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रामनवमी का बदलता चेहरा: आस्था से शक्ति प्रदर्शन तक—समाज के लिए चेतावनी या राजनीति का संकेत?

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ओपिनियन | शिवानन्द तिवारी, उपाध्यक्ष राष्ट्रीय जनता दल एवं पूर्व सांसद | पटना | 30 मार्च 2026

पटना में 1952 से रह रहे एक व्यक्ति के तौर पर मैं यह कह सकता हूँ कि इस बार जैसी रामनवमी मैंने पहले कभी नहीं देखी। पहले यह त्योहार एक शांत, सादगीपूर्ण और श्रद्धा से भरा हुआ अवसर हुआ करता था। गाँवों में लोग झंडा बदलते थे, घरों में पूजा होती थी, खीर-पूड़ी बनती थी और पूरा माहौल एक परिवार जैसा लगता था। लेकिन इस बार जो तस्वीर सामने आई, वह बिल्कुल अलग थी। ऐसा लगा जैसे त्योहार की जगह कोई शक्ति प्रदर्शन का आयोजन हो रहा हो, जिसमें भक्ति पीछे छूट गई और आक्रामकता आगे आ गई।

मुझे साठ के दशक की याद है, जब मैं रांची में पढ़ता था। उस समय पहली बार मैंने हथियारों के साथ निकलने वाले रामनवमी जुलूस देखे थे। लेकिन तब यह परंपरा सिर्फ झारखंड के कुछ इलाकों—रांची, हजारीबाग, जमशेदपुर—तक सीमित थी। वहाँ प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती थी, क्योंकि माहौल संवेदनशील हो जाता था। बिहार के अधिकांश हिस्सों में ऐसा कभी नहीं हुआ। यहाँ रामनवमी हमेशा शांति, श्रद्धा और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक रही।

लेकिन अब स्थिति बदलती दिख रही है। इस बार तलवारें लहराते हुए जुलूस निकले, मोटरसाइकिलों पर भीड़ उमड़ी और एक आक्रामक माहौल बना। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि यह बदलाव सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिलाओं और युवतियों की भी बड़ी भागीदारी दिखी—लेकिन उसी आक्रामक अंदाज़ में। यह दृश्य केवल धार्मिक उत्सव का नहीं, बल्कि एक तरह के सामाजिक विभाजन और तनाव को बढ़ाने वाले अभियान जैसा लगा।

कई जगहों पर छोटे-छोटे तनाव और हिंसा की घटनाएँ भी सामने आईं। यह स्थिति किसी भी धार्मिक पर्व की मूल भावना के खिलाफ है। सवाल यह उठता है कि आखिर यह बदलाव क्यों हो रहा है? क्या यह सिर्फ समाज में स्वाभाविक परिवर्तन है या फिर किसी खास सोच के तहत समाज को एक दिशा में ढालने की कोशिश हो रही है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक त्योहार का मामला नहीं, बल्कि समाज की सोच और भविष्य से जुड़ा हुआ विषय है।

मुझे याद है कि एक समय नीतीश कुमार ने विधानसभा में कहा था कि देश को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुक्त बनाना होगा। उन्होंने यह बात कई मंचों पर दोहराई थी और उस समय उन्हें नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन राजनीति की दिशा कैसे बदलती है, यह सबके सामने है। आज वही नेतृत्व पूरी तरह अलग राह पर नजर आता है। यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक असर भी डालता है।

धार्मिक आस्था का सम्मान हर समाज की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब उसी आस्था के नाम पर शक्ति प्रदर्शन, आक्रामकता और विद्वेष फैलने लगे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। धर्म लोगों को जोड़ने का माध्यम होना चाहिए, न कि उन्हें बांटने का।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि बिहार की वर्तमान राजनीति में इस चुनौती को समझने और उससे निपटने की न तो गंभीर कोशिश दिख रही है और न ही इच्छाशक्ति। जो बदलाव धीरे-धीरे समाज में जड़ पकड़ रहा है, उसे नजरअंदाज करना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है। आज जरूरत है कि हम इस पर खुलकर बात करें, समाज को सही दिशा दें और त्योहारों की मूल भावना—शांति, प्रेम और भाईचारे—को फिर से स्थापित करें।

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