सुमन कुमार । नई दिल्ली 7 दिसंबर 2025
कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सम्मान में आयोजित डिनर कार्यक्रम को लेकर केंद्र सरकार पर अहम सवाल खड़े किए हैं। थरूर ने कहा कि अगर इस कार्यक्रम में विपक्षी दलों के नेता भी आमंत्रित किए जाते तो यह भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं और राजनीतिक परिपक्वता का बेहतर संदेश देता। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी भारत की छवि की बात आती है, तो यह ज़रूरी होता है कि दुनिया को यह दिखाया जाए कि देश की राजनीतिक विविधता और लोकतांत्रिक स्वर एक साथ मौजूद हैं और कार्यक्रमों में सभी पक्षों को प्रतिनिधित्व मिलता है।
थरूर ने यह भी संकेत दिया कि विदेश नीति, खासकर उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय बैठकों और औपचारिक आयोजनों में विपक्ष की भागीदारी कोई नई परंपरा नहीं है। UPA शासन से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार तक, कई मौकों पर विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं को महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल किया जाता रहा है, ताकि वैश्विक समुदाय यह समझ सके कि भारत की विदेश नीति एक सर्वदलीय दृष्टिकोण पर आधारित होती है। उनका कहना है कि ऐसे अवसर सिर्फ एक डिनर तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह बताते हैं कि देश के भीतर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, मगर राष्ट्रीय हितों के मंच पर सभी दल एक साथ खड़े होते हैं।
कांग्रेस नेता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्राध्यक्षों के स्वागत के ऐसे कार्यक्रम किसी एक दल की संपत्ति नहीं होते, बल्कि पूरा देश उनका मेज़बान होता है। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि विपक्षी नेताओं को भी शामिल किया जाए ताकि भारत की लोकतांत्रिक विविधता की सही तस्वीर सामने आए। थरूर ने यह भी कहा कि विपक्ष को आमंत्रित न करना “एक अनावश्यक संदेश” देता है, जो यह दर्शाता है कि सरकार राजनीतिक संवाद की बजाय राजनीतिक दूरी को बढ़ावा दे रही है। इन घटनाओं का असर सिर्फ घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की धारणाओं पर भी पड़ता है।
थरूर के इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार बड़े आयोजनों को “पार्टी इवेंट” बना रही है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करने वाली परंपराएँ स्थापित की जा रही हैं। वहीं, सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से इस पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन भाजपा के कुछ नेताओं ने यह तर्क दिया है कि डिनर का स्वरूप सीमित था और सभी कार्यक्रमों में सबको आमंत्रित करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार यदि चाहे तो विपक्ष की उपस्थिति को औपचारिकता से कहीं ज्यादा एक सकारात्मक संदेश में बदल सकती थी।
कुल मिलाकर, शशि थरूर का यह बयान केवल आलोचना भर नहीं है—यह एक व्यापक मुद्दे की ओर इशारा करता है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राष्ट्रीय स्तर के कूटनीतिक कार्यक्रमों को किस तरह अधिक समावेशी बनाया जा सकता है। पुतिन का दौरा जहां भारत–रूस संबंधों में नया अध्याय खोल रहा है, वहीं विपक्ष की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक विमर्श में एक नया प्रश्न जोड़ दिया है: क्या भारत की विदेश नीति भविष्य में और अधिक सर्वदलीय, खुली और लोकतांत्रिक हो सकती है?




