योगेन्द्र यादव, समाजसेवी
जो तुगलकी फ़रमान था, वह अब शातिर तिकड़म में बदल चुका है। यानी राष्ट्रीय विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) का आदेश बिना सोचे-समझे लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने वाला एक भोथरा औज़ार बनकर अब एक ऐसा हथियार बन गया है, जो चुन-चुनकर लोगों को बाहर करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। मतदाता सूची में बने रहने की ज़िम्मेदारी अब भी मतदाता पर है, और दस्तावेज़ सत्यापन की प्रक्रिया पहले से भी अधिक मनमानी और अपारदर्शी है। नागरिकता-सत्यापन के नाम पर यह प्रक्रिया अब उस दिशा में बढ़ रही है, जहाँ चुनिंदा व्यक्तियों या समुदायों के वोट काटे जा सकेंगे। यह मतदाता सूची का सुधार नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद पर सुनियोजित प्रहार है।
चुनाव आयोग ने पिछले साल नवंबर में यह आदेश जारी किया था कि देशभर में मतदाता सूची का ‘राष्ट्रीय विशेष गहन पुनरीक्षण’ यानी एस.आई.आर. किया जाएगा। अब यह प्रक्रिया चुनाव के पहले चरण में लागू की जा रही है। बिहार में एस.आई.आर. के आदेश के तहत माता-पिता के स्वीकृत दस्तावेज़ जमा न करने पर अब कोई दस्तावेज़ जमा नहीं कर सकते। यानी अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से बाहर हो गया, तब वह अब सुधार नहीं कर सकता। पहले तक मतदाता के पास दस्तावेज़ जमा करने का अधिकार था। अब चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को और कठिन बना दिया है।
देशभर में चुनाव आयोग आम लोगों से नाम मतदाता सूची से हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की बात करता है, लेकिन बिहार में यह व्यवस्था प्रभावित लोगों को और अपारदर्शी प्रक्रिया के हवाले कर रही है।
चुनाव आयोग की इस योजना में सबसे बड़ी खामी यह है कि यह नागरिकता सत्यापन के नाम पर लोगों की पहचान को संदिग्ध बनाने का रास्ता खोल रही है। 2002-04 की मतदाता सूची को आधार मानकर यह पूरी प्रक्रिया चल रही है। यानी जिन लोगों के पास उस समय के प्रमाणपत्र नहीं हैं, वे बाहर हो सकते हैं। बिहार में लाखों लोग ऐसे हैं जिन्होंने तब से लेकर अब तक अपने पते बदले हैं या विस्थापित हुए हैं।
कई परिवारों के सदस्य रोज़गार, शिक्षा या सामाजिक कारणों से बाहर चले गए हैं। ऐसे में अब वे अगर स्थानीय मतदाता सूची में अपना नाम जोड़ना चाहें तो चुनाव आयोग ने इसके लिए नई शर्तें रख दी हैं। इन शर्तों के तहत अगर किसी व्यक्ति के माता-पिता का नाम सूची में नहीं है तो अब उस व्यक्ति का नाम जोड़ा नहीं जा सकेगा। इस तरह की प्रक्रिया नागरिकता-सत्यापन के बहाने चुनावी अधिकारों को सीमित करने का माध्यम बन सकती है।
कहा जा रहा है कि बिहार में मतदाता सूची का यह गहन पुनरीक्षण चुनावी पारदर्शिता के लिए है, लेकिन यह पारदर्शिता नहीं, बल्कि चयनित निष्कासन का औज़ार बन सकता है।
कई जगहों पर यह भी देखने को मिला कि सत्यापन के दौरान लोगों की पहचान के लिए ‘डुप्लिकेट सॉफ्टवेयर’ इस्तेमाल किया गया, जिससे बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी डेटा को असली मान लिया गया। बिहार के कई ज़िलों में मौजूद मतदाता सूची में ऐसे नाम जोड़े या हटाए गए हैं जो किसी न किसी समुदाय या समूह को निशाना बनाने की मंशा को दर्शाते हैं।
यह भी सच है कि चुनाव आयोग की 12 दस्तावेज़ों की स्वीकृत सूची में अब भी राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, मनरेगा जॉब कार्ड जैसे दस्तावेज़ों को मान्यता नहीं मिली है। यानी ग़रीब, प्रवासी या श्रमिक वर्ग के लिए दस्तावेज़ जुटाना लगभग असंभव बना दिया गया है।
मुख्य चिंता यह है कि मतदाता सूची में संशोधन के नाम पर यह प्रक्रिया अब प्रशासनिक नियंत्रण का साधन बन गई है। पहले चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करता था कि कोई भी नागरिक मताधिकार से वंचित न हो, लेकिन अब यह ज़िम्मेदारी नागरिक पर डाल दी गई है। यानी अगर आपका नाम सूची से हट गया तो दोष आपका है, प्रणाली का नहीं।
एस.आई.आर. के ज़रिए नागरिकता और मताधिकार दोनों को जोड़ देने की प्रवृत्ति बहुत ख़तरनाक है। लोकतंत्र में नागरिकता और मताधिकार दो अलग-अलग संवैधानिक अधिकार हैं। दोनों को एक दूसरे पर निर्भर बना देना असंवैधानिक ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी खतरनाक है।
चुनाव आयोग का यह आदेश चुनाव सुधार नहीं, बल्कि ‘वोट सुधार’ के नाम पर ‘वोट अधिकार’ खत्म करने की चाल है।
सार यह है कि बिहार से शुरू हुआ यह प्रयोग पूरे देश में फैलाया जा सकता है। जिस तरह असम में एनआरसी के ज़रिए लाखों नागरिकों को संदिग्ध बनाकर परेशान किया गया था, उसी तरह एस.आई.आर. भी अब उसी राह पर चलता दिख रहा है।
अगर यही तरीका जारी रहा, तो लोकतंत्र में आम नागरिक का सबसे बड़ा अधिकार — वोट देने का अधिकार — अब कागज़ और दस्तावेज़ों की दीवार में फँसकर रह जाएगा।
(साभार)




