महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 23 दिसंबर 2025
आज की तेज़ रफ्तार डिजिटल दुनिया में काम अब दफ़्तर तक सीमित नहीं रह गया है। मोबाइल फोन, ई-मेल और मैसेज के ज़रिये काम घर, सफ़र और छुट्टियों तक पीछा करता रहता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है—क्या इंसान को काम के बाद “ऑफलाइन” होने का अधिकार नहीं होना चाहिए? इसी सवाल के इर्द-गिर्द ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ पर देश में गंभीर चर्चा शुरू हुई है।
मानवीय नज़रिए से देखें तो यह मुद्दा सिर्फ़ कानून या नियमों का नहीं, बल्कि मानसिक शांति, परिवार के समय और इंसान की सेहत से जुड़ा है। बहुत-से कर्मचारी बताते हैं कि दफ़्तर का समय ख़त्म होने के बाद भी बॉस का फोन या व्हाट्सएप मैसेज आने का डर बना रहता है। नतीजा—न नींद पूरी, न परिवार के साथ सुकून का वक्त।
‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ का मतलब यही है कि काम के तय समय के बाद कर्मचारी पर यह दबाव न हो कि वह कॉल उठाए, मेल का जवाब दे या तुरंत ऑनलाइन हो। यानी काम के बाद का समय, सच में उसका अपना हो। यह सोच मानती है कि इंसान मशीन नहीं है, उसे आराम चाहिए, रिश्तों के लिए समय चाहिए और खुद से जुड़ने का मौका चाहिए।
इस बहस के पीछे एक सच्चाई यह भी है कि लगातार काम के दबाव से तनाव, चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान बढ़ रही है। कई लोग ‘बर्नआउट’ का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में यह अधिकार कर्मचारियों के लिए एक ढाल की तरह देखा जा रहा है—जो उन्हें यह भरोसा देता है कि आराम करना भी उनका हक़ है।
दुनिया के कई देशों में इस तरह के नियम पहले से मौजूद हैं, जहां काम के बाद कर्मचारियों को परेशान करना ठीक नहीं माना जाता। भारत में भी यह सोच धीरे-धीरे जगह बना रही है। भले ही अभी यह पूरी तरह कानून न बना हो, लेकिन इस पर चर्चा यह दिखाती है कि समाज अब काम और जीवन के संतुलन को गंभीरता से लेने लगा है।
‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ की बात इंसानियत की बात है। यह याद दिलाती है कि काम ज़रूरी है, लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी है इंसान का स्वस्थ, खुश और संतुलित जीवन। काम के बाद थोड़ा सुकून—शायद यही आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।




