चेन्नई, 31 अक्टूबर:2025
भारत के चुनाव आयोग (ECI) के हालिया फैसले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आयोग ने अपने दस्तावेज़ों की सूची में “Bihar SIR Extract” को पहचान पत्र के रूप में शामिल कर लिया है, जिसे अब देश के कई राज्यों में मतदाता पहचान के तौर पर मान्य किया जा सकता है। यह निर्णय तमिलनाडु समेत नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगा। लेकिन इस कदम ने राजनीतिक भूचाल मचा दिया है — खासकर दक्षिण भारत में, जहां सत्तारूढ़ द्रमुक (DMK) और कई क्षेत्रीय दल इसे “चुनावी घुसपैठ की शुरुआत” बता रहे हैं।
द्रमुक ने चुनाव आयोग से तीखा सवाल किया है — “क्या अब बिहार का मतदाता तमिलनाडु का भी मतदाता माना जाएगा? क्या बिहार की मतदाता सूची का अंश तमिलनाडु में पहचान प्रमाण बन सकता है? क्या इससे मतदाता सूची में दोहरी प्रविष्टि नहीं बढ़ेगी?”
द्रमुक ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यह निर्णय “संघीय ढांचे और राज्य के अधिकारों पर सीधा प्रहार” है। पार्टी ने मुख्य चुनाव अधिकारी अर्चना पटनायक को दिए गए अपने ज्ञापन में पूछा है — “बिहार की मतदाता सूची का तमिलनाडु से क्या संबंध है? तमिलनाडु में हो रही SIR प्रक्रिया में बिहार के दस्तावेज़ की क्या भूमिका हो सकती है? क्या इससे किसी राजनीतिक लाभ का रास्ता तैयार किया जा रहा है?”
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि इस कदम के पीछे कोई “छिपी राजनीतिक रणनीति” है। विश्लेषकों का कहना है कि बिहार SIR को वैध ID प्रूफ बनाना उन राज्यों में मतदाता पहचान को जटिल बना सकता है, जहां क्षेत्रीय दलों का दबदबा है। दक्षिण भारत के राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक “खतरनाक प्रयोग” है जो राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता पहचान और निवास सिद्धांत (Ordinary Residence) की पूरी अवधारणा को ध्वस्त कर सकता है।
चुनाव आयोग की चुप्पी ने स्थिति और भी विस्फोटक बना दी है। आयोग की ओर से अब तक इस फैसले पर कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं आया है। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम “राजनीतिक लाभ के लिए तकनीकी जाल बिछाने” जैसा है — ताकि बिहार जैसे राज्यों से कुछ दस्तावेज़ों के जरिए मतदाता पहचान में भ्रम फैलाया जा सके।
द्रमुक के नेताओं ने यह भी आशंका जताई है कि इससे “डुप्लिकेट वोटिंग, माइग्रेंट वोटर्स का दुरुपयोग और फर्जी पहचान” जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। उनका कहना है कि चुनाव आयोग का यह कदम न केवल असंवैधानिक है बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
अब सवाल यह है — क्या वास्तव में बिहार का एक सरकारी दस्तावेज़ तमिलनाडु में किसी व्यक्ति की पहचान का प्रमाण हो सकता है? अगर ऐसा है, तो क्या कल बंगाल या उत्तर प्रदेश के SIR को भी केरल या कर्नाटक में वैध मान लिया जाएगा? यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है। तमिलनाडु ने जो सवाल उठाया है, वह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है — “अगर पहचान की सीमाएं मिटा दी जाएं, तो लोकतंत्र की जड़ें भी हिल सकती हैं।”




