लखनऊ/ पटना/ दिल्ली 10 नवंबर 2025
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने बिहार विधानसभा चुनाव के बीच एक बड़ा और राजनीतिक रूप से संवेदनशील दावा किया है। सोमवार को मीडिया से बातचीत के दौरान राजभर ने कहा कि बिहार में इस बार एनडीए की सरकार नहीं बनने जा रही। उनका दावा है कि मतदान के आंकड़ों और पिछले चुनावों के इतिहास को देखकर यह साफ प्रतीत होता है कि इस बार सत्ता महागठबंधन और तेजस्वी यादव की ओर जाती दिखाई दे रही है। राजभर का यह बयान इसलिए भी ध्यान खींचता है क्योंकि वह स्वयं एनडीए का हिस्सा हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने चुनावी समीकरणों का विश्लेषण करते हुए राजद की स्पष्ट बढ़त की बात कही। राजभर ने कहा कि जब भी बिहार में 60% से अधिक मतदान होता है, तब चुनावी हवा राजद के पक्ष में बहती है और इस बार भी पहले चरण में लगभग 65% वोटिंग होने से यह संकेत मिल रहा है कि जनता बदलाव चाहती है।
राजभर ने अपने दावे के समर्थन में आंकड़ों और इतिहास का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं “गूगल पर देख कर” यह समझने की कोशिश की कि बिहार में किस तरह वोटिंग प्रतिशत और चुनावी परिणामों के बीच संबंध बनता है। उनके अनुसार, जब-जब बिहार में भारी मतदान हुआ—चाहे वह 1990 का चुनाव हो जब लालू प्रसाद यादव पहली बार सत्ता में आए, 1995 हो जब सत्ता बरकरार रही, या 2000 का विधानसभा चुनाव जब राजद फिर मजबूत हुआ—हर बार वोटिंग प्रतिशत 60% से ऊपर रहा। राजभर ने कहा कि “इस बार भी 60% से ऊपर मतदान हुआ है, और इसका सीधा संकेत है कि सत्ता में बदलाव की इच्छा बेहद प्रबल है।” उन्होंने यह भी कहा कि बिहार की जनता बहुत चुप है, लेकिन उसकी चुप्पी में भी गहराई और संकेत हैं। राजनीतिक दलों के नेता भाषण दे रहे हैं, बयानबाज़ी कर रहे हैं, लेकिन जनता अपना संदेश शांत तरीके से दे रही है—मतपेटी के माध्यम से।
बिहार के चुनावी परिदृश्य को लेकर राजभर ने यह भी कहा कि राज्य में इस बार स्थिति और भी पेचीदा हो गई है, क्योंकि कई दल सीधे-सीधे एनडीए और महागठबंधन के वोटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से ओवैसी और प्रशांत किशोर (पीके) का नाम लेते हुए कहा कि दोनों ही राजद के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं और अपनी-अपनी रणनीतियों के माध्यम से पारंपरिक वोटबैंक को प्रभावित करने की मुहिम में लगे हुए हैं। राजभर ने कहा कि “वहां जनता का मन कोई भांप नहीं पा रहा। नेता बोल रहे हैं, लेकिन जनता कुछ नहीं बोल रही। यही खामोशी बहुत बड़ा संदेश दे रही है।” उनकी यह टिप्पणी सिर्फ आंकड़ों पर आधारित विश्लेषण नहीं बल्कि बिहार की जमीन से जुड़े माहौल को समझने की कोशिश भी लगती है। उन्होंने कहा कि चुनाव में जब वोटर चुप हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि बड़ा बदलाव आने वाला है।
पहला चरण पूरा होने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र भी मतदान प्रतिशत पर टिकी हुई है। बिहार में पहले चरण में 65.08% मतदान हुआ—जो अब तक के किसी भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव की तुलना में अधिक है। परंपरागत रूप से बिहार में उच्च मतदान को सत्ता-विरोधी लहर की निशानी माना जाता रहा है। यही कारण है कि ओपी राजभर की बात अचानक चुनावी बयान की तरह नहीं बल्कि एक संभावित राजनीतिक संकेत की तरह देखी जा रही है। दूसरे चरण का मतदान 11 नवंबर को होना है और उसी के बाद यह तय होगा कि क्या पहले चरण की तरह दूसरे चरण में भी भारी मतदान होगा, या तस्वीर बदलते-बदलते अंत में किसी अन्य दिशा में चली जाएगी।
इतिहास पर नजर डालें तो राजभर के तर्क में तथ्य नजर आते हैं। 1990 में जब लालू यादव ने पहली बार बिहार में सत्ता संभाली, तब मतदान प्रतिशत 62.04% था। 1995 में उनकी सरकार दोबारा बनी, उस वक्त 61.79% वोटिंग हुई। 2000 में जब फिर से राजद सत्ता में लौटा, तब यह प्रतिशत 62.57% रहा। यह डेटा बताता है कि बिहार की राजनीति में उच्च मतदान का सीधा संबंध सत्ता परिवर्तन या राजद के उत्थान से रहा है। हालांकि इस बार चुनावी समीकरण काफी जटिल हैं—एनडीए और महागठबंधन से इतर कई खिलाड़ी मैदान में हैं—फिर भी मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक पंडितों के कान खड़े कर दिए हैं।
ओपी राजभर का यह बयान बिहार चुनावी गलियारों में हलचल पैदा कर रहा है, क्योंकि यह दावा सिर्फ विपक्ष या गठबंधन साथी की टिप्पणी नहीं बल्कि एनडीए सरकार के ही एक मंत्री का विश्लेषण है। उन्होंने न सिर्फ राजद की सत्ता में वापसी की संभावना जताई बल्कि साथ ही यह संकेत भी दिया कि एनडीए इस बार जनता के मूड को पकड़ने में नाकाम रहा है। बिहार की सियासत में राजभर के बयान को लेकर हलचल स्वाभाविक है और अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मतदान प्रतिशत का यह इतिहास इस बार भी खुद को दोहराएगा, या बिहार कोई नया राजनीतिक समीकरण रचकर परिणामों में बड़ा उलटफेर कर देगा।




