रायपुर, 6 सितम्बर 2025
छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा का नया और खतरनाक चेहरा सामने आया है। इस बार उनके निशाने पर समाज का सबसे महत्वपूर्ण वर्ग – शिक्षक – आ गए हैं। बीते तीन महीनों के भीतर माओवादियों ने कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे छह से ज्यादा शिक्षकों की बेरहमी से हत्या कर दी। इन घटनाओं ने न केवल राज्य प्रशासन को सकते में डाल दिया है, बल्कि उन हजारों शिक्षकों के बीच भय का माहौल बना दिया है जो जंगलों और आंतरिक इलाकों में बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
शिक्षा पर हमला, समाज पर हमला
माओवादियों की यह रणनीति केवल व्यक्तियों की हत्या भर नहीं है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र और समाज पर सीधा हमला है। शिक्षक समाज की नींव होते हैं और उन्हें निशाना बनाना इस बात का संकेत है कि माओवादी शिक्षा और जागरूकता के बढ़ने से खुद को खतरे में मानते हैं। ग्रामीण इलाकों में साक्षरता बढ़ने से उनकी विचारधारा कमजोर होती है, इसलिए वे शिक्षकों को डराकर या खत्म करके समाज को अंधकार में रखना चाहते हैं।
शिक्षकों में दहशत और पलायन की आशंका
लगातार हो रही हत्याओं ने शिक्षकों के बीच गहरी दहशत पैदा कर दी है। पिछले तीन महीनों में ही जब छह से ज्यादा साथी शिक्षक मारे गए हों, तो बाकी शिक्षकों के लिए भय का माहौल स्वाभाविक है। कई शिक्षक अब इन क्षेत्रों में काम करने से पीछे हटने लगे हैं। उनका मानना है कि प्रशासन उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम साबित हो रहा है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो ग्रामीण शिक्षा तंत्र पूरी तरह चरमरा सकता है और बच्चों का भविष्य अंधकार में धकेला जा सकता है। शिक्षकों का पलायन होने पर सबसे बड़ा नुकसान समाज के सबसे कमजोर तबके को झेलना पड़ेगा।
सरकार और प्रशासन की चुनौती
यह घटनाएँ राज्य सरकार और सुरक्षा बलों के लिए गहरी चुनौती हैं। एक ओर सरकार विकास और शिक्षा की योजनाएँ चला रही है, वहीं दूसरी ओर माओवादी हिंसा इन प्रयासों को प्रभावित कर रही है। सवाल यह है कि सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद माओवादी इतनी आसानी से घटनाओं को कैसे अंजाम दे रहे हैं। यह प्रशासनिक खामियों और खुफिया तंत्र की कमजोरियों को उजागर करता है।
माओवाद के खिलाफ निर्णायक कदम की ज़रूरत
अगर माओवादी लगातार शिक्षकों को निशाना बनाते रहे तो आने वाली पीढ़ियों पर इसका गहरा असर होगा। सरकार को अब निर्णायक कदम उठाने होंगे। शिक्षकों को विशेष सुरक्षा कवच, सुरक्षित आवास और मनोबल बढ़ाने वाली योजनाएँ जल्द लागू करनी होंगी। साथ ही, स्थानीय लोगों को विश्वास में लेना और उन्हें विकास से जोड़ना बेहद जरूरी है।
शिक्षा ही है असली जवाब
इतिहास ने साबित किया है कि बंदूक और हिंसा से समाज कभी आगे नहीं बढ़ता। माओवाद की जड़ें गरीबी और अशिक्षा में छिपी हैं और इसका सबसे बड़ा इलाज शिक्षा है। अगर शिक्षक भयमुक्त होकर बच्चों को पढ़ा पाएँगे तभी माओवाद की विचारधारा का असर खत्म होगा। इसलिए यह सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और भविष्य की दिशा का सवाल है।




