सुनील कुमार। नई दिल्ली 16 नवंबर 2025
भारतीय राजनीति में वर्तमान में जो व्यापक और दूरगामी बदलाव दिखाई दे रहा है, वह किसी एक राज्य या किसी एकल चुनाव का अचानक आया परिणाम नहीं है, बल्कि यह पिछले लगभग एक दशक से अधिक समय से बड़ी कुशलता के साथ चल रही एक गहरी राजनीतिक इंजीनियरिंग और संगठनात्मक पुनर्गठन की प्रक्रिया का चरम रूप है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय सत्ता के केंद्रों को विखंडित करना रहा है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में अजीत पवार का अपने चाचा शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी से अधिक सीटें जीत लेना केवल एक सांख्यिकीय चुनावी घटना नहीं है, यह महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई, सुनियोजित सत्ता-रेखा खींचने का प्रमाण है, जो पुराने नेतृत्व को अप्रासंगिक सिद्ध करने पर केंद्रित है। ठीक इसी तर्ज पर, एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे की तुलना में अधिक सीटें हासिल करना भी महज एक जनादेश नहीं माना जाना चाहिए। यह दशकों पुरानी शिवसेना की संगठनात्मक रीढ़ को भीतर से तोड़कर, उसे केंद्रीय सत्ता के प्रति वफादार एक नई राजनीतिक संरचना के रूप में स्थापित करने की एक जटिल और गहरी प्रक्रिया का सीधा परिणाम है। और जब बिहार में चिराग पासवान जैसा अपेक्षाकृत नया और कम अनुभवी चेहरा, तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल (RJD) जैसे एक बड़े और स्थापित जमीनी दल के लगभग बराबर सीटें जीतने में सफल होता है, तो इसे केवल संयोग या व्यक्तिगत करिश्मा मानकर टालना उचित नहीं होगा, बल्कि यह एक सुसंगठित और राष्ट्रव्यापी राजनीतिक पैटर्न का अनिवार्य हिस्सा प्रतीत होता है, जिसका अंतिम लक्ष्य राज्यों में निर्विवाद केंद्रीय वर्चस्व स्थापित करना है।
BJP का मास्टर-स्ट्रोक: क्षेत्रीय नेतृत्व को भीतर से तोड़ो, बाहर से कब्ज़ा करो
देश के कई अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक और विचारक लंबे समय से लगातार इस ओर संकेत कर रहे हैं कि केंद्र की सत्तारूढ़ शक्ति के सामने सबसे बड़ी, स्थायी और मौलिक चुनौती राष्ट्रीय स्तर के प्रतिद्वंद्वी दलों से नहीं, बल्कि उन मजबूत, जड़ जमाए हुए क्षेत्रीय दलों से आती है, जिनकी अपने राज्यों की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक नब्ज़ पर गहरी पकड़ होती है। चाहे वह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण महाराष्ट्र हो, या बिहार, झारखंड, ओडिशा, पंजाब, दिल्ली, अथवा पश्चिम बंगाल—जहां भी किसी क्षेत्रीय नेता या दल ने अपनी गहरी राजनीतिक पकड़ और एक स्वतंत्र पहचान स्थापित की है, वहां से केंद्र की एकात्मक राजनीति को एक गंभीर चुनौती मिलती रही है और केंद्रीय सत्ता को राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप झुकना पड़ता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान, केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी ने एक ऐसी चतुर और प्रभावी रणनीति को लागू किया है जिसने इन सभी क्षेत्रीय दुर्गों को एक-एक करके और धीरे-धीरे भीतर से ध्वस्त करने का काम किया है।
इस रणनीति को हम तीन मुख्य चरणों में विभाजित कर सकते हैं: पहला चरण होता है—लक्ष्य दल के भीतर मौजूद किसी भी प्रकार के असंतोष, महत्वाकांक्षा या वैचारिक मतभेद को पहचानना और उसे लगातार पोषित करना; दूसरा चरण—पोषण के बाद, उस आंतरिक असंतोष को एक खुले राजनीतिक विद्रोह या विभाजन में बदल देना; और तीसरा तथा अंतिम चरण—विभाजित और टूटे हुए गुट के नेता को तत्काल अपना मजबूत समर्थन देकर, पुराने और वास्तविक नेतृत्व को संगठनात्मक रूप से जड़ से कमजोर कर देना। इस मॉडल में शरद पवार, उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, हेमंत सोरेन, और ममता बनर्जी—इन सभी बड़े क्षेत्रीय नेताओं का सीधा मुकाबला केंद्र द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया गया है, बल्कि उनके ही घर के ‘असंतुष्टों’ या ‘असफल’ गुटों को आगे बढ़ाकर किया गया है। यह संपूर्ण मॉडल, राजनीतिक लोकतंत्र की पारंपरिक प्रतिस्पर्धा की जगह, एक तरह के ‘सत्ता के सुनियोजित केंद्रीकरण’ के एक नए और चिंताजनक दौर को प्रदर्शित करता है।
महाराष्ट्र सबसे बड़ा उदाहरण: एक राज्य, दो बगावतें, एक ही दिशा
महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ है, वह भारतीय राजनीति के इतिहास में अपनी तरह का एक अत्यंत अनोखा और पाठ्यपुस्तक के रूप में दर्ज किए जाने योग्य उदाहरण बन चुका है। इस प्रक्रिया में पहले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से भीतर से तोड़ा गया—एकनाथ शिंदे को एक मजबूत असंतुष्ट चेहरे के रूप में स्थापित कर, न केवल सत्ता से बेदखल किया गया, बल्कि पूरे संगठन, उसके प्रतीक और उसके वैचारिक आधार को भी झकझोर दिया गया। और फिर, लगभग ठीक उसी कार्यप्रणाली और तर्ज पर, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में अजीत पवार के रूप में एक दूसरा, लेकिन समान रूप से प्रभावी ‘पावर सेंटर’ तैयार किया गया, जिसने मूल नेतृत्व (शरद पवार) को कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर कमजोर कर दिया।
इन दोनों महत्वपूर्ण बगावतों का अंतिम लाभ किसे मिला? इसका उत्तर स्पष्ट है: राज्य की सरकार अंततः ‘दिल्ली की पसंद’ से बनी, वह सरकार दिल्ली की ही राजनीतिक शर्तों पर टिकी हुई है, और राज्य की सत्ता के वास्तविक नियंत्रण की चाबी भी अप्रत्यक्ष रूप से ‘दिल्ली’ के केंद्रीय नेतृत्व के पास चली गई है। यह एक ऐसा सफल और दोहराया जाने वाला मॉडल बन गया है, जिसे अब देश के अन्य राज्यों में भी बड़े पैमाने पर लागू करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, जहां मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व मौजूद है।
देश की राजनीति में ‘नए सूबेदार’: वफादार, प्रबंधनीय और निर्बल
इस राजनीतिक विखंडन की प्रक्रिया में सबसे दिलचस्प और ध्यान देने योग्य बात यह है कि पिछले दस वर्षों के दौरान जिन बड़े और दशकों पुराने नेताओं की राजनीति को कमजोर किया गया या समाप्त किया गया, वे सभी अपने-अपने राज्यों पर गहरी पकड़ रखने वाले और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान वाले बड़े नाम थे, जिनमें शरद पवार और उद्धव ठाकरे (महाराष्ट्र), नवीन पटनायक (ओडिशा), कैप्टन अमरिंदर सिंह (पंजाब), अखिलेश यादव (यूपी), लालू-तेजस्वी (बिहार), हेमंत सोरेन (झारखंड), और अरविंद केजरीवाल (दिल्ली) जैसे दिग्गज शामिल हैं।
इन सभी स्थापित क्षेत्रीय नेताओं के राजनीतिक प्रभाव वाले स्थान पर या तो एक तरह का राजनीतिक शून्य (Vacuum) पैदा कर दिया गया है, या फिर ऐसे नए नेता खड़े कर दिए गए हैं जिनकी राजनीतिक पहचान, संगठनात्मक शक्ति और स्वतंत्र आभा लगभग पूरी तरह से दिल्ली के इशारों और केंद्रीय समर्थन से निर्धारित होती है। इस प्रक्रिया को भारतीय राजनीति में एक ‘नई सबहेदारी’ के मॉडल के रूप में देखा जा रहा है—एक ऐसा मॉडल जहां राज्य का नेतृत्व केवल वही व्यक्ति सफलतापूर्वक कर सकता है जो न केवल केंद्रीय सत्ता के प्रति अटूट रूप से वफादार हो, बल्कि जो केंद्रीय नेतृत्व के लिए आसानी से प्रबंधनीय (Manageable) भी हो, ताकि उसकी स्वतंत्रता कभी भी केंद्रीय निर्णयों को चुनौती न दे सके।
यह केवल चुनावी रणनीति नहीं—यह सत्ता संरचना का पुनर्गठन है
वर्तमान में भारतीय राजनीति में जो चल रहा है, उसे केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के एक सामान्य चरण या ‘चुनावी जीत’ और हार के रूप में देखना एक बड़ी गलती होगी। यह वास्तव में भारतीय संघीय ढांचे में सत्ता के केंद्रीकरण का एक अभूतपूर्व और गहन दौर है—एक ऐसा दौर जिसमें दशकों से चली आ रही क्षेत्रीय दलों की मज़बूत आवाज़, उनकी सांस्कृतिक पहचान और उनकी राजनीतिक स्वायत्तता धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जिससे राज्यों की शक्तियाँ क्षीण हो रही हैं। यह वही सुनिश्चित पैटर्न है जिसका उल्लेख टिप्पणी में किया गया था: “सभी क्षेत्रीय सतराफ़ (दुर्ग) मिटा दिए गए, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु अब अगली पारी में हैं। केंद्र के अनुरूप नेता ही नए सूबेदार बनाए जा रहे हैं।”
एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र में, यह प्रक्रिया राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह से समाप्त कर सकती है और देश में एक-दलीय (One-Party Dominance) प्रवृत्ति को अत्यधिक बल दे सकती है। विरोध के तमाम छोटे-बड़े स्वर आज भी निश्चित रूप से मौजूद हैं, लेकिन सबसे बड़ा और मूलभूत सवाल यही है कि क्या वे सभी विरोधी शक्तियाँ संगठित होकर इस नई केंद्रीकृत राजनीति का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में सक्षम हो पाएंगी—या फिर, धीरे-धीरे और अनिवार्य रूप से, भारतीय राजनीति एक ही शक्तिशाली केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में सिमटती चली जाएगी, जहां क्षेत्रीय स्वायत्तता का स्थान केवल केंद्रीय इच्छाओं की पूर्ति ले लेगी।




