जुमला पार्टी का एक और महा-धोखा
प्रधानमंत्री की ‘जुमला पार्टी’ के शासन में, भारतीय रेलवे ने एक बार फिर जनता की आँखों में धूल झोंकने का बेशर्मी भरा कारनामा किया है, जिसे सोशल मीडिया पर ‘अजब मंत्रालय की गजब कहानी’ नाम दिया गया है। देश को यह कहकर गुमराह किया गया कि रेलवे ने यात्रियों की भीड़ कम करने के लिए रिकॉर्ड 12,075 “स्पेशल ट्रेनों” का जाल बिछाया है। लेकिन, जब सार्वजनिक दबाव के बाद रेलवे मंत्रालय ने इन ‘स्पेशल ट्रेनों’ की तथाकथित भव्य सूची जारी की, तो देश स्तब्ध रह गया। यह “भव्यता” सिर्फ 142 लाइनों में सिमट कर रह गई! यह संख्या रेलवे के उस खोखले दावे की पोल खोलती है, जो कागज़ी घोड़े दौड़ाकर अपनी असफलता को छिपाने की कोशिश कर रहा है। यह झूठ का पुलिंदा है, जो दिखाता है कि यह मंत्रालय यात्रियों की सुविधा से ज़्यादा, अपने ‘एक्सेल शीट’ के आंकड़ों को चमकाने में व्यस्त है, और यह संख्या इस सरकार के हर दावे की तरह हवा-हवाई साबित हुई है।
गणितीय ढोंग का नया स्तर: एक ट्रेन पाँच राज्यों से गुज़री, तो बन गई पाँच ट्रेनें
रेलवे मंत्रालय ने जो ‘आधिकारिक’ तालिका जारी की, उसमें कुल 142 एंट्रियाँ ही हैं, और इनमें से भी अधिकांश ट्रेनें केवल साप्ताहिक फ्रीक्वेंसी वाली हैं। यानी ज़मीनी हकीकत में न तो कोई 12 हज़ार ट्रेनें हैं, और न ही इतने नए रूट शुरू किए गए हैं। लेकिन मंत्रालय ने अपने झूठे दावे को सही साबित करने के लिए जो ‘गणितीय नवाचार’ अपनाया है, वह हास्यास्पद और निंदनीय है। रमेश ने खुलासा किया कि रेलवे की कलाबाजी यह है कि अगर एक ही ट्रेन पाँच राज्यों से गुजरती है, तो उसे पाँच अलग-अलग ट्रेनों के रूप में गिन लिया गया है! यानी, यदि एक स्पेशल ट्रेन दिल्ली से चेन्नई के लिए रवाना होती है और रास्ते में हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, और तेलंगाना से गुजरती है, तो उसे एक नहीं, बल्कि पाँच ट्रेन मान लिया गया! यह आंकड़ों के साथ किया गया सबसे बड़ा फ़्रॉड है, जहाँ यात्रा की सच्चाई को जुमलों के पहाड़ से ढका जा रहा है। सोशल मीडिया पर एक यूज़र ने तंज कसते हुए पूछा, “अगर एक ट्रेन दस स्टेशनों पर रुकती है, तो क्या उसे दस ट्रेनें मान लिया जाएगा? तब तो रेलवे के आंकड़े मंगल ग्रह तक पहुँच जाएंगे!”
रेलवे की बेशर्म सफाई: ‘तकनीकी कारणों’ की आड़ में आडंबर की गाड़ी
जब इस अविश्वसनीय झूठ पर बवाल मचा और सोशल मीडिया पर रेलवे का जम कर मज़ाक उड़ा, तब रेल मंत्रालय के सूत्रों ने एक बेहद कमज़ोर और बेशर्म सफाई देने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि “12075” संख्या रनिंग सेगमेंट्स की गणना पर आधारित है, यानी एक ही ट्रेन अगर कई राज्यों से गुजरती है तो हर राज्य में उसका ‘सेगमेंट’ अलग गिना गया है। लेकिन रेलवे के अपने ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पर कटाक्ष करते हुए मंत्रालय को नंगा कर दिया। अधिकारी ने कहा, “ऐसा लगता है कि रेलवे अब आंकड़ों की बजाय आडंबर की गाड़ी चला रहा है। यात्रियों की सुविधा से ज़्यादा जोर अब एक्सेल शीट पर ट्रेनें बढ़ाने पर है।” यह स्पष्ट है कि मंत्रालय का यह तथाकथित ‘तकनीकी कारण’ असल में एक राजनीतिक बहाना है, जिसका उद्देश्य सिर्फ़ कागज़ों पर अपनी उपलब्धि दिखाना है, जबकि टिकट न मिलने, ट्रेनों के देर से चलने और खराब रखरखाव की यात्रियों की शिकायतें आज भी जस की तस हैं।
जब सरकारी आंकड़े बन जाते हैं खोखले जुमले
रेल मंत्रालय का यह “12075 स्पेशल ट्रेन” का ढोल एक बार फिर साबित करता है कि यह सरकार जुमलेबाज़ी में कितनी आगे निकल चुकी है। यह घटना अब एक क्लासिक उदाहरण बन गई है कि कैसे सरकारी आंकड़े, कागज़ पर तो चमत्कार कर सकते हैं, पर ज़मीनी सच्चाई में 142 लाइनें ही सच्चाई बयान कर देती हैं। मंत्रालय का असली मकसद यात्रियों को सुविधा देना नहीं, बल्कि आंकड़ों का तमाशा खड़ा करना है, ताकि जनता की नज़रों में अपनी ‘कामयाबी’ का भ्रम बनाए रखा जा सके। “वाह भोदी जी वाह” — यही है देश की जनता का वह तीखा तंज, उस व्यवस्था को, जो यात्रा की गंभीर हकीकत को झूठ की एक्सेल शीट की चमक से ढकने की शर्मनाक कोशिश करती है। यह सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर एक और बड़ा, अमिट धब्बा है।






