नई दिल्ली 29 अक्टूबर 2025
दिल्ली की हवा में जहर घुला है, आसमान में धुंध का राज है, और इसी बीच सरकार ने “क्लाउड सीडिंग” यानी कृत्रिम बारिश का दावा किया था। राजधानी की सांसें भारी हो चुकी हैं और उम्मीद की जा रही थी कि यह प्रयोग थोड़ी राहत देगा। लेकिन हुआ उल्टा — न आसमान ने बूंदें बरसाईं, न हवा साफ़ हुई। इसके बजाय राजधानी के लोगों को मिला सिर्फ़ प्रचार, बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप का तूफ़ान। दिल्ली का कृत्रिम बारिश प्लान बुरी तरह फेल हो गया है, और इसी असफलता ने सियासी मौसम को पूरी तरह भड़का दिया है।
आम आदमी पार्टी (AAP) ने सबसे तीखा हमला करते हुए इस योजना को “बारिश का फर्जीवाड़ा” करार दिया। दिल्ली सरकार के वरिष्ठ नेता और मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा कि यह पूरा ड्रामा जनता की आँखों में धूल झोंकने के लिए रचा गया था। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा — “जहाँ बादल ही नहीं हैं, वहाँ बारिश कैसे कराएंगे? यह विज्ञान नहीं, सियासी नौटंकी है। सरकार सिर्फ़ फाइलों में बादल बनाती है और रिपोर्टों में बारिश दिखाती है।” भारद्वाज ने आरोप लगाया कि क्लाउड सीडिंग के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने की तैयारी थी, लेकिन नतीजा सिफर निकला। उन्होंने कहा कि दिल्ली की जनता को राहत देने की बजाय, सरकार ने फिर एक बार अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए प्रचार का सहारा लिया।
AAP के प्रवक्ताओं ने इसे एक और “प्रदूषण पर पॉलिटिकल मेकअप” बताया। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उपराज्यपाल ने मिलकर एक ऐसा दिखावा किया जिससे जनता को लगा कि कोई बड़ी वैज्ञानिक प्रक्रिया चल रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि मौसम विभाग ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि आर्द्रता और बादल दोनों पर्याप्त नहीं हैं। फिर भी सरकार ने इस प्रोजेक्ट का ऐलान कर दिया, मीडिया को ब्रीफ किया और प्रेस कॉन्फ्रेंस की, ताकि यह लगे कि कुछ बड़ा होने जा रहा है। जब प्रयोग विफल हुआ, तब बहाना बना दिया गया — “तकनीकी कारणों से प्रक्रिया अधूरी रह गई।”
दिल्ली में फिलहाल प्रदूषण का स्तर फिर खतरनाक सीमा पर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, आनंद विहार, वज़ीरपुर, पंजाबी बाग और द्वारका जैसे इलाकों में AQI 450 के पार पहुंच गया है। हवा जहरीली है, बच्चे स्कूल बंद होने के डर में हैं, और नागरिक मास्क के बिना घर से निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। लेकिन सियासत का खेल ऐसा है कि इस गम्भीर संकट के बीच भी सरकारें PR कैंपेन चला रही हैं। आम आदमी पार्टी ने कहा कि सरकार को जनता की चिंता नहीं, उसे बस अपने फेल प्रयोगों को “वैज्ञानिक सफलता” बताने की चिंता है।
AAP ने रेखा गुप्ता सरकार से सवाल पूछा — “क्लाउड सीडिंग पर कितना खर्च हुआ? किस कंपनी को ठेका दिया गया? और आखिर किस वैज्ञानिक आधार पर यह योजना शुरू की गई जब मौसम विभाग ने मना किया था?” पार्टी का कहना है कि यह पूरा प्लान “प्रदूषण से ध्यान हटाने” का तरीका था। दिल्ली की जनता को राहत नहीं मिली, बल्कि अब वह यह सोचने पर मजबूर है कि क्या उनका टैक्स भी अब आसमान में उड़ जाएगा।
राजनीतिक हलकों में भी इस पर तीखी प्रतिक्रियाएँ हैं। विपक्ष का कहना है कि यह दिल्ली की प्रशासनिक असफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। पहले प्रदूषण से निपटने के नाम पर एयर प्यूरीफायर लगाए गए, फिर वाटर स्प्रिंकलर और अब क्लाउड सीडिंग का तमाशा। लेकिन इनमें से किसी का भी असर ज़मीन पर नहीं दिखा। दिल्ली का नागरिक अब पूछ रहा है कि “क्या हवा भी अब सरकार की योजनाओं पर हँस रही है?”
दिल्ली में क्लाउड सीडिंग का असफल प्रयोग अब एक प्रतीक बन गया है — उस राजनीति का जो हकीकत से ज़्यादा दिखावे पर टिकी है। जहाँ समस्या को हल करने के बजाय “फोटो ऑपरेशन” और “प्रेस कॉन्फ्रेंस” का सहारा लिया जाता है। जहाँ हवा जहरीली है, वहाँ अब बारिश भी नकली बन गई है। दिल्ली की जनता अब सिर्फ़ एक सवाल पूछ रही है, “सरकार कब ज़मीन पर उतरेगी, आसमान में उड़ने के बजाय?”




