Home » National » ‘इंटरफेथ डायलॉग’ में एकता, समावेश और शांति की बात—नफरत, फ्रिंज एलिमेंट्स और मोदी की चुप्पी पर खुली बहस

‘इंटरफेथ डायलॉग’ में एकता, समावेश और शांति की बात—नफरत, फ्रिंज एलिमेंट्स और मोदी की चुप्पी पर खुली बहस

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

‘इंटरफेथ डायलॉग’ : वक्ता–वार 10 सबसे अहम बातें

1. डॉ. कृष्ण गोपाल (RSS)

पंडित जवाहर लाल नेहरू की तारीफ करते हुए कहा भारत की असली ताकत उसकी संवाद और समावेश की परंपरा है। उन्होंने नेहरू के 24 जनवरी 1948 के AMU भाषण का हवाला देते हुए कहा कि राष्ट्रवाद को धर्म से ऊपर रखा जाना ही भारत को जोड़ता है।

2. डॉ. कृष्ण गोपाल (RSS)

फ्रिंज एलिमेंट्स समस्या नहीं, बल्कि बीमारी के लक्षण हैं। केवल उकसाने वालों से लड़ने के बजाय समाज की गहरी बीमारियों को समझना और दूर करना ज़रूरी है।

3. डॉ. कृष्ण गोपाल (RSS)

उन्होंने ‘हिंदुत्व’ की जगह ‘हिंदूनेस’ शब्द को अधिक उपयुक्त बताया—जो पूरी तरह समावेशी है। हिंदू परंपरा अनंत है, इसकी सीमाएँ नहीं, और यही भारत की आत्मा है।

4. रामलाल (RSS)

देश में कहीं दो-चार जगह हुई घटनाओं को राष्ट्रीय संकट बना देना गलत है। भारत जैसे विविध समाज में सबकी सोच एक जैसी नहीं हो सकती, इसलिए संवाद अनिवार्य है।

5. रामलाल (RSS)

उन्होंने क्रिसमस का उदाहरण देते हुए कहा कि लाखों जगह शांति से त्योहार मनाया गया, लेकिन कुछ स्थानों की घटनाओं को पूरे देश से जोड़ना अनुचित है।

6. लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) ज़मीरुद्दीन शाह

सोशल मीडिया नफरत फैलाने का सबसे खतरनाक औज़ार बन गया है। हालात ऐसे हो गए हैं कि आज नाम पूछकर हिंसा की घटनाएँ सामने आ रही हैं।

7. लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) ज़मीरुद्दीन शाह

उन्होंने RSS से अपील की कि यदि संगठन मानता है कि 20% लोग फ्रिंज हैं, तो उन्हें नियंत्रित करना ज़रूरी है—क्योंकि एक खराब पुर्जा पूरी मशीन को जाम कर देता है।

8. नजीब जंग (पूर्व उपराज्यपाल, दिल्ली)

अल्पसंख्यकों पर हमलों, घर गिराने और झूठ फैलने के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर उन्होंने सीधा सवाल उठाया और इसे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताया।

9. नजीब जंग (पूर्व उपराज्यपाल, दिल्ली)

इतिहास को आधा-अधूरा और तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। आज के मुसलमानों को अतीत की घटनाओं के लिए दोषी ठहराना अन्यायपूर्ण है।

10. नजीब जंग (पूर्व उपराज्यपाल, दिल्ली)

उन्होंने कहा कि सहिष्णुता और सम्मान दोनों तरफ से ज़रूरी हैं—गाय वध निंदनीय है, लेकिन ‘काफ़िर’ जैसे शब्द भी समाज को तोड़ते हैं।

11. डॉ. कृष्ण गोपाल (RSS)

उन्होंने कहा कि ‘हिंदुत्व’ से अधिक उपयुक्त अवधारणा ‘हिंदूनेस’ है, क्योंकि यह प्रेम, स्वीकार्यता और समावेश पर आधारित एक अनंत व निरंतर भारतीय परंपरा है, जो किसी को बाहर नहीं करती।

 

मुख्य खबर :

नई दिल्ली | 16 जनवरी 2026

संवाद से समाधान की कोशिश, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा

देश में बढ़ती सामाजिक और सांप्रदायिक बेचैनी, सोशल मीडिया के माध्यम से फैलती नफरत, फ्रिंज एलिमेंट्स की उकसावे वाली गतिविधियों और अल्पसंख्यकों के बीच गहराती असुरक्षा की भावना के बीच, इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के मंच पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समयोचित ‘इंटरफेथ डायलॉग’ का आयोजन किया गया। यह संवाद फाउंडेशन के अध्यक्ष ख्वाजा इफ्तिखार अहमद के नेतृत्व में आयोजित हुआ। “यूनिटी फॉर पीस एंड प्रोग्रेस” (शांति और प्रगति के लिए एकता) थीम पर आयोजित इस संवाद में RSS के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. कृष्ण गोपाल और श्री रामलाल, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. क़ुरैशी, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीरुद्दीन शाह, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. शालिनी अली, सामाजिक कार्यकर्ता जासिम मुहम्मद, NCPUL के निदेशक शम्स इक़बाल, मेजर मुहम्मद शाह अली, सईद शेरवानी, वरिष्ठ पत्रकार शाहिद सईद (नेशनल कन्वीनर, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच) और कन्वीनर नावेद ख़ान सहित अनेक अन्य प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भाग लिया। विभिन्न वर्गों और वैचारिक पृष्ठभूमियों का प्रतिनिधित्व करने वाले ये सभी वक्ता एक ही मंच पर एकत्र हुए, जिनका साझा उद्देश्य संवाद के माध्यम से सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करना था।

एकता, समावेश और शांति पर ज़ोर : कृष्ण गोपाल ने नेहरू के ऐतिहासिक भाषण की तारीफ की

संवाद के दौरान एकता, समावेश और शांति की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए नफरत की राजनीति, फ्रिंज एलिमेंट्स की भूमिका और ऐसे मौकों पर शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर प्रधानमंत्री की चुप्पी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा हुई। डॉक्टर कृष्ण गोपाल ने यह भी रेखांकित किया कि भारत की असली ताकत उसका संवाद और समावेश की परंपरा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इसकी ऐतिहासिक मिसाल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आज़ादी के ठीक एक साल बाद 24 जनवरी 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिए अपने भाषण में दी थी, जहाँ उन्होंने युवाओं से उनकी विरासत, परंपरा और राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना पर आत्ममंथन करने का आह्वान करते हुए राष्ट्रवाद को धर्म से ऊपर रखा था। इसी सोच का हवाला देते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज भी भारत को जोड़ने का रास्ता संवाद, आपसी सम्मान और साझा राष्ट्रीय चेतना से होकर ही जाता है—न कि डर, नफरत और अविश्वास से।

वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी एक घटना या कुछ लोगों के कृत्य को पूरे समाज पर थोपना खतरनाक सोच है। कहा गया कि न तो पूरा मुस्लिम समाज एक जैसी सोच रखता है और न ही पूरा हिंदू समाज किसी एक विचारधारा में बंधा है। हर समाज, हर जाति और हर धर्म में फ्रिंज एलिमेंट्स होते हैं, जो उकसावे और भड़काऊ कार्रवाई करते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब इन सीमित घटनाओं को राष्ट्रीय पहचान का सवाल बना दिया जाता है।

“एक-दो घटनाओं को राष्ट्रीय घटना बनाना गलत”

RSS के वरिष्ठ नेता रामलाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि देश के किसी कोने में दो-चार जगह पत्थरबाज़ी हो जाए, तो उसे पूरे देश की राष्ट्रीय समस्या बताना सही नहीं। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएँ होनी नहीं चाहिए, लेकिन यह भी सच है कि भारत जैसे विविध समाज में सभी की सोच एक जैसी नहीं हो सकती। इसी विविधता के कारण संवाद अनिवार्य हो जाता है। उन्होंने क्रिसमस का उदाहरण देते हुए कहा कि देश में लाखों जगह क्रिसमस शांतिपूर्वक मनाया गया, लेकिन यदि 5-6 स्थानों पर विरोध हुआ, तो उसे स्थानीय मुद्दा माना जाना चाहिए, न कि पूरे देश का संकट।

“फ्रिंज एलिमेंट बीमारी नहीं, लक्षण हैं”

RSS नेता डॉ. कृष्ण गोपाल ने चर्चा को वैचारिक गहराई देते हुए कहा कि फ्रिंज एलिमेंट्स खुद समस्या नहीं, बल्कि किसी गहरी बीमारी के लक्षण हैं। उन्होंने कहा, अगर हम सिर्फ लक्षणों से लड़ते रहे और बीमारी को नहीं पहचानेंगे, तो समाधान नहीं निकलेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवाद का अर्थ यह नहीं कि कोई अपनी बात मनवा ले, बल्कि संवाद का असली मतलब है—दूसरे को सुनना। भारत की परंपरा निष्कर्ष से ज़्यादा संवाद को महत्व देती है।

“हिंदुत्व नहीं, हिंदूनेस—समावेश ही भारत की आत्मा”

डॉ. कृष्ण गोपाल ने एक अहम वैचारिक बिंदु रखते हुए कहा कि ‘हिंदुत्व’ शब्द से ज्यादा सही शब्द ‘हिंदूनेस’ है, क्योंकि यह पूरी तरह समावेशी है। उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा किसी को बाहर नहीं करती—कबीर, तुलसी, विवेकानंद, खुसरो, चिश्ती परंपरा, सब भारतीय सांस्कृतिक ढांचे का हिस्सा हैं। हिंदूनेस एक फ्रेम है, जिसकी कोई सीमा नहीं। यह प्रेम और स्वीकार्यता पर आधारित है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म अनंत है, समावेशी है। इसकी सीमाएँ भी अनंत हैं। निरंतरता ही हिंदू धर्म है। कभी न समाप्त होने वाली यात्रा ही हिंदू धर्म है।

“सोशल मीडिया नफरत का सबसे बड़ा औज़ार बन गया”

लेफ्टिनेंट जनरल (रि.) जमीरुद्दीन शाह ने बेहद गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि पिछले तीन वर्षों में सोशल मीडिया के ज़रिए नफरत का ज़हर असाधारण रूप से बढ़ा है। उन्होंने कहा, आज हालात ऐसे हैं कि सिर्फ नाम पूछकर पीटा जाना आम होता जा रहा है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक संकेत है। उन्होंने RSS से अपील की कि यदि संगठन मानता है कि 20 प्रतिशत लोग फ्रिंज हैं, तो उन्हें पहचानकर नियंत्रित करना ज़रूरी है, क्योंकि मशीन का छोटा-सा खराब पुर्जा भी पूरी मशीन को जाम कर देता है।

“मीडिया और सिनेमा पर भी नियंत्रण ज़रूरी”

संवाद में कई वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि सोशल मीडिया, कुछ न्यूज़ चैनल और हिंदी सिनेमा नफरत फैलाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। कहा गया कि यदि शीर्ष नेतृत्व सख्ती से संदेश दे, तो हेट स्पीच अपने-आप बंद हो सकती है, क्योंकि समाज आज भी नेतृत्व की बात सुनता है।

“नफरत के वक्त प्रधानमंत्री की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल”

इस पूरे संवाद में सबसे तीखा और संवेदनशील सवाल पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने उठाया। उन्होंने कहा, “जब अल्पसंख्यकों पर हमले होते हैं, घर गिराए जाते हैं, झूठ फैलाया जाता है, तब देश के प्रधानमंत्री चुप क्यों रहते हैं? हर मुद्दे पर बोलने वाले प्रधानमंत्री यह क्यों नहीं कहते कि हम सब बराबर हैं?” उन्होंने कहा कि जब बात होती है कि हम सबका डीएनए एक है, तो फिर मुसलमानों से बार-बार उनकी राष्ट्रभक्ति पर सवाल क्यों किया जाता है—देश में भी और विदेशों में भी।

“इतिहास को आधा-अधूरा पढ़ाया जा रहा है”

नजीब जंग ने कहा कि इतिहास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। यदि अतीत में मंदिर टूटे, तो वह नई सत्ता या नई संस्कृति के दौर में हुआ। आज के मुसलमानों को उस इतिहास के लिए दोषी ठहराना न तो न्यायसंगत है और न ही तार्किक। उन्होंने नफरत फैलाने वाले चैनलों को समाज को बांटने वाला कलंक बताया।

“सम्मान और जिम्मेदारी—दोनों ज़रूरी”

नजीब जंग ने यह भी कहा कि गाय वध निंदनीय है और मुसलमानों को देश की व्यापक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। साथ ही उन्होंने ‘काफ़िर’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की कड़ी निंदा की। उनका कहना था कि सहिष्णुता एकतरफा नहीं हो सकती—यह दोनों ओर से आनी चाहिए।

“प्रेम, एकता और प्रगति ही रास्ता” : संवाद बढ़े, नफरत घटे—यही भारत की राह

इस इंटरफेथ डायलॉग से एक बात साफ होकर सामने आई—समस्या जटिल है, समाधान आसान नहीं, लेकिन संवाद के बिना कोई रास्ता नहीं। हर घटना को राष्ट्रीय टकराव बनाना बंद करना होगा, फ्रिंज एलिमेंट्स पर सख्ती करनी होगी, मीडिया की जिम्मेदारी तय करनी होगी और सबसे अहम—शीर्ष नेतृत्व को नफरत के खिलाफ साफ और मजबूत संदेश देना होगा। यही भारत को शांति, एकता और प्रगति की दिशा में आगे ले जा सकता है। धर्म के नाम पर नहीं, प्रगति, एकता और प्रेम के नाम पर बात होनी चाहिए। फौज में कोई धर्म नहीं देखा जाता—वहाँ सिर्फ कर्तव्य और राष्ट्र होता है। यही सोच समाज में भी लानी होगी।

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments