संतोष झा | रांची 2 जनवरी 2026
गलत सिस्टम का शिकार बने लोग, अब जिम्मेदारी तय होगी
झारखंड हाई कोर्ट ने रांची स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) की जमीन पर हुए अवैध कब्जे और निर्माण के मामले में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो सिर्फ झारखंड ही नहीं, पूरे देश में प्रशासनिक जवाबदेही की बहस को नई दिशा देता है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि जिन लोगों के घर तोड़े गए हैं, उन्हें मुआवजा जरूर मिलेगा, लेकिन यह पैसा राज्य के खजाने से नहीं जाएगा। इसकी भरपाई उन अधिकारियों और बिल्डरों से की जाएगी, जिनकी लापरवाही और मिलीभगत से यह अवैध निर्माण संभव हुआ।
क्या है पूरा मामला: सरकारी जमीन पर निजी साम्राज्य
यह मामला लगभग 7 एकड़ उस जमीन से जुड़ा है, जिसे 1964–65 में सरकार ने RIMS के लिए अधिग्रहित किया था। इसके बावजूद वर्षों तक इस जमीन पर अवैध कब्जे होते रहे, मकान बने, खरीदे-बेचे गए और लोग वहां बसते चले गए। हैरानी की बात यह है कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में हेरफेर किया गया, रेंट रसीदें काटी गईं, नॉन-एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट जारी हुए और यहां तक कि रांची म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ने बिल्डिंग प्लान तक सैंक्शन कर दिए। बाद में इन्हीं निर्माणों को RERA से भी मंजूरी मिल गई। यानी पूरा सिस्टम आंख मूंदकर या मिलीभगत से चलता रहा।
जब सच सामने आया, तब टूटी छतें
कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जब जमीन की असलियत सामने आई, तो प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की। देखते ही देखते मकान ढहाए गए और वहां रह रहे लोग बेघर हो गए। इनमें से अधिकांश लोग ऐसे थे, जिन्होंने दस्तावेज देखकर, रजिस्ट्री कराकर और सरकारी अनुमतियों के भरोसे अपने जीवन की पूंजी लगाई थी। अदालत ने माना कि ये लोग अपराधी नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी के शिकार हैं।
अदालत की सख्त टिप्पणी: क्यों जनता और खजाना भुगते?
मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की डिवीजन बेंच ने बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि जब अवैधता सरकारी अधिकारियों, नगर निगम और नियामक संस्थाओं की वजह से हुई है, तो उसका बोझ राज्य के खजाने पर क्यों डाला जाए? कोर्ट ने कहा कि अगर सर्किल ऑफिसर, रजिस्ट्री अधिकारी, नगर निगम और RERA के अधिकारी सतर्क होते, तो आज आम लोग इस पीड़ा से नहीं गुजरते।
जवाबदेही तय करने का आदेश
हाई कोर्ट ने सिर्फ टिप्पणी कर के मामला नहीं छोड़ा, बल्कि ठोस निर्देश भी दिए। राज्य पुलिस और एंटी-करप्शन ब्यूरो को आदेश दिया गया है कि रांची जिला प्रशासन के दोषी अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर जांच की जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर उस अधिकारी और बिल्डर की पहचान की जाए, जिनकी वजह से सरकारी जमीन पर निजी निर्माण हुआ। मुआवजे की जिम्मेदारी भी इन्हीं लोगों पर डाली जाएगी।
मुआवजा मिलेगा, लेकिन ‘दोषी देगा’
कोर्ट ने प्रभावित निवासियों को “adequately compensate” करने का निर्देश दिया है। हालांकि अभी मुआवजे की राशि तय नहीं की गई है, लेकिन सिद्धांत बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया है—गलत अफसर और बिल्डर अपनी जेब से भुगतान करेंगे, न कि राज्य सरकार। यह फैसला उन हजारों मामलों के लिए नजीर बन सकता है, जहां सरकारी लापरवाही का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है।
एक बड़ा संदेश: अब अफसर बच नहीं पाएंगे
यह फैसला सिर्फ RIMS की जमीन या रांची तक सीमित नहीं है। यह एक सख्त चेतावनी है कि अब सरकारी पद ढाल नहीं बन पाएगा। अगर कोई अधिकारी नियमों की अनदेखी करेगा, आंख मूंदेगा या भ्रष्टाचार करेगा, तो उसकी कीमत उसे व्यक्तिगत तौर पर चुकानी होगी। अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को होगी, लेकिन इतना तय है कि यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही के इतिहास में एक अहम मोड़ बन चुका है।




