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सुप्रीम कोर्ट: अल्पसंख्यक स्कूलों को RTE छूट पर पुनर्विचार जरूरी

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नई दिल्ली 2 सितंबर 2025

नई स्थिति का खुलासा

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के उस फैसले पर गंभीर संदेह व्यक्त किया, जिसमें धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक संस्थानों को “राइट ऑफ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कम्पलसरी एजुकेशन (RTE) एक्ट, 2009” से पूर्ण रूप से मुक्त किया गया था। न्यायमण्डल ने इस व्यापक छूट को पुनर्विचार के लिए बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजने का निर्देश दिया। इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि अदालत अब प्राथमिक शिक्षा की सार्वभौमिकता और अल्पसंख्यक संस्थाओं की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना चाहती है।

मुख्य चिंताएं

न्यायमूर्ति दिपङ्कर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने देखा कि 2014 का निर्णय सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य को कमजोर कर सकता है और शिक्षा के समान अवसरों की दिशा में बाधा डाल सकता है। अदालत का मानना है कि RTE की मूल धारा, जिसके तहत निजी स्कूलों को कम से कम 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं, अल्पसंख्यक संस्थाओं पर भी लागू होनी चाहिए।

आगे की प्रक्रिया

मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष रखा गया है, जो यह तय करेंगे कि इसे बड़ी पीठ को भेजा जाए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक संस्थानों को दी गई blanket छूट पर अब पुनर्विचार अवश्य होना चाहिए। इस कदम से यह संभावना बढ़ जाती है कि जल्द ही RTE के दायरे और अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों पर नए निर्देश आ सकते हैं।

कानूनी पहलू

अनुच्छेद 30(1) के तहत धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्थाएँ बनाने और संचालित करने का अधिकार है।

वहीं, RTE एक्ट, सेक्शन 12(1)(c) निजी स्कूलों को 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समूहों के बच्चों के लिए आरक्षित करने का दायित्व देता है।

अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या अल्पसंख्यक संस्थाओं को दी गई छूट केवल उनके कमजोर वर्ग के बच्चों तक सीमित होनी चाहिए, ताकि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे।

सुप्रीम कोर्ट का यह कदम शिक्षा की सार्वभौमिकता और अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। अब यह मुख्य न्यायाधीश और बड़ी पीठ के निर्णय पर निर्भर करेगा कि RTE के दायरे का नया निर्धारण कैसे होगा और इसके प्रभाव से पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा और सामाजिक समानता को किस दिशा में मजबूती मिलेगी।

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