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अगरकर–गंभीर गठबंधन: भारतीय क्रिकेट के मुजरिम

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संजीव कुमार । मुंबई 27 नवंबर 2025

भारतीय क्रिकेट आज जिस गहरे संकट में फंसा है, उसके पीछे एक नहीं बल्कि दो लोगों का अहंकार, राजनीति और मनमानी साफ दिखाई देती है—अजीत अगरकर और गौतम गंभीर। यह दोनों मिलकर ऐसी ‘डार्क अलायंस’ का निर्माण कर चुके हैं जिसने चयन और टीम प्रबंधन को व्यक्तिगत दुश्मनी, पसंद-नापसंद और अंदरूनी सत्ता की जंग में बदल दिया है। अगरकर की हिटलरशाही और गंभीर का द्वेषपूर्ण रवैया अब इतने बड़े स्तर पर पहुंच चुका है कि भारतीय टीम का भविष्य, टीम की संरचना, खिलाड़ियों के करियर और देश की क्रिकेटिंग संस्कृति—सब कुछ इन दोनों की निजी सनक का शिकार हो चुका है। श्रेयस अय्यर जैसा वर्ल्ड कप हीरो सिर्फ एक रणजी मैच मिस करने पर कॉन्ट्रैक्ट से बाहर कर दिया जाता है, लेकिन वही गंभीर और अगरकर अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को IPL के दो-तीन अच्छे पलों के आधार पर टेस्ट टीम में जगह दिलवा देते हैं। यह चयन नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट पर थोपी गई निजी तानाशाही है, जिसमें लॉजिक, परफॉर्मेंस और सम्मान की कोई जगह नहीं बची है।

हालात अब इतने भयानक हो चुके हैं कि ऐसा लगता है जैसे चयनकर्ता और कोचिंग सेटअप ने कुछ खिलाड़ियों के खिलाफ खुला मोर्चा खोल रखा है। सरफराज खान जैसा खिलाड़ी, जिसने घरेलू क्रिकेट में ऐसा दबदबा बनाया है जो दशकों में नहीं देखा गया—लगातार 60-70 के औसत से रन बनाना किसी मज़ाक की बात नहीं—उसे बार-बार नजरअंदाज किया जा रहा है। सवाल ये है कि सरफराज ने किसका क्या बिगाड़ा? क्या उसकी गलती सिर्फ इतनी है कि वह IPL में किसी विशेष फ्रेंचाइज़ी के चमकते हुए ‘फेवरेट बॉय’ की तरह नहीं दिखता? अगरकर और गंभीर की यह जोड़ी सरफराज जैसे मेहनतकश प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को टीम से दूर रखकर भारतीय क्रिकेट के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है। यह सिर्फ चयन की गलती नहीं, यह करियर खत्म करने वाली साज़िश जैसी लगने लगी है।

और बात सिर्फ सरफराज पर नहीं रुकती। मोहम्मद शमी, भारत के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों में से एक—एक ऐसा गेंदबाज जो वर्ल्ड कप, टेस्ट, T20 हर मंच पर भारत की ढाल रहा है—उसे ऐसे ट्रीट किया जाता है मानो उससे कोई निजी दुश्मनी हो। गंभीर और अगरकर के संयुक्त सत्ता-खेल में शमी जैसा लीजेंड भी लगातार अनदेखा, डाउनग्रेड और अपमानित किया जा रहा है। जब खराब फॉर्म में बैठे खिलाड़ियों को बार-बार मौके दिए जाते हैं लेकिन दुनिया के शीर्ष तेज गेंदबाज को किनारे लगा दिया जाता है, तो यह चयन नहीं—एक योजनाबद्ध प्रतिशोध लगता है। सवाल उठना लाज़मी है: क्या यह वही भारतीय टीम है जो कभी मेरिट, परफॉर्मेंस और परिश्रम पर खड़ी होती थी? या अब यह सिर्फ दो लोगों की निजी पसंद का खिलौना बन चुकी है?

अगरकर–गंभीर की यह जोड़ी अब खुलेआम मनमानी कर रही है। टीम का संतुलन बिगाड़ दिया गया, सीनियर्स को दरकिनार कर दिया गया, आईपीएल पर अत्यधिक निर्भरता पैदा कर दी गई, और चयन में इतनी अराजकता भर दी गई कि भारतीय टीम अपनी दिशा ही भूल गई। चयनकर्ता का काम देशभर के मैदानों में जा कर टैलेंट खोजना है, लेकिन अगरकर टीम के साथ विदेश घूमने में व्यस्त हैं। कोच का काम टीम का मनोबल बढ़ाना है, लेकिन गंभीर का रवैया ऐसे खिलाड़ी बनाता है जिसे हर समय डर में रहना पड़े—कब कोच और चयनकर्ता की संयुक्त ‘ब्लैकलिस्ट’ में उसका नाम आ जाए, कोई नहीं जानता।

यह स्थिति अब सिर्फ खराब नहीं, खतरनाक है। भारतीय क्रिकेट को ज्यादा नुकसान विपक्षी टीमों ने नहीं पहुंचाया जितना इस ‘अगरकर–गंभीर गठबंधन’ ने पहुंचा दिया है। मनमानी, तानाशाही और खिलाड़ियों के प्रति निजी वैर—इन सबने मिलकर टीम को ऐसा रसातल दिखाया है जहां से वापसी बेहद मुश्किल है। भारत को अब बड़े फैसले चाहिए। अगर भारतीय क्रिकेट को बचाना है, टीम को स्थिर करना है, घरेलू परफॉर्मर्स को सम्मान देना है—तो सबसे पहले जवाबदेही तय करनी होगी। और इस जवाबदेही में नंबर एक और दो पर नाम है: अजीत अगरकर और गौतम गंभीर।

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