एबीसी नेशनल न्यूज | क़ुम/तेहरान | 4 मार्च 2026
मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति आज एक अभूतपूर्व मोड़ पर पहुंच गई है, जहां अमेरिका और इजराइल की संयुक्त वायु सेना ने ईरान के पवित्र शहर क़ुम में स्थित असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स (मजलिस-ए-खोब्रेगन) के मुख्य भवन पर एक क्रूर और रणनीतिक रूप से सोचा-समझा हमला किया, जिसने ईरान की संवैधानिक और धार्मिक व्यवस्था की नींव को हिला दिया है। यह हमला ठीक उस समय अंजाम दिया गया जब असेंबली के 88 वरिष्ठ शिया क्लेरिक्स एक गुप्त और अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक में जुटे थे, जिसमें दिवंगत सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई के उत्तराधिकारी का अंतिम चयन किया जाना था। ईरानी राज्य मीडिया, जैसे तस्नीम न्यूज एजेंसी और फार्स न्यूज, ने इस हमले की पुष्टि करते हुए इसे “अमेरिकी-जायोनी आतंकवादियों का सामूहिक नरसंहार” करार दिया है, जबकि पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट्स और उपग्रह इमेजरी से पता चलता है कि कई बंकर-बस्टिंग बमों ने भवन की मजबूत संरचना को चीरते हुए अंदर विस्फोट किया, जिससे पूरा परिसर मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हमले के दौरान भवन से धुआं और आग की लपटें उठती रहीं, और बचाव दल अभी भी मलबे से शवों और घायलों को निकालने में जुटे हैं; अनुमान है कि दर्जनों क्लेरिक्स मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए हैं, हालांकि ईरानी अधिकारियों ने सटीक आंकड़े जारी करने से इनकार किया है। इस हमले ने न केवल ईरान की नेतृत्व चयन प्रक्रिया को ठप कर दिया है, बल्कि पूरे इस्लामिक गणराज्य में आक्रोश और अस्थिरता की एक नई लहर पैदा कर दी है, जहां लोग सड़कों पर उतरकर “मौत अमेरिका को” और “बदला लेंगे” के नारे लगा रहे हैं।
यह विनाशकारी कार्रवाई 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए अमेरिका-इजराइल के व्यापक सैन्य अभियान का एक चरमोत्कर्ष है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” का नाम दिया है, और इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के नेतृत्व को उखाड़ फेंकना, उसके परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को पूरी तरह समाप्त करना बताया जा रहा है। पिछले चार दिनों में ईरान के हवाई रक्षा तंत्र, मिसाइल लॉन्च साइट्स, नौसेना ठिकानों, परमाणु सुविधाओं और कमांड सेंटरों पर 2,000 से अधिक हमले हो चुके हैं, जिसमें अमेरिकी बी-2 बॉम्बर्स और इजराइली एफ-35 लड़ाकू विमानों ने प्रमुख भूमिका निभाई है। अभियान की शुरुआत में ही 28 फरवरी को तेहरान में एक घातक हमले में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई, जो 1989 से ईरान की सर्वोच्च सत्ता संभाल रहे थे और जिनकी मौत ने देश में सत्ता का एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया। खामेनेई के अलावा कई वरिष्ठ IRGC कमांडर, सैन्य अधिकारी और राजनीतिक नेता भी इन हमलों में मारे गए हैं, जिससे ईरान की सैन्य कमान बुरी तरह बिखर गई है। पश्चिमी खुफिया रिपोर्ट्स, जैसे कि इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर की अपडेट्स, बताती हैं कि इन हमलों का फोकस तीन मुख्य क्षेत्रों पर है: ईरान की हवाई रक्षा को दबाना, उसकी जवाबी कार्रवाई की क्षमता को कमजोर करना और कमांड-कंट्रोल सिस्टम को नष्ट करना, जिससे अमेरिका-इजराइल को तेहरान पर पूर्ण वायु श्रेष्ठता हासिल हो गई है। इसके अलावा, 2 मार्च को इस्फहान प्रांत में नतांज परमाणु सुविधा पर पहला हमला हुआ, जहां कम से कम तीन इमारतें पूरी तरह तबाह हो गईं, हालांकि IAEA ने कहा है कि अभी तक कोई रेडियोलॉजिकल रिसाव की पुष्टि नहीं हुई है।
ईरान के संविधान की दृष्टि से देखें तो असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ईरान की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है, जो सुप्रीम लीडर का चुनाव, उनकी निगरानी और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें हटाने का अधिकार रखती है, और इसकी बैठकें आमतौर पर गोपनीय और सुरक्षित स्थानों पर होती हैं। खामेनेई की मौत के बाद असेंबली को तुरंत नए नेता का चयन करना था, लेकिन इस हमले ने पूरी प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया है, जिससे ईरान में एक संवैधानिक संकट पैदा हो गया है। वर्तमान में, एक अंतरिम ‘लीडरशिप काउंसिल’ सत्ता संभाल रही है, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, न्यायपालिका प्रमुख गोलामहुसैन मोहसिनी एजेई और गार्जियन काउंसिल के सदस्य आयतुल्लाह अली रजा आरफी शामिल हैं, लेकिन इस परिषद की शक्तियां सीमित हैं और यह सुप्रीम लीडर की तरह धार्मिक-राजनीतिक फैसले नहीं ले सकती। विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि क्लेरिक्स के बड़े पैमाने पर हताहत होने से चुनाव में महीनों की देरी हो सकती है, जिसका फायदा IRGC के हार्डलाइनर गुट उठा सकते हैं और सत्ता पर कब्जा कर एक सैन्य शासन की ओर ले जा सकते हैं। रिपोर्ट्स से यह भी पता चलता है कि तेहरान में असेंबली का पुराना भवन (जो पूर्व संसद भवन था) भी रात के हमलों में निशाना बना, और इजराइली मोसाद ने सोशल मीडिया पर फारसी में पोस्ट किया कि “कोई फर्क नहीं पड़ता आज किसे चुना जाता है, उसका भाग्य तय है; केवल ईरानी राष्ट्र अपना भविष्य का नेता चुनेगा,” जो ईरान में आंतरिक विद्रोह को भड़काने का इशारा करता है। इस हमले ने ईरान की वैचारिक और धार्मिक संरचना पर सीधा प्रहार किया है, जिससे देश में पहले से मौजूद आर्थिक संकट, महंगाई और असंतोष की लहर और तेज हो सकती है, और संभवतः बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन या गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है।
इस घटना के क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव अकल्पनीय रूप से विनाशकारी साबित हो रहे हैं, जहां युद्ध की आग अब इजराइल-लेबनान सीमा से आगे फारस की खाड़ी, सीरिया और यहां तक कि सऊदी अरब तक फैल चुकी है। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इजराइल पर कई मिसाइल हमले किए, जिसमें तेल अवीव और अन्य शहरों में कम से कम 11 लोग मारे गए, जबकि ईरान-समर्थित प्रॉक्सी ग्रुप्स जैसे हिजबुल्लाह ने 2 मार्च को इजराइल पर मिसाइल दागे, जिसके जवाब में इजराइल ने दक्षिणी लेबनान और बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर भारी बमबारी की। इसके अलावा, सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन हमला हुआ, जिसमें मामूली क्षति हुई लेकिन यह ईरान की असममित युद्ध क्षमता को दर्शाता है। यमन के हूती विद्रोहियों ने भी लाल सागर में शिपिंग लेन पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो रही है। कूटनीतिक स्तर पर दुनिया विभाजित है: जहां अमेरिका और इजराइल इसे ईरान के परमाणु खतरे के खिलाफ आवश्यक कदम बता रहे हैं, वहीं रूस, चीन और कई अरब देशों ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन करार दिया है, और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपात बैठकें बुलाई जा रही हैं। आर्थिक मोर्चे पर वैश्विक बाजारों में हाहाकार मचा है; तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने की आशंका है, स्टॉक मार्केट में ऐतिहासिक गिरावट आई है (डॉव जोन्स 5% नीचे), और सोने की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। ईरान ने “कठोर बदला” की चेतावनी दी है, जिससे परमाणु ब्रिंकमैनशिप या तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति का खतरा बढ़ गया है, और क्षेत्रीय स्थिरता पूरी तरह दांव पर लग गई है।




