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हिमालय की बर्फ़ में छुपा परमाणु सवाल: क्या महाशक्तियों की गलतियों की कोई समय-सीमा नहीं होती?

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ओपिनियन | एबीसी डेस्क | 15 दिसंबर 2025

हिमालय को अक्सर राष्ट्रों की सीमाओं से ऊपर उठकर देखने की ज़रूरत होती है, क्योंकि वह किसी एक देश की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप की जीवनरेखा है। इसी हिमालय की नंदा देवी चोटी पर 1965 में घटित एक घटना आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और नैतिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA द्वारा स्थापित — और बाद में खो दिया गया — रेडियोधर्मी जासूसी उपकरण कोई रोमांचक कोल्ड वॉर किस्सा नहीं, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे रणनीतिक हितों के नाम पर पूरी पृथ्वी को जोखिम में डाला जा सकता है, और फिर दशकों तक उस जोखिम को अनदेखा किया जा सकता है।

1960 का दशक वैश्विक शक्ति-संतुलन का सबसे खतरनाक दौर था। परमाणु हथियार सिर्फ सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव का औजार बन चुके थे। चीन के 1964 के परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका की चिंता स्वाभाविक थी, लेकिन उस चिंता का समाधान हिमालय जैसी संवेदनशील और भूकंपीय दृष्टि से नाज़ुक जगह पर प्लूटोनियम-आधारित उपकरण ले जाना था — यह निर्णय आज भी समझ से परे है। CIA ने जिस रेडियोआइसोटोप जनरेटर का इस्तेमाल किया, वह सामान्य तकनीकी उपकरण नहीं था, बल्कि ऐसा रेडियोधर्मी स्रोत था जिसकी सक्रियता कई पीढ़ियों तक बनी रह सकती है। यह तथ्य ही इस पूरे मिशन को एक साधारण “जासूसी ऑपरेशन” से ऊपर उठाकर वैश्विक सुरक्षा का मुद्दा बना देता है।

इस प्रकरण में भारत की भूमिका पर सवाल उठना अस्वाभाविक नहीं है। क्या उस समय भारत को इस उपकरण की प्रकृति, उसमें मौजूद रेडियोधर्मी सामग्री और उसके दीर्घकालिक प्रभावों की पूरी जानकारी थी? या फिर शीत युद्ध की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की भू-रणनीतिक स्थिति ने उसे ऐसे निर्णयों के लिए मौन सहमति देने को मजबूर कर दिया? यह स्पष्ट है कि भारतीय एजेंसियों की सहभागिता रही, लेकिन यह कभी सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया कि इस मिशन के पर्यावरणीय और नैतिक पहलुओं पर किस स्तर पर विचार किया गया। यह चुप्पी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नंदा देवी केवल एक पर्वत शिखर नहीं, बल्कि गंगा नदी प्रणाली से जुड़ा एक संवेदनशील क्षेत्र है, जिस पर करोड़ों लोगों की निर्भरता है।

1965 में जब अत्यधिक खराब मौसम के कारण मिशन को बीच में छोड़ना पड़ा और उपकरण को वहीं छोड़ दिया गया, उसी क्षण यह मामला अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी का बन गया था। अगले वर्ष जब खोज असफल रही, तो इस घटना को धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में धकेल दिया गया। यह मान लिया गया कि उपकरण शायद हिमस्खलन या ग्लेशियर की गति के साथ कहीं दब गया होगा। लेकिन हिमालय कोई स्थिर संरचना नहीं है। यह एक गतिशील, बदलता हुआ भूभाग है, और आज के दौर में जलवायु परिवर्तन ने इस गतिशीलता को और तेज़ कर दिया है। ऐसे में यह मान लेना कि रेडियोधर्मी सामग्री हमेशा सुरक्षित रहेगी, वैज्ञानिक दृष्टि से एक जोखिम भरा अनुमान है।

सरकारी वक्तव्यों की भाषा दशकों से लगभग एक जैसी रही है — “कोई पुख्ता प्रमाण नहीं”, “कोई तात्कालिक खतरा नहीं।” लेकिन इतिहास बार-बार दिखा चुका है कि पर्यावरणीय और औद्योगिक आपदाएँ आधिकारिक आश्वासनों की परवाह नहीं करतीं। भोपाल, चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी घटनाएँ हमें यह सिखाती हैं कि जब खतरा दिखाई देने लगता है, तब अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है। वैज्ञानिक समुदाय का एक हिस्सा लगातार यह इंगित करता रहा है कि अगर रेडियोधर्मी तत्व ग्लेशियरों के पिघलने वाले पानी में मिलते हैं, तो उनका प्रभाव सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक नहीं रहेगा। यह एक दीर्घकालिक और व्यापक पर्यावरणीय चुनौती बन सकती है।

सबसे चिंताजनक पहलू राजनीतिक चुप्पी है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह मुद्दा संसद और सार्वजनिक बहस का केंद्र क्यों नहीं बना? क्या इसलिए कि यह मामला अमेरिका जैसी महाशक्ति से जुड़ा है? यदि वैश्विक राजनीति में कुछ प्रश्न केवल इसलिए नहीं पूछे जाते क्योंकि वे शक्तिशाली देशों को असहज कर सकते हैं, तो यह पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नैतिक कमजोरी को दर्शाता है। जवाबदेही का सिद्धांत तभी तक अर्थपूर्ण है, जब तक वह शक्तिशाली और कमजोर — दोनों पर समान रूप से लागू हो।

अमेरिका, जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर परमाणु सुरक्षा, पारदर्शिता और पर्यावरण संरक्षण की बात करता है, इस मामले में खुद कठघरे में खड़ा दिखाई देता है। CIA ने लंबे समय तक इस मिशन को स्वीकार नहीं किया और जब स्वीकार किया भी, तो अधूरी जानकारी के साथ। आज भी यह स्पष्ट नहीं है कि उस रेडियोधर्मी उपकरण को निष्क्रिय करने या उसके प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करने की कोई ठोस योजना है या नहीं। यह दोहरा मानदंड — दूसरों के लिए कड़े नियम और खुद के लिए मौन — वैश्विक विश्वास को कमजोर करता है।

यह तर्क देना आसान है कि यह घटना 60 साल पुरानी है, लेकिन रेडियोधर्मिता समय की सीमा नहीं मानती। प्लूटोनियम किसी राजनीतिक युग के समाप्त होने से निष्क्रिय नहीं हो जाता। इसलिए यह मामला इतिहास का नहीं, भविष्य का प्रश्न है। नंदा देवी की बर्फ़ के नीचे दबी यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या रणनीतिक लाभ के नाम पर किए गए फैसलों की कीमत हमेशा आम लोगों और पर्यावरण को ही चुकानी होगी।

सवाल केवल यही नहीं है कि वह उपकरण कहाँ है। असली सवाल यह है कि क्या महाशक्तियों की गलतियों के लिए भी कभी वास्तविक जवाबदेही तय होगी? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं मिलता, तब तक नंदा देवी केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की अनकही विफलताओं का प्रतीक बनी रहेगी — शांत, बर्फ़ीली और भीतर से खतरनाक।

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