तेजस्वी के ‘प्रण’ से घबराई बीजेपी जेडीयू— 20 साल बाद फिर जनता की याद, हुई जुमलों की बरसात
बिहार की सियासत इस बार पहले से कहीं ज़्यादा आक्रामक, निर्णायक और जनभावनाओं से भरी हुई है। एक तरफ हैं तेजस्वी यादव, जो अपने “बिहार का तेजस्वी प्रण” के ज़रिए युवाओं को रोजगार, महिलाओं को सम्मान और किसानों को स्थायित्व देने की बात कर रहे हैं, और दूसरी तरफ है बीजेपी-जेडीयू गठबंधन — जो बीते दो दशकों की सत्ता के बावजूद अब जनता को नए वादों और पुराने जुमलों के कॉकटेल से रिझाने की कोशिश कर रहा है। पटना में NDA ने शुक्रवार को 69 पन्नों का “संकल्प पत्र 2025” जारी किया, जिसमें 1 करोड़ नौकरियां, हर महिला को ₹2 लाख की सहायता, हर किसान को ₹3000 वार्षिक सहयोग और “पंचामृत गारंटी” जैसी लुभावनी योजनाएं शामिल हैं। लेकिन जनता का सीधा सवाल है — “जब 20 साल से सत्ता में थे, तब क्या कर रहे थे? अब चुनाव आया तो जनता याद आई?”
बिहार के युवा अब थक चुके हैं — बेरोजगारी, पलायन और टूटे वादों से। उद्योग नहीं आए, निवेश ठप पड़ा, और लाखों युवाओं को अपने राज्य से बाहर मजदूरी करनी पड़ी। अगर बीजेपी-जेडीयू गठबंधन ने सच में बिहार को बदलने की ठानी होती, तो बीस सालों में हर घर में रोजगार और हर गली में विकास दिखता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तेजस्वी यादव ने जब हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी, ‘जीविका दीदी’ को स्थायी नौकरी और ₹30,000 वेतन, ₹500 में गैस सिलेंडर और ₹25 लाख तक के हेल्थ इंश्योरेंस का वादा किया, तो बीजेपी ने इसे अव्यवहारिक कहा था। मगर अब वही बीजेपी तेजस्वी की नीति की कॉपी बनाकर जनता को वही पुराने सपने नए शब्दों में बेच रही है — “पन्ना नया, पर जुमला वही पुराना।”
बीजेपी की असली समस्या वादों की नहीं, भरोसे की है। 2014 से 2024 के बीच जनता को जितने सपने दिखाए गए, वे अब सियासी मीम बन चुके हैं। “हर साल 2 करोड़ नौकरियां”, “हर खाते में ₹15 लाख”, “महंगाई खत्म करेंगे” — ये सब अब जनता के लिए हंसी और ग़ुस्से का प्रतीक हैं। आज रसोई गैस ₹1300 से ऊपर, पेट्रोल ₹120 लीटर, और सब्ज़ियां आसमान पर हैं। किसानों की आय दोगुनी करने का वादा अब सिर्फ भाषणों में बचा है। और अब जब चुनाव सामने है, तो वही वादे, वही चेहरे, वही मंच — बस पोस्टर नया और जुमला रीपैकेज्ड।
NDA का “संकल्प पत्र 2025” अब जनता के बीच “जुमला मेनिफेस्टो 2.0” के नाम से वायरल है। बिहार के गलियारों में, सोशल मीडिया पर, और हर चौपाल में एक ही सवाल गूंज रहा है — “अगर कर सकते थे, तो अब क्यों नहीं किया?” क्या नौकरी देने से किसी ने रोका था? क्या महिलाओं की सुरक्षा और किसानों का सम्मान किसी विदेशी नीति पर निर्भर था? क्या सड़कों और अस्पतालों के विकास के लिए अनुमति किसी और से लेनी थी?
तेजस्वी यादव के वादे इसलिए असरदार हैं क्योंकि वे बिहार की ज़मीन की सच्चाई से उपजे हैं। उनका फोकस मेट्रो और एयरपोर्ट जैसी दिखावटी परियोजनाओं पर नहीं, बल्कि रोज़गार, शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर है। वे बिहार के उस आम आदमी की बात करते हैं जो हर महीने बढ़ती कीमतों और घटती उम्मीदों से जूझ रहा है। तेजस्वी का “प्रण” बिहार के भविष्य की सच्ची दिशा की तरह देखा जा रहा है, जबकि बीजेपी का “संकल्प पत्र” déjà vu — यानी पुराना सपना नए पैकेज में — बन गया है।
सोशल मीडिया पर जनता पहले ही अपना मूड जाहिर कर चुकी है। X (पूर्व ट्विटर) पर #जुमला_मेनिफेस्टो_2_0 ट्रेंड कर रहा है। लोग लिख रहे हैं —
- “20 साल सत्ता में रहकर अब फिर 1 करोड़ नौकरियों का वादा? शर्म करो!”
- “तेजस्वी ने घोषणापत्र लिखा, बीजेपी ने हूबहू कॉपी किया।”
- “15 लाख का सपना बेचने वाले अब 1 करोड़ नौकरियों की बात कर रहे हैं — वाह!”
बिहार अब सुनने के मूड में नहीं, हिसाब लेने के मूड में है। 6 और 11 नवंबर को मतदान होंगे, 14 नवंबर को नतीजे आएंगे। लेकिन इस बार हवा कुछ और कह रही है —
“अब नहीं चाहिए जुमलों का बिहार — अब चाहिए काम, रोजगार और इज़्ज़त वाला बिहार।”




