एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 9 फरवरी 2026
संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पैदा हुआ गतिरोध अब केवल संसदीय व्यवधान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़े राजनीतिक और लोकतांत्रिक टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार और लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पर सीधे और गंभीर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया कि उन्हें जानबूझकर सदन में बोलने से रोका गया, क्योंकि सरकार खुली बहस से डरती है। राहुल गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मामला किसी एक नेता का नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष की आवाज़ को दबाने की कोशिश है, जो संसदीय लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
“स्पीकर ने खुद आश्वासन दिया, फिर भी बोलने नहीं दिया गया”
राहुल गांधी ने संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए बताया कि लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने से लगभग एक घंटे पहले वह स्वयं लोकसभा अध्यक्ष से मिले थे। उस मुलाकात में उन्हें स्पष्ट रूप से यह आश्वासन दिया गया था कि बजट पर चर्चा शुरू होने से पहले उन्हें कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने का अवसर मिलेगा। लेकिन जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई, तो न केवल उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी गई, बल्कि उनके सवाल उठाने के हर प्रयास को बार-बार टाल दिया गया। राहुल गांधी ने इसे संसदीय परंपराओं का खुला उल्लंघन बताते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोकना लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा प्रहार है।
नरवणे किताब विवाद से शुरू हुआ पूरा टकराव
राहुल गांधी ने पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि यह विवाद कुछ दिन पहले नरवणे की किताब से जुड़े मुद्दे से शुरू हुआ। उनके अनुसार, सरकार नहीं चाहती थी कि वह इस विषय पर संसद में कोई चर्चा करें। पहले उन्हें कहा गया कि वह किसी किताब का हवाला नहीं दे सकते। जब उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किताब नहीं, बल्कि एक पत्रिका का उल्लेख कर रहे हैं, तब भी उन्हें रोक दिया गया। इसके बाद जब उन्होंने बिना किसी उद्धरण के मुद्दे पर बोलने की बात कही, तब भी अनुमति नहीं दी गई। राहुल गांधी के मुताबिक, रक्षा मंत्री ने यह दावा तक कर दिया कि वह किताब प्रकाशित ही नहीं हुई, जबकि किताब प्रकाशित हो चुकी है और उसकी प्रति मौजूद है।
“राष्ट्रपति के अभिभाषण पर भी विपक्ष को चुप कराया गया”
राहुल गांधी ने कहा कि यह सिलसिला केवल एक दिन या एक मुद्दे तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान भी नेता प्रतिपक्ष और पूरे विपक्ष को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के एक सदस्य ने कई किताबों का हवाला देते हुए लंबा भाषण दिया और आपत्तिजनक टिप्पणियां भी कीं, लेकिन उस पर कोई रोक नहीं लगी। राहुल गांधी ने कहा कि इससे साफ जाहिर होता है कि सदन में एकतरफा नियम लागू किए जा रहे हैं—जहां सत्ता पक्ष को पूरी छूट है और विपक्ष को पूरी तरह चुप कराने की कोशिश की जा रही है।
सांसदों के निलंबन पर तीखी आपत्ति
नेता प्रतिपक्ष ने विपक्षी सांसदों के निलंबन को भी गंभीर लोकतांत्रिक मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि सवाल पूछने और जवाब मांगने वाले सांसदों को निलंबित करना सरकार की असहजता और डर को दर्शाता है। राहुल गांधी के अनुसार, यह निलंबन केवल सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह संसद की बहस और जवाबदेही की संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को सीधा नुकसान पहुंचता है।
प्रधानमंत्री को लेकर लगाए गए आरोपों पर सख्त प्रतिक्रिया
राहुल गांधी ने सबसे कड़ा और गंभीर बयान उस दावे को लेकर दिया, जिसमें कहा गया था कि विपक्षी सांसद प्रधानमंत्री को धमकी देने वाले थे। उन्होंने इस आरोप को पूरी तरह झूठा, निराधार और भ्रम फैलाने वाला बताया। राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि यदि वास्तव में ऐसी कोई धमकी दी गई थी, तो अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई और किसी की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई। उन्होंने साफ कहा कि सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदन में इसलिए नहीं आए, क्योंकि वह उन सवालों का सामना नहीं करना चाहते थे, जो विपक्ष उठाने वाला था।
“सरकार बजट बहस से भी भाग रही है”
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार न केवल सामान्य बहस से, बल्कि बजट पर खुली और गंभीर चर्चा से भी डर रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका से जुड़े समझौते, उनके दूरगामी प्रभाव और किसानों पर पड़ने वाले असर जैसे मुद्दे सरकार को असहज कर रहे हैं। यही वजह है कि विपक्ष को बोलने से रोका जा रहा है और सदन की कार्यवाही को बार-बार स्थगित किया जा रहा है। राहुल गांधी ने दो टूक कहा कि विपक्ष बहस चाहता है, लेकिन सरकार चर्चा से बचने का रास्ता अपना रही है।
आगे क्या—संवाद या टकराव?
राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि विपक्ष लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना चाहता है और बहस से पीछे हटने वाला नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले दिनों में सरकार सदन में चर्चा की अनुमति देगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल होगी। हालांकि, विपक्षी खेमे में यह संकेत भी मिल रहे हैं कि यदि लगातार विपक्ष की आवाज़ दबाई जाती रही, तो और कड़े राजनीतिक कदम उठाए जा सकते हैं। फिलहाल संसद का माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है और देश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार संवाद का रास्ता चुनेगी या टकराव और गहराएगा।




