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गौतम गंभीर के नेतृत्व में भारतीय टेस्ट टीम का पतन: 36 साल के रिकॉर्ड टूटे, घरेलू बादशाहत ढही, इतिहास में सबसे खराब दौर का आरोप

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संजीव भाई | नई दिल्ली 25 नवंबर 2025

गौतम गंभीर की कोचिंग और रणनीतिक फैसलों के तहत भारतीय टेस्ट क्रिकेट टीम जिस परिवर्तन और ‘नए आक्रामक युग’ के वादे के साथ आगे बढ़ी थी, वह अब सवालों के घेरे में है। भारत, जो दशकों तक अपने घरेलू मैदानों पर अजेय माना जाता रहा, अचानक कमजोर, अस्थिर और रिकॉर्ड-तोड़ हारों से जूझती टीम के रूप में दिखाई दे रहा है। गंभीर के कार्यकाल में भारतीय टीम ने वह मजबूती खो दी जो टेस्ट क्रिकेट में उसकी पहचान थी—मेलबर्न, वानखेड़े, चिन्नास्वामी और लार्ड्स जैसे प्रतिष्ठित मैदान, जहां भारत ने वर्षों तक अपना दबदबा बनाए रखा था, अब भारतीय टीम की असफलताओं के प्रतीक बनते जा रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि भारत ने न्यूजीलैंड जैसे प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ 36 वर्षों में पहली बार घरेलू टेस्ट सीरीज गंवाई, वह भी 3-0 के शर्मनाक व्हाइटवॉश के रूप में, जो टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में भारत की सबसे दुर्लभ और निराशाजनक घटनाओं में से एक माना जा रहा है।

भारतीय क्रिकेट इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि टीम घरेलू परिस्थितियों में 50 रन से भी कम स्कोर पर ढेर हो गई, वह भी उस देश में जहां स्पिन और बल्लेबाजी की मजबूती भारत की सबसे बड़ी पहचान रही है। लगातार 12 साल बाद भारत ने घर में बैक-टू-बैक टेस्ट मैच गंवाए, और वानखेड़े जैसे किले में 12 वर्षों बाद हार मिली, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि टीम न केवल आत्मविश्वास बल्कि रणनीतिक स्थिरता भी खो चुकी है। इससे भी अधिक चिंता का विषय यह रहा कि पहली बार भारत किसी घरेलू टेस्ट सीरीज में 3-0 से व्हाइटवॉश हुआ, जिससे आलोचकों ने इसे भारतीय टेस्ट क्रिकेट का ‘सबसे खराब अध्याय’ कहना शुरू कर दिया। टीम चयन में बार-बार बदलाव, स्थायी नंबर-3 बल्लेबाज न ढूंढ पाना, और मैचों में शुरुआती सत्रों में ढह जाना इस गिरावट के प्रमुख कारणों में गिने जा रहे हैं।

विदेशी दौरों पर भी भारत का प्रदर्शन दयनीय रहा। मेलबर्न में 13 वर्षों बाद टेस्ट हार, इंग्लैंड के खिलाफ लीड्स में 350+ रन बचाने में विफलता—जो 92 साल के टेस्ट इतिहास में सिर्फ दूसरी बार हुआ—ने टीम की गेंदबाजी और मानसिक मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए। मैनचेस्टर में 11 साल बाद 600+ रन लीक करना और 200 से कम लक्ष्य का पीछा करने में असफल होना यह दर्शाता है कि टीम अब न तो बड़े स्कोर बना पा रही है और न ही छोटे लक्ष्य हासिल कर पा रही है। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 15 साल बाद टेस्ट हार और घर में 124 रनों जैसे मामूली लक्ष्य का पीछा न कर पाना भारतीय क्रिकेट के लिए चेतावनी की घंटी साबित हो रहा है। गंभीर के कार्यकाल में भारत पहली बार WTC फाइनल के लिए क्वालीफाई करने में असफल रहा, जिसने टीम प्रबंधन और चयन नीतियों पर और भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

कुल मिलाकर, यह दौर ऐसे समय में आया है जब भारतीय टेस्ट टीम को विश्व क्रिकेट में अपना दबदबा बनाए रखना था। गंभीर के नेतृत्व में रिकॉर्ड-तोड़ नकारात्मक आंकड़ों ने टीम की कीर्ति, रणनीति और मानसिक शक्ति पर गंभीर चोट पहुंचाई है। भारत के पास प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन उसके उपयोग और संयोजन में बड़ी खामियां दिखाई दे रही हैं। यदि यह गिरावट नहीं रोकी गई, तो भारतीय टेस्ट क्रिकेट आने वाले वर्षों में अपनी ऐतिहासिक पहचान खो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि भारतीय क्रिकेट प्रबंधन गंभीर मूल्यांकन करे—क्या समस्या रणनीति में है, चयन में है, या नेतृत्व में। एक बात साफ है: भारत अब टेस्ट क्रिकेट में उस ऊंचाई पर नहीं है जहां वह कभी अजेय माना जाता था।

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