आलोक कुमार । नई दिल्ली 2 दिसंबर 2025
भारत का सुप्रीम कोर्ट दुनिया के सबसे प्रभावशाली न्यायिक संस्थानों में गिना जाता है—और खुद को हमेशा दलितों, आदिवासियों और हाशिये पर खड़े समुदायों के अधिकारों का संरक्षक बताता रहा है। लेकिन इसी संस्था को लेकर एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबॉर्न द्वारा सुप्रीम कोर्ट के सहयोग से किए गए 75 वर्षों के फैसलों के विश्लेषण में पाया गया है कि अदालत ने भले ही दलितों के लिए प्रगतिशील निर्णय दिए हों, लेकिन उन फैसलों में इस्तेमाल की गई भाषा में अनजाने में ही सही—गहरा जातिगत पूर्वाग्रह झलकता रहा है।
अध्ययन के अनुसार भारत के शीर्ष न्यायाधीशों ने यह तो सुनिश्चित किया कि दलित अधिकार कानूनन सुरक्षित रहें, पर अपनी ही टिप्पणी और उपमानों में कभी-कभी उसी जाति-व्यवस्था को पुनः दोहराते रहे, जिसे वे खत्म करना चाहते थे।
यह शोध 1950 से 2025 तक की सभी संविधान पीठ (Constitution Bench) के फैसलों का अध्ययन करता है—यानी वे फैसले जो देश की न्याय व्यवस्था की दिशा तय करते हैं, पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जाते हैं, और आगे आने वाली पीठों में मिसाल बनते हैं। अध्ययन दर्शाता है कि प्रगतिशील फैसलों के बावजूद भाषा के स्तर पर अदालत कई बार “दलितों की गरिमा” के बजाय “उनकी हीन स्थिति” को परिभाषित कर बैठती है। उदाहरण के तौर पर, कुछ निर्णयों में दलितों की तुलना “ordinary horses”—साधारण घोड़ों—से की गई, जबकि ऊँची जातियों को “first-class race horses” कहा गया। कुछ फैसलों में आरक्षण जैसी नीतियों को “crutches”—बैसाखियां—बताया गया, मानो दलित समुदाय अपने प्रयास से नहीं, किसी सहारे से आगे बढ़ रहा हो।
अध्ययन यह भी बताता है कि कई न्यायाधीशों ने जाति को केवल “विभाजन-ए-श्रम” की हानिरहित व्यवस्था बताया—जो शोधकर्ताओं के अनुसार सामाजिक वास्तविकता से बिल्कुल उलट है, क्योंकि यही व्यवस्था दलितों को सदियों तक “अशुद्ध और अपमानजनक” कार्यों में धकेलती रही है। एक 2020 के फैसले में तो आदिवासी समुदायों को “primitive”—आदिम—बताते हुए कहा गया कि वे “मुख्यधारा के कानूनों” को समझने में सक्षम नहीं, और उन्हें राष्ट्रहित के लिए तैयार करना पड़ेगा। अध्ययन के अनुसार ऐसी भाषा न केवल असंवेदनशील है, बल्कि हानिकारक रूढ़ियों को मजबूत करती है।
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में ऐसी समस्याओं को पहचानने की कोशिश भी की है। उदाहरण के लिए, 2023 में अदालत ने “जेंडर स्टीरियोटाइप्स” को खत्म करने हेतु एक खास हैंडबुक जारी की थी। इसी तरह, 2022 में जेल मैन्युअल्स में मौजूद जातिगत भेदभाव को खत्म करने का भी आदेश दिया गया था। लेकिन शोधकर्ता मानते हैं कि कानूनी भाषा में जातिगत संवेदनशीलता को लेकर अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
अध्ययन यह भी इंगित करता है कि समस्या सिर्फ़ भाषा तक सीमित नहीं है—बल्कि यह भी कि सुप्रीम कोर्ट में दलित प्रतिनिधित्व बेहद कम रहा है। स्वतंत्र भारत के 75 सालों में सिर्फ़ आठ दलित न्यायाधीश सर्वोच्च अदालत तक पहुंचे। हाल ही में सेवानिवृत्त हुए मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, जो देश के दूसरे दलित मुख्य न्यायाधीश थे, और उनसे पहले न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन ही ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने अदालत की भाषा में जातिगत वास्तविकताओं को पूरी स्पष्टता के साथ दर्ज किया। उनका लेखन जाति को “ऐसा बंधन बताया जिससे मृत्यु भी मुक्ति नहीं देती”—जो उस वास्तविकता को दर्शाता है जिसे कई फैसलों में नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
यह रिपोर्ट भारतीय न्यायपालिका में एक दुर्लभ आत्ममंथन का क्षण है। यह दिखाती है कि जातिगत समानता की लड़ाई सिर्फ़ कानूनों और फैसलों में नहीं, बल्कि भाषा, उपमानों और न्यायिक लेखन के हर शब्द में लड़ी जाती है।
अध्ययन के अनुसार यदि भाषा नहीं बदली, तो न्याय भी अधूरा रह जाएगा—भले ही फैसले प्रगतिशील क्यों न हों।




