पटना/ नई दिल्ली | 3 नवंबर 2025
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार की रैली में एक बार फिर वही पुराना राग अलापा — “जंगलराज लौटने मत देना।” उन्होंने मंच से कहा कि “जंगलराज के दौर में करीब 37,000 अपहरण हुए थे, और नीतीश जी ने बहुत मुश्किल से बिहार को उस दौर से बाहर निकाला।” लेकिन जब कोई प्रधानमंत्री अपने भाषणों में झूठे आंकड़ों से जनता को डराने की कोशिश करे, तो उसे तथ्यों के आईने में देखना जरूरी है। आंकड़े साफ बताते हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में जो “सुधरे हुए बिहार” का दावा किया गया, वह असल में अपहरण, अपराध, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार का दलदल बन गया।
अगर बिहार के पिछले आठ वर्षों के आंकड़े उठाकर देखें, तो सच्चाई किसी भी सजग नागरिक के सामने नंगा हो जाएगी। सिर्फ अपहरण के मामले देखें — 2016 में 7,324, 2017 में 8,479, 2018 में 9,935, 2019 में 10,925, 2020 में 7,889, 2021 में 10,198, 2022 में 11,822 और 2023 में 14,371 मामले दर्ज हुए। यानी नीतीश कुमार के आठ सालों में कुल 80,943 अपहरण हुए। यह वही नीतीश हैं जिन्हें भाजपा और उनके समर्थक “सुशासन बाबू” कहते नहीं थकते। लेकिन ये आंकड़े खुद चीख-चीखकर कह रहे हैं कि असली जंगलराज तो अब है — और वह भी सत्ता में बैठे तथाकथित “विकासपुरुषों” के दौर में।
प्रधानमंत्री मोदी जब मंच से “जंगलराज” का नाम लेकर लोगों को लालू यादव और राबड़ी देवी के शासन की याद दिलाते हैं, तो वह जानबूझकर यह नहीं बताते कि उस दौर में बिहार के सामाजिक ढांचे में एक परिवर्तन हुआ था — गरीब, दलित, पिछड़े और मुसलमान पहली बार सत्ता के साझेदार बने थे। हाँ, प्रशासनिक कमियां थीं, पर वह दौर सामाजिक न्याय का दौर था। आज का दौर क्या है? एक ऐसा दौर जहां अपराध चरम पर है, जहां नौजवान नौकरी के लिए सड़कों पर धक्के खा रहे हैं, जहां सरकारी स्कूलों में शिक्षक नहीं और अस्पतालों में डॉक्टर नहीं। नीतीश-मोदी की जोड़ी ने बिहार को विकास नहीं, बल्कि भ्रम दिया है।
बिहार की जनता यह भी समझती है कि अपराध के आंकड़े सिर्फ पुलिस डायरी में नहीं, बल्कि लोगों के डर और निराशा में दर्ज हैं। आज गांव-गांव में लोग कहते हैं कि “सुशासन बाबू का राज खत्म, अब कुशासन का राज है।” अपहरण उद्योग फल-फूल रहा है, और पुलिस-प्रशासन नेताओं की कृपा से अपराधियों को ढाल बन गया है। अगर यही “विकास का मॉडल” है, तो जनता को इस छलावे से बाहर आना होगा।
मोदी और नीतीश का गठबंधन बिहार के लिए एक दुर्भाग्य साबित हुआ है। एक तरफ प्रधानमंत्री मंच से “जंगलराज” का डर दिखाते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं की सरकार के दौरान अपराधों का ग्राफ आसमान छू रहा है। यह दोहरा चरित्र ही असली खतरा है — एक तरफ झूठी प्रचार राजनीति, दूसरी तरफ जमीनी सच्चाई से आंखें मूंद लेना।
अब वक्त आ गया है कि बिहार की जनता इन झूठे नारों और “सुशासन” के खोखले दावों से बाहर निकले। जो लोग दूसरों के शासन को जंगलराज कहकर सत्ता में आए, उन्होंने खुद बिहार को अपराध, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के दलदल में धकेल दिया। असली सवाल अब यही है — जब 37 हजार अपहरणों को “जंगलराज” कहा गया, तो 80 हजार अपहरणों को क्या कहा जाएगा? जवाब स्पष्ट है — असली जंगलराज तो कुशासनबाबू का है!




