कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय कुमार लल्लू ने भाजपा सांसद और प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने न्यूज चैनल आज तक की एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा करते हुए सुधांशु त्रिवेदी को “झूठ की फैक्ट्री”, “आधे-अधूरे सच की राजनीति करने वाला” और “नफरत की राजनीति का दूत” करार दिया। लल्लू का कहना है कि सुधांशु त्रिवेदी की पहचान तथ्यपरक बहस से नहीं, बल्कि शब्दजाल, आक्रामक अंदाज़ और बार-बार दोहराए गए झूठ से बनी है, जिसे टीवी डिबेट्स के ज़रिए सच की तरह पेश किया जाता है।
अजय कुमार लल्लू ने अपने पोस्ट में लिखा कि अगर किसी को यह समझना हो कि झूठ को आत्मविश्वास और ऊंचे सुर में बोलकर कैसे विश्वसनीय बनाया जाता है, तो उसे सुधांशु त्रिवेदी को ध्यान से सुनना चाहिए। उनके मुताबिक, त्रिवेदी के भाषणों में ठोस तथ्य कम और मनगढ़ंत कथाएं ज़्यादा होती हैं। ये कथाएं जब बार-बार दोहराई जाती हैं, तो धीरे-धीरे “सच” का रूप लेने लगती हैं। लल्लू ने इसे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति बताया, जिसमें आधे सच को पूरे झूठ में बदलकर जनता के सामने परोसा जाता है।
कांग्रेस नेता ने स्टीव जॉब्स की पत्नी को लेकर दिए गए बयान को ताज़ा उदाहरण बताते हुए कहा कि यह कोई राय का मामला नहीं, बल्कि सीधा तथ्यात्मक झूठ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरीन पॉवेल थीं और जीवनभर वही रहीं। यह जानकारी किसी सोशल मीडिया पोस्ट या अफवाह पर आधारित नहीं है, बल्कि स्टीव जॉब्स के आधिकारिक जीवनीकार वाल्टर इसाक्सन की 2011 में प्रकाशित चर्चित किताब Steve Jobs में दर्ज है। इसके बावजूद अगर कोई सार्वजनिक मंच से दूसरी कहानी गढ़ता है, तो इसे अनजाने में हुई भूल नहीं, बल्कि जानबूझकर बोला गया झूठ ही कहा जाएगा।
लल्लू ने कहा कि यही तरीका सावरकर के मामले में भी अपनाया जाता है। उनके अनुसार, सुधांशु त्रिवेदी और उनसे जुड़े वक्ता सावरकर का ज़िक्र करते समय सिर्फ वही बातें सामने रखते हैं जो उनके राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल हों। लेकिन जब पूरी सच्चाई रखने की बात आती है, तो वही लोग चुप्पी साध लेते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सुधांशु त्रिवेदी यह भी बताएंगे कि सावरकर ने अपने लेखन में गाय को “मूर्ख पशु” कहा था और गोमांस खाने की बात स्वीकार की थी? क्या वे यह स्वीकार करेंगे कि सावरकर का हिंदुत्व आज प्रचारित किए जा रहे नैरेटिव से अलग था?
कांग्रेस नेता ने “वीर” सावरकर की छवि को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि Life of a Barrister नामक किताब को सावरकर की महानता का प्रमाण बताया जाता है, जबकि यह कोई निष्पक्ष जीवनी नहीं थी। यह किताब 1926 में ‘चित्रगुप्त’ नाम से प्रकाशित हुई थी, लेकिन ऐतिहासिक शोध के मुताबिक यह छद्म नाम खुद सावरकर का था। लल्लू के अनुसार, खुद की तारीफ खुद लिखना और खुद को ‘वीर’ घोषित करना इतिहास नहीं, बल्कि आत्म-प्रचार था, जिसे आज वैचारिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
सावरकर की सजा को लेकर भी आधे सच फैलाने का आरोप लगाते हुए अजय कुमार लल्लू ने कहा कि अक्सर यह बताया जाता है कि उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा हुई थी, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि वे वास्तव में कितने साल जेल में रहे और उन्होंने अंग्रेज़ सरकार को कितनी बार दया याचिकाएं लिखीं। लल्लू ने कहा कि ये बातें राय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य हैं, जिन्हें जानबूझकर छिपाया जाता है ताकि एक खास छवि बनाए रखी जा सके।
उन्होंने अंडमान की सेलुलर जेल में सावरकर के साथ रहे क्रांतिकारियों की गवाही का भी हवाला दिया। लल्लू के अनुसार, क्रांतिकारी बारिन्द्र घोष ने अपने लेखन में बताया था कि सावरकर बंधु जेल में दूसरों को जेलर के खिलाफ आंदोलन के लिए उकसाते थे, लेकिन जब खुलकर संघर्ष करने की बात आती थी, तो पीछे हट जाते थे। इतना ही नहीं, उन्हें कठिन श्रम से भी अलग रखा गया था। लल्लू ने कहा कि यह किसी राजनीतिक विरोधी का आरोप नहीं, बल्कि सह-कैदी क्रांतिकारी की लिखित गवाही है।
अजय कुमार लल्लू ने कहा कि सावरकर और संघ परिवार से जुड़े ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां इतिहास को काट-छांटकर और सुविधानुसार पेश किया गया। उनके मुताबिक, सुधांशु त्रिवेदी इसी परंपरा के आज के प्रवक्ता हैं। असली सवाल यह नहीं है कि वे कितनी जोर से बोलते हैं या कितनी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि यह है कि वे कितना सच बोलते हैं।
अपने बयान के अंत में कांग्रेस नेता ने कहा कि इतिहास बहस से नहीं डरता, लेकिन झूठ के शोर में उसे दबाया ज़रूर जा सकता है। उनके मुताबिक, आज यही हो रहा है—झूठ को इतनी बार दोहराया जा रहा है कि सच हाशिये पर चला गया है। फिलहाल, इतना सच सामने रखना ही काफी है, क्योंकि पूरे सच को समझने और स्वीकार करने में वक्त लगता है।





