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सरकार कहे सब ठीक, ज़मीनी सच्चाई—सत्तू-चूड़ा खाकर पलायन को मजबूर लोग

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राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | ब्यूरो रिपोर्ट | 3 अप्रैल 2026

एक महीने से गैस नहीं मिल रही। पूरा परिवार सत्तू और चूड़ा खाकर गुजारा कर रहा है, इसलिए अब गांव जा रहा हूं… ये कहते हुए पलायन कर रहे शख्स का गला भर गया। आंखों में आंसू, हाथों में खाली सिलेंडर। परिवार के बच्चे भूख से तड़प रहे हैं, लेकिन चूल्हा जलाने को गैस का एक भी सिलेंडर नहीं। ये कोई पुरानी कहानी नहीं, बल्कि मार्च-अप्रैल 2026 की जमीनी हकीकत है। दिल्ली-मुंबई से लेकर छोटे शहरों तक गैस की किल्लत ने आम आदमी की रसोई को बर्बाद कर दिया है।

ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, और भारत की 50% से ज्यादा एलपीजी आयात इसी रास्ते से आती है। नतीजा? घर-घर में कतारें, 25 दिन का नया नियम, और गरीबों का पलायन।

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, अहमदाबाद—हर बड़े शहर में यही हाल है। गैस एजेंसियों के बाहर लोग दिन-रात लाइन में खड़े हैं। कुछ को 8-10 दिन इंतजार के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। होटल-रेस्तरां बंद हो रहे हैं, चाय बागानों में काम ठप, मजदूर बेरोजगार। गुजरात के मोरबी में सिरेमिक फैक्टरियां, दार्जिलिंग के चाय बागान—सब जगह गैस की कमी से हजारों नौकरियां खतरे में। लेकिन केंद्र सरकार? बस “कोई किल्लत नहीं” का राग अलाप रही है।

नरेंद्र मोदी और बीजेपी के नेता लाखों बार टीवी पर, संसद में, सोशल मीडिया पर झूठ बोल चुके हैं। “उज्ज्वला योजना ने गरीबों की रसोई रोशन कर दी”, “अच्छे दिन आ गए”, “आत्मनिर्भर भारत”। लेकिन हकीकत ये है कि करोड़ों उज्ज्वला लाभार्थियों को रिफिल के पैसे नहीं चुकते। सब्सिडी आधी-अधूरी, डीबीटी में देरी, आधार सीडिंग की गड़बड़। RTI रिपोर्ट्स कहती हैं—लाखों कनेक्शन लिए गए, लेकिन सालों से सिलेंडर नहीं भरा गया क्योंकि महंगा पड़ता है। अब तो नया 25 दिन का नियम भी लग गया है होर्डिंग रोकने के नाम पर, लेकिन असल में गरीबों को और परेशान करने के लिए।

सरकार कह रही है—74 दिन का स्टॉक है, रिफाइनरियों को इमरजेंसी पावर देकर प्रोडक्शन बढ़ा दिया। लेकिन ग्राउंड जीरो पर? लोग सत्तू-चूड़ा पर गुजारा कर रहे हैं। लकड़ी-उपले जलाकर धुआं खा रहे हैं। कुछ परिवार गांव लौट रहे हैं क्योंकि शहर में रहने का मतलब अब सिर्फ भूख और महंगाई है। मुंबई-बेंगलुरु के होटल एसोसिएशन ने चेतावनी दी—तीसरे दिन से आधे रेस्टोरेंट बंद। दिल्ली में कतारें इतनी लंबी कि लोग थककर घर लौट जाते हैं।

मोदी सरकार ने ईरान युद्ध को “बाहरी वजह” बता दिया, लेकिन सवाल ये है—क्यों इतने सालों में पाइप्ड गैस (PNG) को बढ़ावा नहीं दिया? क्यों आयात पर निर्भरता खत्म नहीं की? क्यों उज्ज्वला के नाम पर सिर्फ कनेक्शन बांटे गए, लेकिन सस्टेनेबल सब्सिडी और सप्लाई चेन नहीं बनाई? अब जब संकट आया तो घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देकर कमर्शियल गैस बंद कर दी, लेकिन गरीबों का क्या? वो तो पहले से ही सिलेंडर भरने का इंतजार कर रहे थे।

ये दर्द सिर्फ एक परिवार का नहीं। लाखों गरीब परिवारों का है, जिन्हें “सबका साथ, सबका विकास” का नारा दिया गया था। आज वो सत्तू-चूड़ा खा-खाकर गांव भाग रहे हैं। मोदी और बीजेपी नेताओं की “लाख झूठ” की राजनीति अब जमीनी हकीकत के आगे बेनकाब हो चुकी है। लोग अब सिर्फ वादों नहीं, रसोई में जलती आग देखना चाहते हैं। अगर सरकार अभी नहीं जागी, तो ये पलायन का सिलसिला और बढ़ेगा। सच का आईना टूट चुका है। अब सिर्फ आवाज बुलंद करने की बारी है।

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