आलोक कुमार 21 दिसंबर 2025
आज का समय ऐसा हो गया है कि मोबाइल हाथ में लेते ही मन में एक अजीब-सा डर बैठ जाता है। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए कब कौन-सी तस्वीर या वीडियो सामने आ जाए, यह कोई नहीं जानता। कई बार जो दिखता है, वह सच नहीं होता, लेकिन उसका असर बिल्कुल सच जैसा ही होता है। एआई से बनी फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो अब किसी तकनीकी प्रयोग या मजाक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये महिलाओं के खिलाफ डिजिटल यौन हिंसा का सबसे खतरनाक हथियार बन चुके हैं। इनका वार सिर्फ स्क्रीन पर नहीं रुकता, बल्कि सीधे महिला की इज्जत, मानसिक शांति, परिवार, नौकरी और कई मामलों में उसकी पूरी जिंदगी को तहस-नहस कर देता है।
5 दिसंबर 2025 को दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की एक अहम बैठक हुई, जहां इस बढ़ते खतरे पर गंभीर चिंता जताई गई। यूएनएफपीए की भारत प्रतिनिधि एंड्रिया एम. वोजनार ने साफ शब्दों में कहा कि साइबरस्टॉकिंग, फेक प्रोफाइल बनाना, बिना इजाजत फोटो-वीडियो शेयर करना और डीपफेक अब सिर्फ ऑनलाइन बदतमीजी नहीं रह गए हैं, बल्कि यह मानवाधिकार संकट का रूप ले चुके हैं। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में बनाए जा रहे डीपफेक पोर्नोग्राफिक कंटेंट में से 95 से 99 प्रतिशत सीधे महिलाओं को निशाना बनाते हैं। यानी तकनीक की मार सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ रही है।
भारत में हालात और भी ज्यादा डराने वाले हैं। रति फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि 2025 के पहले 10 महीनों में उनकी हेल्पलाइन पर आने वाली हर 10 में से 1 कॉल एआई-जनित उत्पीड़न से जुड़ी थी। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि खतरा कितनी तेजी से फैल रहा है। वैश्विक स्तर पर 96 प्रतिशत डीपफेक वीडियो बिना सहमति के बनाए गए यौन कंटेंट हैं और भारत में भी यही ट्रेंड साफ दिख रहा है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से 2024 के बीच महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों में तेज उछाल आया है, लेकिन इनमें से ज्यादातर मामले या तो दर्ज ही नहीं होते या फिर सालों तक लटके रहते हैं।
इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया किशोर राहतकर ने नवंबर 2025 में सरकार को पत्र लिखकर साइबर कानूनों में बड़े और ठोस बदलाव की मांग की। उन्होंने बेहद सटीक बात कही—“अक्सर महिलाएं तब शिकायत करती हैं, जब नुकसान हो चुका होता है। डीपफेक बनाने वाले का पता लगाना मुश्किल होता है, लेकिन उसका असर तुरंत महिला की जिंदगी, उसकी नौकरी और उसकी सुरक्षा पर पड़ता है।” आयोग ने सुझाव दिया कि एआई से बनी फर्जी तस्वीरों और वीडियो को अलग से गंभीर अपराध माना जाए, बिना अनुमति फैलाए गए कंटेंट को तुरंत हटाने के सख्त प्रावधान हों, सोशल मीडिया कंपनियों को 24 से 48 घंटे के भीतर कार्रवाई के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार बनाया जाए और जिला अदालतों को त्वरित राहत देने का अधिकार मिले, क्योंकि हाई कोर्ट हर पीड़िता की पहुंच में नहीं होते।
हाल की एक घटना इस दर्दनाक सच्चाई को और साफ कर देती है। एक जानी-मानी अभिनेत्री की एआई से बदली गई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। उन्होंने वीडियो जारी कर कहा, “ये तस्वीरें मेरी मर्जी के बिना बनाई और फैलाई गईं। ये इंटरनेट पर हमेशा रहेंगी। सोचकर डर लगता है कि मेरा बच्चा कभी इन्हें देखेगा।” यह सिर्फ एक अभिनेत्री की कहानी नहीं है। कई मामलों में थर्ड-पार्टी लोन ऐप्स पैसे न लौटाने पर महिलाओं की तस्वीरों को अश्लील बनाकर व्हाट्सएप ग्रुप्स में शेयर कर ब्लैकमेल करते हैं। रति फाउंडेशन के प्रोग्राम लीड समीर पी. बताते हैं कि एक बार ऐसा कंटेंट वायरल हो जाए, तो वह बार-बार लौटकर पीड़िता को मानसिक रूप से तोड़ता रहता है, जैसे जख्म भरने से पहले ही फिर हरा कर दिया गया हो।
समस्या इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि एआई टूल्स अब बेहद आसान और सस्ते हो चुके हैं। भारत ओपन एआई का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। कुछ मिनटों और कुछ रुपये में कोई भी किसी की फोटो या वीडियो बदल सकता है। इस तकनीक का सबसे खतरनाक असर नाबालिग लड़कियों पर पड़ रहा है। उनकी पढ़ाई छूट जाती है, परिवार डर में जीने लगता है और कई बार उन्हें घर से बाहर निकलने तक से रोक दिया जाता है। गलती किसी की नहीं होती, लेकिन सजा लड़की को मिलती है।
कानूनी स्तर पर स्थिति अब भी कमजोर है। आईटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता में कुछ प्रावधान जरूर हैं, लेकिन वे एआई और डीपफेक जैसे नए अपराधों के लिए पर्याप्त नहीं हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने कुछ मामलों में तुरंत आदेश दिए हैं, जैसे इन्फ्लुएंसर कामिया बुच के केस में प्लेटफॉर्म्स से कंटेंट हटवाया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि साइबर सेल पहले से ही बोझ में दबे हुए हैं और कार्रवाई अक्सर देर से होती है—तब तक नुकसान हो चुका होता है।
2025 का वैश्विक थीम “UNiTE to End Digital Violence against All Women and Girls” इसी सच्चाई की ओर इशारा करता है। सरकार डिजिटल शक्ति जैसे अभियान चला रही है, फास्ट ट्रैक कोर्ट बढ़ाने की बात कर रही है, लेकिन यह काफी नहीं है। जरूरत है सख्त कानूनों, सोशल मीडिया कंपनियों पर भारी जुर्माने, पुलिस और न्याय प्रणाली को मजबूत करने और सबसे जरूरी—समाज में जागरूकता की।
आखिरकार, यह सिर्फ टेक्नोलॉजी की समस्या नहीं है। यह हमारी सोच, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का आईना है। जब तक महिलाएं डिजिटल दुनिया में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी, तब तक बराबरी और आजादी सिर्फ शब्द बनकर रह जाएंगे। अब समय आ गया है कि हम इस डरावनी हकीकत से आंख न चुराएं, बल्कि मिलकर इसके खिलाफ खड़े हों—क्योंकि चुप्पी भी इस अपराध की सबसे बड़ी साथी बन चुकी है।




