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हरित भ्रम का खेल: नागरिक हाशिए पर, गाड़ियाँ कबाड़, लॉबी मालामाल और सिस्टम बेदाग… आ गए अच्छे दिन

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प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री

नीति और पर्यावरण के नाम पर जो कुछ दिल्ली – एनसीआर में हो रहा है, वह आम आदमी के लिए किसी झटके से कम नहीं है। ऐसा लगता है जैसे भारत ने एक अजीब कला सीख ली हो—चलती-फिरती, काम की चीज़ों को बोझ में बदल देना; लोगों की मेहनत की कमाई को कबाड़ में फेंक देना; और सबसे खतरनाक बात, नागरिकों को ही अपराधी बना देना। यह सब बिना उस मूल समस्या को ठीक किए, जिसकी वजह से हालात बिगड़े। वाहन स्क्रैप नीति को हरियाली का नाम दिया जा रहा है, लेकिन असल में यह प्रशासनिक ज़िद, नीति की आलस भरी सोच और ताकतवर लॉबियों के हितों से जुड़ा फैसला दिखता है। दिल्ली को सिर्फ एक उदाहरण बनाया गया है—एक टेस्ट केस—ताकि कल यही मॉडल पूरे देश पर थोपा जा सके।

एनसीआर की सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा जटिल और दर्दनाक है। इस पूरे इलाके में करीब चार करोड़ वाहन हैं, जिनमें अकेली दिल्ली में लगभग दस लाख कारें शामिल हैं। इन चार करोड़ में से तीन करोड़ से ज़्यादा वाहन ऐसे हैं, जिन्हें नए मानकों के हिसाब से “पुराना” बता दिया गया है। मतलब यह कि कल तक जो गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी, आज वह अचानक गैरकानूनी हो गई। हैरानी की बात यह है कि करीब 18 लाख करोड़ रुपये की लोगों की मेहनत की कमाई—यानी इस्तेमाल लायक कारें—कबाड़ में बदलने पर भी किसी को कोई बड़ी आपत्ति नहीं दिखती। यह सब ऐसे इलाके में किया जा रहा है, जहां आने-जाने का सिस्टम पहले ही बेहद कमजोर है। मेट्रो कुछ सीमित इलाकों को जोड़ती है, लेकिन पूरे एनसीआर को नहीं। नतीजा यह है कि जिन लोगों की रोज़ी-रोटी उनकी आवाजाही पर निर्भर है, वे अचानक बेबस हो गए हैं।

दुनिया का कोई भी देश गाड़ियों को तोड़कर अमीर नहीं बना। लेकिन भारत में ऐसा लगता है कि यही रास्ता चुना गया है। दिल्ली में लाखों ऐसी कारें हैं, जो प्रदूषण बहुत कम करती हैं, लेकिन सिर्फ उम्र के आधार पर उन्हें हटाने की तैयारी कर ली गई। यह फैसला कुछ समय के लिए लोगों के विरोध से रुका, मगर जैसे ही सर्दियां आईं और AQI का डर दिखाया गया, वही नीति दोबारा सामने आ गई। यह पर्यावरण की चिंता नहीं लगती, बल्कि अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर सीधा हमला महसूस होता है।

दिल्ली का प्रदूषण कोई नई कहानी नहीं है। दशकों से यहां सर्दियों में धुंध और स्मॉग रहा है। फर्क बस इतना है कि अब इसे डर के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। हर साल सर्दियों में AQI के आंकड़े दिखाए जाते हैं और फिर आम लोगों की गाड़ियों पर कार्रवाई शुरू हो जाती है। सड़कों पर जब्ती, दिल्ली की सीमाओं पर रोक, और शहर को जाम में बदल देना—यह सब अब आम बात हो गई है। इसका असर सबसे ज्यादा उन लोगों पर पड़ता है, जो लोन लेकर गाड़ी खरीदते हैं और जिनके लिए यह उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। उन्हें पर्यावरण का दुश्मन बना दिया जाता है, जबकि राज्य खुद सार्वजनिक परिवहन देने में नाकाम रहा है।

एनसीआर का विस्तार खुद सरकार की नीतियों की वजह से बेतरतीब हुआ। घर काम से दूर बने, उद्योग बिना रेल और बस कनेक्शन के शिफ्ट हुए, बस सेवाएं घटती चली गईं और आखिरी मील की कनेक्टिविटी को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। फिर जब प्रदूषण बढ़ता है—जो तय है—तो सरकार उस खालीपन का दोष नागरिक पर डाल देती है। यह नीति में संवेदना की कमी और ज़बरदस्ती की राजनीति को साफ दिखाता है।

एक और सच्चाई है, जिस पर कोई खुलकर बात नहीं करता—जेवर एयरपोर्ट और उसके आसपास का अंधाधुंध निर्माण। लगातार खुदाई, भारी ट्रकों की आवाजाही, कंक्रीट प्लांट और बिना नियंत्रण उद्योगों ने पूरे इलाके की हवा खराब कर दी है। पूर्वी दिल्ली से लेकर पश्चिमी यूपी तक धूल और कण फैल चुके हैं। लेकिन इन बड़े प्रोजेक्ट्स पर सवाल उठाने की हिम्मत किसी में नहीं है। आम आदमी की गाड़ी रोकना आसान है, ताकतवर हितों से टकराना मुश्किल।

वाहन स्क्रैप नीति को जलवायु कार्रवाई कहा जा रहा है, लेकिन असल में यह लोगों को जबरन नई गाड़ियां खरीदने की ओर धकेलने का तरीका बनती जा रही है। इससे ऑटो कंपनियों, स्क्रैप कारोबार और इलेक्ट्रिक वाहन लॉबी को फायदा होता है। आज कहा जाता है BS-IV हटाओ, कल BS-VI पर सवाल उठेंगे। संदेश साफ है—भारत में टिकाऊ चीज़ खरीदना जोखिम भरा है, क्योंकि सरकार कभी भी उसे “पुराना” घोषित कर सकती है। ऐसी अनिश्चितता बचत और निवेश दोनों को कमजोर करती है।

भारत बड़े-बड़े GDP आंकड़ों की बात करता है, लेकिन सच्चाई यह है कि करोड़ों लोग आज भी सरकारी सहारे पर जी रहे हैं। आम आदमी की आय बहुत कम है। ऐसे में उसकी गाड़ी छीन लेना या उसे कबाड़ में बदलने पर मजबूर करना विकास नहीं, बल्कि उसकी रीढ़ तोड़ना है। संपत्ति नष्ट करके कोई देश समृद्ध नहीं बनता। यह सिर्फ ऊपर तक पैसा पहुंचाने का तरीका है, जिसकी कीमत मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग चुकाता है।

पर्यावरण की समस्या असली है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन उसका हल समझदारी, योजना और संतुलन से निकलता है—बड़े प्रदूषकों पर कार्रवाई, उद्योगों और निर्माण पर नियंत्रण, बेहतर सार्वजनिक परिवहन और बेहतर शहरी योजना से। जो हो रहा है, वह दिखावे की नीति है—डर, नाकेबंदी और अव्यवस्था। गाड़ियां तोड़ना आसान है, लेकिन इंसानियत से भरी, समझदार और दूरदर्शी व्यवस्था बनाना मुश्किल। यही चुनौती है, जिसे अब टाला नहीं जा सकता।

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