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ड्रग्स का काला खेल और मोदी सरकार का “ड्रग-फ्री इंडिया” का नारा

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नई दिल्ली 16 सितम्बर 2025

भारत में ड्रग्स का मुद्दा अब “राष्ट्रीय सुरक्षा संकट” बन चुका है, लेकिन सत्ताधारी दल इसे केवल भाषणों और नारेबाज़ी तक सीमित कर रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं कि मोदी सरकार “ड्रग-फ्री इंडिया” के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन जमीनी स्तर पर आंकड़े और घटनाएं बिल्कुल उल्टा सच बयान करती हैं।

गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर सितंबर 2021 में पकड़ी गई ₹21,000 करोड़ की हेरोइन की खेप इस पूरे सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी है। यह खेप अफगानिस्तान से आई थी और कहा गया कि इसे “तल्क पाउडर” बताकर आयात किया गया। कुछ दिन तक खबर सुर्खियों में रही, लेकिन उसके बाद न तो यह पता चला कि ड्रग्स किसने मंगाई थी, न यह कि वह कहां गई। इतना बड़ा मामला अगर दबा दिया जा सकता है, तो यह साफ है कि इसमें बड़े राजनीतिक और कॉरपोरेट नाम शामिल हैं।

अब आंकड़ों पर नज़र डालें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और NCB की रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 से 2022 के बीच 3.3 लाख से ज्यादा मामले NDPS Act के तहत दर्ज हुए और लाखों किलो ड्रग्स जब्त की गईं। पंजाब में 2022 में ही 9,972 NDPS मामले दर्ज किए गए और करीब 600 किलो हेरोइन पकड़ी गई। कश्मीर में तो हालत और भी खतरनाक है – जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार, 2020 के बाद से 4000 से ज्यादा NDPS मामले दर्ज किए गए और हजारों युवाओं को नशे की गिरफ्त से छुड़ाने के लिए डि-एडिक्शन सेंटर बनाए गए। घाटी में पाकिस्तान से ड्रग्स की तस्करी नई तरह का “नशे का जिहाद” बन चुकी है, जहां हथियारों और ड्रग्स को एक साथ सीमा पार भेजा जा रहा है।

मुंबई और गोवा में हाई-प्रोफाइल रेव पार्टियों और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े मामलों में हर साल हजारों किलो ड्रग्स पकड़ी जाती हैं। मुंबई NCB की रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 2021 में ही 2,445 किलो से ज्यादा नशीले पदार्थ जब्त किए गए। लेकिन हमेशा की तरह केवल छोटे मछलियों को ही पकड़ा जाता है और असली “किंगपिन” बाहर ही रहते हैं।

दिल्ली और उत्तर भारत के शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। दिल्ली पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि 2021-22 में NDPS Act के तहत 3000 से ज्यादा मामले दर्ज हुए और इसमें खासकर अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट की भूमिका सामने आई।

इतने बड़े-बड़े केस और आंकड़े होने के बावजूद आम आदमी को सिर्फ भाषण सुनने को मिलता है। असल सवाल यह है कि अगर सरकार वाकई जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है तो फिर क्यों गुजरात पोर्ट का मामला रहस्य बन गया? क्यों पंजाब और कश्मीर में लगातार तस्करी बढ़ती जा रही है? क्यों बॉलीवुड और गोवा के केसों में केवल छोटे लोग ही पकड़े जाते हैं?

सच्चाई यह है कि ड्रग्स का यह खेल बिना नेताओं, अफसरों और बड़े कारोबारी घरानों की मिलीभगत के चल ही नहीं सकता। आज हालत यह है कि जनता ड्रग्स से तबाह हो रही है, लेकिन असली अपराधी सुरक्षित और बेखौफ हैं। जब तक उनपर कार्रवाई नहीं होती, तब तक “ड्रग-फ्री इंडिया” केवल एक चुनावी जुमला और दिखावटी संकल्प भर रहेगा।

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