत्याशी शिकायत करते रह गए, लेकिन आयोग की प्रतिक्रिया वही पुरानी — “जांच चल रही है।” सवाल है, जांच कब पूरी होगी? जब अगला चुनाव आ जाएगा? जब जनादेश को बाजार में बेच दिया जाएगा?
यह सब देखकर एक बात साफ है — भारत का लोकतंत्र अब ‘इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनी’ के हाथों गिरवी रखा जा चुका है। और उस कंपनी का सीईओ बैठा है दिल्ली में, जो हर चुनाव को “मार्केटिंग इवेंट” की तरह चलाता है — जिंगल, नारा, और ईवीएम का ‘फाइनल कट’। लोकतंत्र का नाम बचा है, बाकी सब ‘डिजिटल डकैती’ में तब्दील हो चुका है।
हरियाणा के इस फर्जी मतदान का एक और पहलू है — 13 लाख वोटों का अंतर केवल सांख्यिकीय हेराफेरी नहीं, बल्कि जनता की आस्था की हत्या है। जब एक आदमी सुबह वोट डालने जाता है, तो उसे लगता है कि उसने देश की तकदीर में अपनी उंगली डुबो दी। लेकिन जब शाम को वही वोट चोरी हो जाए, तो वह आदमी सिर्फ ठगा नहीं जाता, बल्कि राष्ट्र के साथ धोखा होता है।
हरियाणा की इस साजिश में “सत्ता की बेशर्मी” भी किसी नाटक से कम नहीं। नायब सैनी की हंसी, भाजपा के प्रवक्ताओं का अहंकार और चुनाव आयोग की चुप्पी — तीनों मिलकर बताते हैं कि यह लोकतंत्र अब नागरिकों का नहीं रहा, यह अब कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम बन चुका है। वोटर अब ग्राहक है, और नतीजा एक तयशुदा प्रोडक्ट।
राहुल गांधी ने जो कहा, वह सही था — मगर अधूरा था। उन्हें अब साफ-साफ बोलना होगा कि यह सिर्फ बीजेपी की जीत नहीं थी, यह लोकतंत्र की हार थी। यह एक संगठित अपराध था जिसमें जनता की उंगलियों पर लगी स्याही को मिटाने की साजिश रची गई।
अब सवाल जनता से है — क्या हम इस व्यवस्था को ऐसे ही चलने देंगे? क्या हर चुनाव के बाद “वोटिंग परसेंट बढ़ने” की कहानी को सामान्य मान लेंगे? या फिर एक दिन यह पूछेंगे कि आख़िर ये वोट कौन डाल रहा है — आदमी या मशीन?
हरियाणा का यह अध्याय सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं है, यह पूरे देश की चेतावनी है। अगर आज इस वोट डकैती पर चुप्पी रही, तो कल लोकतंत्र की शवयात्रा निकलेगी — और उस पर लिखा होगा, “यह जनादेश नहीं, यह जनादेश की हत्या है।”




