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लेबनान में तनाव चरम पर, इस्राइल-हेज़बोल्लाह टकराव गहराया

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बेयरूत, 3 अक्टूबर 2025

लेबनान और इस्राइल के बीच हालात दिन-ब-दिन विस्फोटक होते जा रहे हैं। इस्राइल की ओर से लगातार ड्रोन और हवाई हमलों ने सीमा क्षेत्र को युद्धभूमि में तब्दील कर दिया है, वहीं हेज़बोल्लाह के हथियार न सौंपने के जिद्दी रुख ने टकराव को और गहरा दिया है। दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे, जिससे न केवल लेबनान बल्कि पूरे मध्य पूर्व में नए युद्ध की आशंका तेजी से बढ़ रही है।

ताजा घटनाक्रम में लेबनान और इस्राइल के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सीमा पार हमलों और राजनीतिक बयानबाज़ियों ने स्थिति को बेहद नाज़ुक बना दिया है। इस्राइल ने हाल के दिनों में कई ड्रोन और हवाई हमले किए, जिनमें हेज़बोल्लाह से जुड़े व्यक्तियों को निशाना बनाया गया। दक्षिणी लेबनान के खर्दाली मार्ग पर ड्रोन हमले में दो इंजीनियर अहमद साद और मुस्तफा रिज़्क की मौत हो गई। इसके अलावा, काफरा कस्बे में हेज़बोल्लाह के सदस्य अली क़राऊनी की कार पर हमला किया गया जिसमें वह मारा गया और पाँच अन्य लोग घायल हुए। इस्राइल का दावा है कि उसके हमले केवल हेज़बोल्लाह के ठिकानों पर केंद्रित हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि स्थानीय नागरिक भी इन हमलों की चपेट में आ रहे हैं, जिससे आम जनता में भारी आक्रोश और भय का माहौल बन गया है।

हेज़बोल्लाह की तरफ से हथियार न सौंपने का रुख लेबनान के भीतर राजनीतिक और सामाजिक तनाव को और बढ़ा रहा है। लेबनानी सरकार और कई राजनीतिक दलों ने स्पष्ट कहा है कि देश की संप्रभुता और सुरक्षा तभी संभव है जब सभी सशस्त्र गुट अपने हथियार सरकार और सेना को सौंप दें। लेकिन ईरान समर्थित हेज़बोल्लाह ने इन अपीलों को ठुकराते हुए साफ कर दिया है कि वह अपने हथियार किसी भी कीमत पर जमा नहीं करेगा। हेज़बोल्लाह का मानना है कि हथियार जमा करना उसके “रक्षा अधिकार” को समाप्त करने जैसा होगा। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस जिद के पीछे ईरान की गहरी भूमिका है, क्योंकि हेज़बोल्लाह लंबे समय से तेहरान की रणनीतिक नीतियों का एक अहम हिस्सा रहा है। इस इनकार से यह साफ हो जाता है कि हेज़बोल्लाह न केवल लेबनान की घरेलू राजनीति में बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरणों में एक ताकतवर खिलाड़ी बना रहना चाहता है।

लेबनानी सरकार और सेना के सामने अब बड़ी चुनौती यह है कि वह इस स्थिति को कैसे संभाले। सेना जल्द ही दक्षिणी इलाक़ों पर अपनी रिपोर्ट पेश करने वाली है, जिसमें हथियारों की निगरानी और जब्ती से जुड़ी गतिविधियों का ब्यौरा होगा। लेकिन इस मिशन में कई बाधाएँ हैं। सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि लितानी नदी के दक्षिण में पाँच बड़े इलाक़ों पर अब भी इस्राइली कब्ज़ा है। इस वजह से सेना उन इलाक़ों में पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पा रही। यही कारण है कि सरकार की संप्रभुता बार-बार चुनौती के घेरे में आ जाती है। पूर्व न्याय मंत्री अशरफ रिफ़ी ने हेज़बोल्लाह पर हमला बोलते हुए कहा है कि “राज्य की प्रतिष्ठा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा। जो लोग शक्ति के भ्रम में जी रहे हैं, उन्हें अब सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए।” उनका यह बयान लेबनान की आंतरिक राजनीति में नई बहस को जन्म दे रहा है।

युद्ध की आशंका को लेकर विशेषज्ञों की राय बेहद गंभीर है। उनका कहना है कि यदि हेज़बोल्लाह ने हथियार न सौंपने की नीति जारी रखी और इस्राइली हमलों की तीव्रता इसी तरह बढ़ती रही, तो सीमापार झड़पें किसी भी क्षण एक बड़े युद्ध का रूप ले सकती हैं। लेबनान पहले से ही गहरे आर्थिक संकट, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। लाखों लोग बेरोज़गारी और जीवन की बुनियादी ज़रूरतों की कमी का सामना कर रहे हैं। ऐसे माहौल में एक नया युद्ध देश के लिए मानवीय और आर्थिक तबाही लेकर आएगा। यह स्थिति न केवल लेबनान बल्कि पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए भी खतरनाक साबित हो सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी इस बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित है। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है और कूटनीतिक समाधान खोजने पर ज़ोर दिया है। भारत और अन्य देशों ने भी कहा है कि लेबनान में शांति और स्थिरता पूरे एशिया और विश्व के लिए अहम है। यदि इस तनाव को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसका असर तेल आपूर्ति से लेकर वैश्विक सुरक्षा तक पर पड़ सकता है।

अंततः, हेज़बोल्लाह का हथियार न सौंपने का निर्णय और इस्राइल की आक्रामक सैन्य कार्रवाई मिलकर लेबनान को एक और खूनी संघर्ष की ओर धकेल रहे हैं। दोनों पक्ष अगर पीछे नहीं हटे, तो यह टकराव निश्चित रूप से पूरे क्षेत्र के लिए भयावह परिणाम लेकर आएगा। लेबनान की जनता, जो पहले ही संकटों से घिरी है, एक और युद्ध की मार झेलने की स्थिति में नहीं है। शांति, संवाद और कूटनीति ही इस बढ़ते संकट से बाहर निकलने का रास्ता है।

 

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