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सोहराबुद्दीन मुठभेड़ और राजनीतिक प्रतिशोध का मॉडल: 41 साल पुराने मामले में IPS अधिकारी को सजा

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गुजरात में राजनीतिक बदले की कार्रवाई का एक और चौंकाने वाला उदाहरण सामने आया है। 70 वर्षीय सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी कुलदीप शर्मा, जिन्होंने कुख्यात सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ कांड में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह के खिलाफ रिपोर्ट पेश की थी, अब खुद एक 41 साल पुराने मामूली केस में सजा पाए हैं। यह वही मामला है जिसे 1984 से लेकर 1995 तक अदालतों ने बार-बार ठंडे बस्ते में डाल दिया था — लेकिन नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद 2012 में फिर से जीवित कर दिया गया। कुलदीप शर्मा की कहानी केवल एक पुलिस अफसर की नहीं, बल्कि एक पूरे प्रशासनिक ढांचे की चुप्पी की कहानी है। 41 साल पुराने मामले में सजा देकर सत्ता ने यह संदेश दिया है कि “सवाल पूछने वालों की सजा तय है।” जबकि सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में अमित शाह 2014 में बरी हो चुके हैं, वही अफसर जिसने सच उजागर किया था, 2025 में जेल भेजा जा रहा है। अगर यही “गुजरात मॉडल” है — तो यह विकास नहीं, राजनीतिक प्रतिशोध का मॉडल कहलाएगा।

1984 की घटना, 2025 की सजा — राजनीतिक स्क्रिप्ट या न्याय की विफलता?

कुलदीप शर्मा उस समय कच्छ जिले के पुलिस उपाधीक्षक (DSP) थे। उन पर आरोप था कि उन्होंने एक कथित तस्कर, हाजी अब्दुल उर्फ इभालासेठ, को पुलिस स्टेशन में एक घंटे तक हिरासत में रखा और मारपीट की। मामला दर्ज करवाने वाला व्यक्ति पीड़ित नहीं बल्कि एक ‘राजनीतिक कार्यकर्ता’ शंकरलाल जोशी था। वर्षों तक यह केस अटका रहा क्योंकि सरकार से अभियोजन की अनुमति नहीं मिली थी।

लेकिन जैसे ही अमित शाह को 2010 में सोहराबुद्दीन मुठभेड़ केस में गिरफ़्तार किया गया, कुछ ही महीनों बाद यह पुराना केस फिर ज़िंदा हो उठा। 2012 में गुजरात सरकार ने अचानक अनुमति दे दी कि शर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए। और अब, चार दशक बाद, अदालत ने तीन महीने की जेल और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुना दी।

मोदी-शाह के निशाने पर रहे थे कुलदीप शर्मा

शर्मा के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में साफ कहा था कि यह पूरा मामला “राजनीतिक प्रतिशोध की पराकाष्ठा” है। शर्मा ने 2010 में गुजरात सरकार की एक रिपोर्ट में शाह की भूमिका पर सवाल उठाए थे, जिसमें सोहराबुद्दीन, उनकी पत्नी कौसरबी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ का ज़िक्र था।

इतना ही नहीं — शर्मा ने माधवपुरा मर्केंटाइल बैंक घोटाले, मल्लिका साराभाई केस, और कमलेश त्रिपाठी उगाही प्रकरण में भी अमित शाह पर सवाल उठाए थे। इन मामलों में उन्होंने सीधे तौर पर अमित शाह पर राजनीतिक दबाव डालने और पुलिस जांच रोकने के आरोप लगाए थे। यही कारण था कि शर्मा का दावा है — “जब मैंने सिस्टम से सवाल पूछे, तो सिस्टम ने मुझे सजा दी।”

गुजरात मॉडल या बदले की राजनीति का मॉडल?

यह पहला मामला नहीं है जब गुजरात के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सत्ता के निशाने पर आए हों।

संजिव भट्ट — 2019 में उम्रकैद, जबकि उन्होंने 2002 दंगों में मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

आर.बी. श्रीकुमार — 2022 में गिरफ्तार, उन्होंने भी गवाही दी थी कि गुजरात प्रशासन ने दंगों के दौरान भूमिका निभाई।

सतीश चंद्र वर्मा — 2022 में रिटायरमेंट से एक माह पहले बर्खास्त, क्योंकि वे इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ केस की जांच में शामिल थे।

इन सभी अधिकारियों की एक समान कहानी है — जिन्होंने सत्ता से सवाल पूछे, उन्हें “दुश्मन” बना दिया गया।

सवाल उठता है — न्याय किसके लिए, और किसके खिलाफ?

कुलदीप शर्मा के खिलाफ जिस मुकदमे में सजा दी गई, वह 1984 की एक मामूली हिरासत शिकायत पर आधारित था — जबकि गुजरात में सैकड़ों गंभीर भ्रष्टाचार और हिंसा के मामले दशकों से लंबित हैं। अदालतों ने वर्षों तक इस केस को ठंडे बस्ते में रखा था, लेकिन जैसे ही राजनीतिक समीकरण बदले, न्याय की रफ्तार अचानक तेज़ हो गई।क्या यह सिर्फ एक ‘कानूनी प्रक्रिया’ थी या एक “राजनीतिक संदेश” — कि जो मोदी-शाह के खिलाफ बोलता है, उसके लिए राज्य हो या देश में कोई जगह नहीं है?

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