भारतीय थल सेना में पिछले पाँच वर्षों में लगभग दो लाख सैनिकों की चौंकाने वाली कमी दर्ज की गई है, जिससे सेना की कुल ताकत अब आधिकारिक रूप से लगभग 11.5 लाख रह गई है, जबकि कुछ वर्ष पहले यह संख्या लगभग 13.5 लाख थी। अंग्रेजी अखबार “टाइम्स ऑफ इंडिया” की एक रिपोर्ट में सामने आए इस आंकड़े ने रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है। सरकार भले ही इस बदलाव को “टेक-ड्रिवन वॉरफेयर” और सैन्य आधुनिकीकरण की आवश्यकता बता रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह ‘आधुनिकता’ सैनिकों की संख्या में चुपचाप की गई भारी कटौती का पर्याय बन गई है। यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है: क्या यह कमी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत मशीनें मानव संसाधन की जगह लेंगी, या यह जानबूझकर की गई एक ऐसी कटौती है जो देश की स्थायी रक्षा क्षमता को कमज़ोर कर सकती है? खासकर ऐसे समय में जब भारत की सीमाएँ चीन और पाकिस्तान के साथ निरंतर तनाव में हैं, सैनिकों की संख्या में यह अप्रत्याशित गिरावट एक गंभीर रणनीतिक बदलाव को उजागर करती है जिस पर सरकार ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, जिससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी दिखाई देती है।
टेक्नोलॉजी के आवरण में लिपटी ‘मानव बल घटाने की योजना’
सेना द्वारा किए जा रहे आधुनिकीकरण में ड्रोन और डिजिटल उपकरणों को प्राथमिकता दी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, सेना ने अपनी 382 इन्फैंट्री बटालियनों को “ड्रोन प्लाटून” से लैस किया है, जिसके तहत प्रत्येक बटालियन में 20 से 25 जवान अब ड्रोन के संचालन के लिए प्रशिक्षित होंगे। इसके अतिरिक्त, ‘आशिनी’ जैसी नई यूनिट्स बनाई जा रही हैं जो लोइटरिंग म्यूनिशंस, या “सुसाइड ड्रोन,” के साथ-साथ निगरानी और टोही (रिकॉन्नेसेन्स) मिशनों को अंजाम देंगी।
हालांकि, यह टेक्नोलॉजिकल प्रगति सराहनीय है, लेकिन पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इसे “आधुनिकीकरण नहीं, धीरे-धीरे मानव बल घटाने की योजना” करार दिया है। उनका तर्क है कि जब सेना की कुल संख्या 14 लाख से घटकर 11.5 लाख पर पहुँचती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि तकनीकी एकीकरण केवल सैनिकों की छंटनी को न्यायसंगत ठहराने का एक बहाना बन रहा है। यह प्रक्रिया, जिसे कुछ विश्लेषक “साइलेंट रिडक्शन” कहते हैं, सेना के मूलभूत मानव संसाधन स्तंभ पर सीधा प्रहार है, जिससे पारंपरिक युद्ध की स्थिति में देश की तैयारी और प्रतिरोध क्षमता प्रभावित हो सकती है।
‘अग्निपथ’ और स्थायी पदों का उन्मूलन: रिफॉर्म या आत्मघाती रिडक्शन?
भारतीय सेना को “leaner but smarter” (कम लेकिन अधिक चतुर) बनाने की अवधारणा पर ज़ोर दिया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह बदलाव कई कठोर नीतियों के कारण आया है। पिछले कुछ वर्षों में लागू की गई ‘अग्निपथ योजना’ ने सैनिकों की भर्ती प्रक्रिया को स्थायी से बदलकर मुख्यतः चार वर्षों के अल्पकालिक कार्यकाल पर केंद्रित कर दिया है। इस योजना ने पहले ही सेना में स्थायी जवानों की संख्या को कम करना शुरू कर दिया है, और अब आधुनिक हथियारों और ड्रोन यूनिट्स के नाम पर पुराने, स्थायी सैन्य पदों को धीरे-धीरे खत्म करने का रास्ता लगभग सुनिश्चित होता दिख रहा है।
पूर्व सैन्य विश्लेषक मेजर जनरल (से.नि.) एस.के. अरोड़ा जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि टेक्नोलॉजी बेशक आवश्यक है, लेकिन “मनोबल और मानव शक्ति को कम करना आत्मघाती कदम है।” उनका कहना है कि सेना केवल मशीनों के बल पर नहीं, बल्कि अग्रिम पंक्ति के जवानों की हिम्मत, अनुभव और मनोबल के दम पर लड़ती है। इस प्रकार, इस प्रक्रिया को ‘रिफॉर्म’ कहना भ्रामक हो सकता है, जबकि यह वास्तव में देश की रक्षा क्षमताओं में एक बड़ा और जोखिम भरा ‘रिडक्शन’ (कटौती) है।
दो लाख सैनिकों की कमी: सरकार की चुप्पी और भर्ती प्रक्रिया में जानबूझकर कमी
2019 में 13.5 लाख सैनिकों की संख्या से घटकर 2025 में 11.5 लाख पर आना, पाँच वर्षों में लगभग दो लाख सैनिकों के ‘गायब ग्राफ’ को दर्शाता है, जिस पर सरकार या रक्षा मंत्रालय ने आज तक कोई आधिकारिक या संतोषजनक बयान नहीं दिया है। रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर भी पुराने ही आंकड़े प्रदर्शित हैं, जिससे पारदर्शिता का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कमी केवल सामान्य सेवानिवृत्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह भर्ती प्रक्रिया में जानबूझकर की गई कटौती का नतीजा है। 2020 से 2024 के बीच कोविड महामारी और अन्य कारणों का हवाला देते हुए कई भर्ती बोर्ड की परीक्षाएं या तो रद्द कर दी गईं या लंबे समय तक स्थगित रखी गईं।
‘अग्निपथ’ और अब ‘ड्रोन प्लाटून’ जैसी नई तकनीकी नीतियों की आड़ में इन निष्क्रियताओं को अब ‘नई नीति’ का नाम दिया जा रहा है। सरकार की यह खामोशी और पारदर्शिता की कमी इस संदेह को बल देती है कि यह एक सुनियोजित कदम था जिसका उद्देश्य वित्तीय बोझ को कम करना या सैन्य संरचना को पूरी तरह से बदलना था, लेकिन यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम हो सकता है।
‘ड्रोन आर्मी’ मॉडल की कीमत: क्या तकनीक मानवीय साहस का विकल्प है?
भारतीय सेना का दावा है कि आधुनिक युद्ध के बदलते परिदृश्य में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर वॉरफेयर की बढ़ती भूमिका के कारण “कम सैनिक, ज्यादा तकनीक” की रणनीति अपरिहार्य हो गई है। यह तर्क वैश्विक सैन्य रुझानों के अनुरूप प्रतीत होता है, लेकिन इसकी व्यवहार्यता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगते हैं। युद्ध के मैदान में तकनीक सहायक हो सकती है, लेकिन वह उस मानवीय उपस्थिति और साहस का विकल्प नहीं बन सकती जो सीमाओं पर रक्त और पसीना बहाता है। लद्दाख, अरुणाचल और कश्मीर जैसे दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्रों में, जहां भू-भाग और जलवायु स्थितियाँ अप्रत्याशित होती हैं, वहाँ मानवीय निगरानी, गश्त और आमने-सामने की लड़ाई ही रक्षा की रीढ़ बनी रहती है।
‘रोबोटिक फोर्स’ की ओर बढ़ते हुए, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीकी प्रगति की कीमत पर उसकी जमीनी पकड़, क्षेत्रीय प्रभुत्व और सबसे महत्वपूर्ण, उसके जवानों का मनोबल दांव पर न लगे। सेना के आधुनिकीकरण पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया में बरती गई अपारदर्शिता, और दो लाख जवानों की कमी के कारणों पर सरकार की चुप्पी, राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर अंतिम सवाल खड़ा करती है।





