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धुरंधर फिल्म BJP प्रोपगैंडा का खुला खेल: कांग्रेस-यूपीए काल के RAW अधिकारियों और ऑपरेशनों को मोदी की ‘नया भारत’ वाह-वाही में गढ़कर पेश किया, तथ्यों से पूरा पर्दाफाश

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मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई/ दिल्ली | 2 अप्रैल 2026

फिल्म ‘धुरंधर’ (2025) और उसका सीक्वल ‘धुरंधर: द रिवेंज’ (2026) निर्देशक आदित्य धर की नई फिल्म है जिसमें रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, आर. माधवन, संजय दत्त और अर्जुन रामपाल जैसे कलाकार हैं। यह फिल्म पाकिस्तान के कराची के लियारी इलाके में रॉ (RAW) के एक अंडरकवर ऑपरेटिव की कहानी बताती है जो गैंगस्टर सिंडिकेट और पाकिस्तानी क्रिमिनल नेटवर्क को अंदर से तोड़ने का मिशन लेता है। फिल्म असल घटनाओं से प्रेरित बताई गई है, लेकिन तथ्यों की पड़ताल करने पर साफ हो जाता है कि यह पूरी तरह BJP-RSS के हॉकिश राष्ट्रवाद और मोदी सरकार की ‘मस्कुलर’ इमेज को चमकाने वाला प्रोपगैंडा है। फिल्म के पहले भाग में ज्यादातर घटनाएं 1999 के कंधार हाईजैक, 2001 के संसद हमले और 2008 के आसपास की हैं – यानी अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह (कांग्रेस-यूपीए) सरकार के कार्यकाल में। 2008 की एक सीन में साफ कहा जाता है – “सबूत संभालकर रखो, उम्मीद है भविष्य में कोई नेता आएगा जो एक्शन लेगा” – जो साफ तौर पर मोदी सरकार का इंतजार दिखाता है। फिल्म ‘नया भारत’ का नारा लगाकर खत्म होती है जिसमें “घर में घुसकर मारेंगे” वाली मोदी की 2019 वाली भाषा दोहराई जाती है।

लेकिन असली तथ्य यह है कि फिल्म में दिखाए गए RAW के अंडरकवर ऑपरेशन, लियारी गैंग के खिलाफ कार्रवाई और पाकिस्तानी काउंटरफिट नोट-टेरर फंडिंग नेटवर्क को तोड़ने का काम मुख्य रूप से कांग्रेस-यूपीए सरकार (2004-2014) के काल में हुआ था। रिहमान डकैत जैसे गैंगस्टर 2011 में पाकिस्तान में ही मारे गए थे, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। लियारी ऑपरेशन और भारतीय खुफिया एजेंसियों की गतिविधियां 2000 के दशक के शुरुआती और मध्य भाग में चलीं – यानी यूपीए-1 और यूपीए-2 के समय। फिल्म इन अधिकारियों और मिशनों को मोदी काल की ‘बोल्ड’ नीतियों का नतीजा बताकर पेश करती है, जबकि हकीकत में ये काम उस वक्त के कांग्रेस सरकार के अधीन RAW अधिकारियों ने किए थे। सीक्वल ‘धुरंधर: द रिवेंज’ में तो सीधे पीएम मोदी के 2014 शपथ ग्रहण और 2016 नोटबंदी के रियल फुटेज डाल दिए गए हैं, जिसे देखकर थिएटर में तालियां और नारे लगते हैं। नोटबंदी को फिल्म में पाकिस्तानी नकली नोटों के खिलाफ ‘मास्टर स्ट्रोक’ दिखाया गया, जबकि हकीकत में नोटबंदी का आर्थिक नुकसान बहुत बड़ा था और काउंटरफिट नोट समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

आलोचक और फैक्ट चेक स्पष्ट रूप से कहते हैं कि फिल्म ‘हॉकिश इंडिया’ के पक्ष में प्रोपगैंडा है। मिंट के उदय भाटिया ने लिखा कि यह BJP लीडरशिप को खुश करने के लिए बनी है। द हिंदू के निसिम मनाथुक्करन ने इसे मोदी सरकार के सुरक्षा अधिकारियों को हीरो बनाने और उनकी ‘मस्कुलर’ काउंटर – टेररिज्म नीतियों की तारीफ करने वाली फिल्म बताया। आदित्य धर की पिछली फिल्म ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ भी मोदी सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक को ग्लोरिफाई करने वाली थी। ‘धुरंधर’ में भी वही फॉर्मूला – पुराने सरकारों (खासकर कांग्रेस) के काल के कामों को चुपचाप ले लिया, लेकिन क्रेडिट मोदी के ‘नया भारत’ को दे दिया। 2008 की सीन में “भविष्य का नेता” कहकर यूपीए सरकार को जानबूझकर कमजोर दिखाया गया, जबकि उसी सरकार ने 26/11 मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान पर दबाव बनाया, कई RAW ऑपरेशन चलाए और आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाए। फिल्म में कांग्रेस काल के अधिकारियों की मेहनत को मोदी की ‘वाह-वाही’ में बदलकर पेश करना साफ राजनीतिक एजेंडा है।

कांग्रेस और सपा नेताओं ने फिल्म को लेकर बवाल खड़ा किया क्योंकि इसमें कुछ किरदार (अतीक अहमद जैसे) को पाक ISI से जोड़कर दिखाया गया है, जो यूपी-कांग्रेस शासन के दौरान के माफिया को मोदी काल की सफाई का श्रेय देता है। लेकिन असली पर्दाफाश यह है कि फिल्म के मूल मिशन और अधिकारी 2000 के दशक के शुरू से मध्य तक के हैं – जब केंद्र में NDA या UPA थी। फिर भी फिल्म का पूरा नैरेटिव “मोदी आए, तो एक्शन हुआ” वाला है। डायरेक्टर आदित्य धर खुद कहते हैं कि मोदी सरकार को फिल्म की जरूरत नहीं, लेकिन फिल्म देखने वालों को यही लगता है कि मोदी के बिना कुछ नहीं हो सकता था। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने कमाई की, लेकिन आलोचक इसे ‘शेमलेस पॉलिटिकल प्रोपगैंडा’ बता रहे हैं जो नोटबंदी जैसे विवादित फैसलों को भी सकारात्मक दिखाती है।

‘धुरंधर’ सीरीज कांग्रेस-यूपीए सरकार के कार्यकाल में हुए RAW अधिकारियों के साहसिक कामों को चोरी-छिपे मोदी सरकार की उपलब्धि बताकर देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास है। असल इतिहास में ये ऑपरेशन उसी समय के खुफिया अधिकारियों ने किए, जिन्हें फिल्म में मोदी युग का ‘नया भारत’ का जश्न मनाने के लिए इस्तेमाल किया गया। यह सिनेमा को राजनीतिक हथियार बनाने का नया उदाहरण है, जहां तथ्यों को तोड़-मरोड़कर एक खास नैरेटिव थोपा जाता है। दर्शक अगर तथ्यों को जान लें तो साफ दिखेगा कि फिल्म न सिर्फ मनोरंजन, बल्कि BJP के एजेंडे का हिस्सा है – पुरानी सरकारों के कामों पर पर्दा डालकर मोदी की वाह-वाही गाने का। यह प्रोपगैंडा है, जिसे तथ्यों ने पूरी तरह बेनकाब कर दिया।

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