Home » National » ‘सरकारी मुसलमानों’ का भ्रम और संघतंत्र की विभाजनकारी सच्चाई

‘सरकारी मुसलमानों’ का भ्रम और संघतंत्र की विभाजनकारी सच्चाई

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

नई दिल्ली 23 अक्टूबर 2025

भारत के तेजी से बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक अत्यंत विरोधाभासी और दुखद किरदार उभर रहा है, जिसे प्रायः ‘सरकारी मुसलमान’ कहकर संबोधित किया जाता है। यह वह वर्ग है जो एक खतरनाक भ्रम पाले बैठा है कि हिंदुत्ववादी विचारधारा के वर्चस्व के तहत स्थापित होने वाले ‘संघतंत्र’ में उनकी अत्यधिक निष्ठा, चाटुकारिता और आत्म-विरोध उन्हें समाज में सम्मान, स्वीकार्यता और सुरक्षा दिलाएगा। 

यह एक ऐसी आत्मघाती भूल है जिसकी जड़ें इतिहास की उपेक्षा में हैं, और यह भ्रम वर्तमान की कठोर सच्चाइयों के सामने ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। हमें यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि ‘हिंदुराष्ट्र’ का विचार समावेशी भारत का पर्याय नहीं है। यह मूलतः एक ऐसी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का सपना है, जो ऊँची जातियों के वर्चस्व को स्थापित करने, लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और वंचित समुदायों को हमेशा के लिए हाशिए पर धकेलने के लिए बुनी गई है।

 इस असमतावादी तंत्र में, मुसलमान—भले ही वे अपनी “वफादारी” को कितनी भी बार सिद्ध करने की कोशिश करें—हमेशा संदेह के घेरे में रहेंगे। उनकी राष्ट्रीय निष्ठा को बार-बार परखा जाएगा, उनकी पहचान को सार्वजनिक रूप से निशाना बनाया जाएगा, और उनकी अस्मिता को कुचलने का निरंतर प्रयास किया जाएगा। यह संघतंत्र समानता, न्याय या सर्वधर्म समभाव के संवैधानिक मूल्यों में विश्वास नहीं करता; यह नागरिकों को उनकी जाति, धर्म, और चापलूसी की मात्रा के आधार पर आंकता और श्रेणीबद्ध करता है।

पहचान का विश्वासघात और नैरेटिव की राजनीति: स्व-अस्वीकृति का खतरा

‘सरकारी मुसलमानों’ के इस वर्ग को एक अत्यंत सुनियोजित और मनोवैज्ञानिक रणनीति के तहत अपने ही समुदाय की आलोचना करने और उसके खिलाफ ज़हर उगलने के लिए उकसाया और पुरस्कृत किया जाता है। उन्हें एक खतरनाक मिथक पर विश्वास दिलाया जाता है कि देश की सारी समस्याओं का मूल कारण उनके धर्म और उनके समाज की ‘कमी’ में निहित है। 

इसके विपरीत, प्रमुख बहुसंख्यक समुदाय को हर नैतिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय श्रेष्ठता का प्रतीक बताया जाता है, भले ही उनके भीतर कितनी भी विसंगतियाँ क्यों न हों। यह एक विभाजनकारी और अत्यंत खतरनाक नैरेटिव है, जो न केवल भारत के सामाजिक सौहार्द की नींव को तोड़ता है, बल्कि मुसलमानों को एक ऐसे अस्तित्व के संकट की ओर धकेलता है जहाँ वे अपनी ही पहचान और अस्मिता से घृणा करने के लिए प्रेरित होते हैं। वसीम त्यागी जैसे उदाहरण इस कटु सच्चाई को स्पष्ट रूप से बयां करते हैं।

 इन व्यक्तियों ने अपनी पहचान के साथ खुलेआम विश्वासघात किया, अपने समुदाय को अपमानित किया, लेकिन अंततः उन्हें न तो उस सत्ता तंत्र से वास्तविक सम्मान मिला, और न ही उन्हें सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त हुई। इतिहास गवाह है कि जो राजनीतिक तंत्र अपने नागरिकों को उनकी निष्पक्ष निष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी जाति और धर्म के आधार पर आंकता है, वहाँ सम्मान और सुरक्षा की कोई दीर्घकालिक गारंटी नहीं होती; यह केवल अल्पकालिक उपयोगिता का सिद्धांत है।

संविधान से जुड़िए, तंत्र से नहीं: इतिहास और भविष्य का सबक

भारत का भविष्य किसी विभाजनकारी विचारधारा या अल्पकालिक राजनीतिक तंत्र के एजेंडे में निहित नहीं है, बल्कि वह दृढ़ता से संविधान के मूल्यों में निहित है। भारत का संविधान समानता, न्याय, स्वतंत्रता और भाईचारे का वादा करता है—ये ही वे आधारशिलाएँ हैं जिन पर एक मजबूत और समावेशी राष्ट्र का निर्माण संभव है। 

जो लोग इस अस्थायी तंत्र का हिस्सा बनकर अल्पकालिक लाभ के पीछे भाग रहे हैं, उन्हें इस गहरी सच्चाई को समझना होगा कि नफरत का जवाब नफरत से नहीं, बल्कि इंसानियत, संवैधानिक चेतना और अटूट एकता से ही दिया जा सकता है। मुस्लिम समाज में भी वही मानवीय विविधता है जो किसी भी अन्य बड़े समाज में होती है—इसमें ईमानदार नागरिक भी हैं, अपराधी भी, और नास्तिक या धार्मिक लोग भी शामिल हैं। लेकिन जो व्यक्ति अपनी अस्मिता और मूल पहचान को त्याग देगा, उसे न तो उसका अपना समाज कभी स्वीकार करेगा, और न ही इतिहास उसे क्षमा करेगा।

 वसीम रिज़वी (अब जितेंद्र नारायण त्यागी) इसका जीता-जागता और दुखद सबूत हैं, जिन्होंने अपनी पहचान बेच दी और अपने समुदाय को त्याग दिया, मगर अंततः वे राजनीतिक विस्मृति और इतिहास के कूड़ेदान में गुम हो गए। संदेश स्पष्ट और अटल है: संविधान से जुड़िए, तंत्र से नहीं। भारत की आत्मा और उसका भविष्य इसके संवैधानिक मूल्यों में बसता है, न कि किसी सांप्रदायिक और विभाजनकारी विचारधारा में। यह समय है कि इस भ्रम और आत्म-दमन से बाहर निकला जाए और एक ऐसे विविध और सशक्त भारत के लिए काम किया जाए, जो जाति, धर्म या राजनीतिक चाटुकारिता की परवाह किए बिना सभी नागरिकों को गले लगाए।

संघतंत्र के “मानसिक गुलाम” मुसलमानों की सच्चाई

जो मुसलमान संघतंत्र और भाजपा का साथ देते हैं, वे दरअसल उस मानसिक गुलामी के प्रतीक हैं जिसे यह व्यवस्था बहुत पसंद करती है। ऐसे लोगों का उपयोग सिर्फ़ सजावट और प्रमाणपत्र के रूप में किया जाता है — ताकि यह दिखाया जा सके कि “देखिए, मुसलमान भी हमारे साथ हैं।” यह प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व केवल प्रचार की ज़रूरत पूरी करने के लिए होता है, न कि बराबरी देने के लिए। नतीजा यह है कि इन लोगों को कभी निर्णायक पद या नीति-निर्माण की भूमिका नहीं दी जाती। वे केवल मंच की भीड़ में फोटो फ्रेम के मुसलमान बने रहते हैं — जिनका उपयोग मुसलमानों की आलोचना करवाने और अपनी ‘समावेशी छवि’ चमकाने में किया जाता है।

ऐसे मुसलमान चाहे कितनी भी वफ़ादारी दिखाएँ, संघतंत्र में उन्हें न तो दिल से स्वीकार किया जाता है और न ही उन पर विश्वास किया जाता है। आरएसएस और भाजपा की वैचारिक संरचना में मुसलमान हमेशा “संदेह का पात्र” रहे हैं — चाहे वे कितने भी हिंदुत्व-प्रेमी क्यों न बन जाएँ। इतिहास गवाह है कि वसीम रिज़वी से लेकर नसीर खान और इल्यास शेख जैसे तमाम नाम इस प्रयोगशाला में इस्तेमाल होकर भुला दिए गए। ये सबक़ साफ़ है — जो अपने समाज, पहचान और अस्मिता को गिरवी रखकर सत्ता का गुलाम बनता है, उसे अंततः न सत्ता स्वीकारती है, न समाज सम्मान देता है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments