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चुनाव धांधली पर सुप्रिया : EC पर सवाल उठते ही क्यों बेचैन ये 272 लोकतंत्र-बोझ?

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महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 19 नवंबर 2025

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते सवालों और राहुल गांधी की आलोचना करने वालों पर सबसे सीधा, सबसे आक्रामक हमला बोला है। प्रधानमंत्री का नाम लिए बिना उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब देशभर में वोट चोरी, फर्जी वोटर सूची, नकली पते और अवैध वोटिंग के इतने प्रमाण सामने आ रहे हैं, तब भी कुछ “272 लोग” जनता की आंखों पर पर्दा डालने और लोकतंत्र की सच्चाई दबाने के लिए आगे आ जाते हैं। श्रीनेत का तंज बेहद कड़ा था—140 करोड़ की आबादी में ये 272 लोग कितने प्रतिष्ठित हैं, यह तो नहीं पता, लेकिन इतना जरूर है कि ये सभी BJP के राजनीतिक “रोजगार एक्सचेंज” में अपनी उम्मीदवारी पक्की करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। सवाल उठाने की बजाय ये सत्ता का बचाव करने वाले ऐसे चेहरों की कतार बन गए हैं जो केवल एक उद्देश्य पूरा कर रहे हैं—लोकतांत्रिक संस्थाओं को ढाल बनाकर चुनावी धांधली को वैध ठहराना।

उन्होंने एक-एक करके उन सवालों की सूची पेश की, जिनसे ये तथाकथित “प्रतिष्ठित चेहरे” हमेशा भागते हैं। श्रीनेत के शब्दों में—कितनों में हिम्मत है कि वे फर्जी पते, फर्जी फोटो, नकली आईडी और एक ही घर में सैकड़ों वोटर्स के नाम दर्ज होने की धांधली पर सवाल उठाएं? कितनों में साहस है कि वे चुनाव के दौरान सरकार द्वारा खुलेआम पैसे बांटने और चुनाव आयोग की संदिग्ध चुप्पी पर उंगली उठा सकें? और कितने लोग सामने आकर पूछ सकते हैं कि BJP के नेता अलग-अलग जगहों पर कई बार वोट डालते हुए क्यों पकड़े गए, और चुनाव आयोग क्यों मौन साधे बैठा रहा? असलियत यह है कि चुनाव आयोग को बचाने के नाम पर ये सारे चेहरे लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने की तैयारी में लगे हुए हैं।

श्रीनेत ने कड़ा स्मरण कराया कि 2014 से पहले देश के प्रतिष्ठित और जिम्मेदार नागरिक सत्ता से सवाल पूछते थे, क्योंकि संसाधन, शक्ति और निर्णय उसी के पास होते हैं। लेकिन आज परिस्थिति उलट गई है—अब जवाबदेही की मांग करने वाला विपक्ष ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है, जबकि लोकतंत्र की मर्यादा तोड़ने वाले सत्ता पक्ष के नेता संरक्षित कर दिए जाते हैं। यह बदलाव सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। आज वह व्यक्ति, जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए मजबूत आवाज़ उठा रहा है—राहुल गांधी—उसी को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि धांधली के केंद्र में बैठे लोग बचाव करने वालों की भीड़ पीछे से खड़ी कर रहे हैं।

मीडिया पर हमला करते हुए श्रीनेत का कटाक्ष और भी तीखा था। उन्होंने कहा कि आज के मीडिया “चरणचुम्बक” सत्ता के इशारे पर चलने वाले ऐसे प्राणी हैं जो नरेंद्र मोदी के दिन को अगर रात कह दिया जाए तो सियार की तरह हुआँ-हुआँ करते हुए उसकी पुष्टि करने दौड़ पड़ते हैं। सत्ता की कथाओं को दोहराना और जनता की आवाज़ दबाना, यही इनकी नई भूमिका बन गई है। इन मीडिया घरानों ने अपनी नैतिकता, सत्यनिष्ठा और साहस को सत्ता के चरणों में समर्पित कर दिया है।

सुप्रिया श्रीनेत का यह बयान सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं—यह लोकतंत्र की चेतावनी है। यह संकेत है कि अगर संस्थाएं सत्ता की कठपुतली बनती रहीं, और सवाल पूछने वालों को ही अपराधी की तरह प्रस्तुत किया जाता रहा, तो देश का लोकतांत्रिक ढांचा खोखला हो जाएगा। यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं—भारत के भविष्य की लड़ाई है।

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