एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 14 मार्च 2026
भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब कोई पार्टी अपने ही हथियार से घायल हो जाए, तो वह नजारा देखने लायक होता है। हाल ही में लोकसभा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी पर जो हमला बोला, उसने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। राहुल ने दावा किया कि पुरी की बेटी को जॉर्ज सोरोस से फंडिंग मिली है, और मंत्री खुद जेफरी एपस्टीन के दोस्त होने का दावा करते हैं। यह बयान न सिर्फ सदन में हंगामा मचा गया, बल्कि बीजेपी की उस रणनीति पर भी सवाल खड़े कर रहा है, जिसके तहत वह वर्षों से सोरोस का नाम लेकर विपक्ष पर हमले करती रही है। अब सवाल उठ रहा है: क्या बीजेपी अपने ही बुने जाल में फंसती नजर आ रही है?
बीजेपी की राजनीतिक रणनीति में जॉर्ज सोरोस का नाम लंबे समय से एक प्रमुख हथियार रहा है। 2023 से लेकर अब तक पार्टी के कई नेता कांग्रेस पर “सोरोस से जुड़ाव” के आरोप लगाते रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर अदानी विवाद तक, कई मुद्दों पर सोरोस फंडिंग को लेकर तीखे राजनीतिक बयान दिए गए। राहुल गांधी को “सोरोस समर्थित एजेंडा” से जोड़ने की कोशिश भी की गई और विदेशी ताकतों द्वारा भारत को अस्थिर करने की कथित साजिश की बात कही गई।
लेकिन अब वही सोरोस का नाम बीजेपी के एक वरिष्ठ मंत्री के परिवार से जोड़ा जा रहा है। राहुल गांधी ने सदन में दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि उनके पास ऐसा दस्तावेज है जो दिखाता है कि मंत्री के परिवार से जुड़े एक कारोबारी संस्थान को सोरोस से फंड मिला। इस दौरान सदन में हंगामा हुआ और स्पीकर ओम बिरला को हस्तक्षेप करना पड़ा।
अगर इन आरोपों में तथ्य हैं, तो विपक्ष का कहना है कि यह राजनीतिक दोहरेपन का उदाहरण होगा—बाहर सोरोस को राष्ट्रीय खतरे के रूप में पेश करना और भीतर अगर ऐसा कोई संबंध सामने आए तो चुप्पी साध लेना। कांग्रेस का आरोप है कि यह वही मुद्दा है जिसे लेकर बीजेपी वर्षों से राजनीतिक माहौल बनाती रही है।
इस पूरे विवाद ने यह भी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सोरोस का मुद्दा भारतीय राजनीति में एक राजनीतिक टूल बन गया है। कांग्रेस का दावा है कि पुरी की बेटी हिमायनी पुरी की कंपनी ‘रियल्म पार्टनर्स एलएलसी’ को 2010 में सोरोस से निवेश मिला था। हालांकि बीजेपी की ओर से इन आरोपों को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है और पार्टी के कुछ नेताओं ने इसे निराधार आरोप बताया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस मामले में पारदर्शिता नहीं आई तो विवाद और गहरा सकता है। क्योंकि जिस मुद्दे को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक हमला किया गया, वही मुद्दा अब सवाल बनकर सत्तारूढ़ दल के सामने खड़ा है।
यह मामला संसद और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह केवल एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी सच्चाई सामने आती है।




