साजिद अली । नई दिल्ली | 24 नवंबर 2025
देशभर में चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया का मकसद भले ही मतदाता सूची को सुधारना और अपडेट करना बताया गया हो, लेकिन इस प्रक्रिया की असली कीमत उन बूथ-लेवल अधिकारियों (BLOs) को चुकानी पड़ रही है जो हर दिन घर-घर भटककर इस काम को अंजाम दे रहे हैं। स्थिति यह है कि कई BLO सुबह से रात तक कागजों और मोबाइल ऐप के बीच जूझते रहते हैं, धूप, बारिश, असुरक्षित इलाकों और अभद्र व्यवहार का सामना करते हैं, और यदि वे निर्धारित लक्ष्य पूरा न कर पाएं तो उन पर कार्रवाई और FIR की धमकी दी जाती है। यह वही हालात हैं, जिन्होंने इस प्रक्रिया को एक प्रशासनिक काम से अधिक “जानलेवा मिशन” बना दिया है, जिससे जुड़ा हर व्यक्ति डर और तनाव में जी रहा है।
पश्चिम बंगाल, राजस्थान, केरल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में पिछले कुछ हफ्तों में BLOs की मौत और आत्महत्या की घटनाएँ लगातार सामने आई हैं, जिसने पूरे सिस्टम की निष्ठुरता उजागर कर दी है। नादिया जिले की एक महिला BLO ने आत्महत्या कर ली और अपने सुसाइड नोट में साफ लिखा कि वह ऑनलाइन प्रक्रिया समझ नहीं पाई, रोज़ देर रात तक काम कर रही थीं, अधिकारियों का दबाव लगातार बढ़ रहा था और वह इस अमानवीय कार्यभार को झेल नहीं सकीं। यह घटना अकेली नहीं है—कई BLO मानसिक तनाव, रक्तचाप, हार्ट अटैक और थकान के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं। यह स्थिति बताती है कि मतदाता सूची सुधार जैसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक कार्य में लगे लोगों की सुरक्षा और सम्मान का कोई ठोस प्रबंधन नहीं किया गया है।
राजस्थान के BLOs ने भी खुलकर बताया है कि उन्हें रात में असुरक्षित इलाकों में जाना पड़ता है, कई बार लोगों द्वारा दुर्व्यवहार, धमकी और घरों से भगाए जाने का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद उन पर प्रतिदिन का लक्ष्य लागू किया जाता है और चेतावनी दी जाती है कि यदि फॉर्म की संख्या पूरी नहीं हुई तो रिपोर्ट दर्ज की जाएगी या निलंबन की कार्रवाई होगी। कई BLO यह कह चुके हैं कि उन्हें “रैंकिंग” सिस्टम के तहत नंबर दिए जाते हैं और भय का वातावरण इस तरह बनाया जाता है कि वे मजबूरी में अपनी सेहत और परिवार को पीछे छोड़कर काम में लगातार लगे रहते हैं। FIR की धमकी इस प्रक्रिया को और क्रूर बना देती है, जिससे BLO न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी टूट रहे हैं।
विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा किया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस प्रक्रिया को “थोपा गया ज़ुल्म” बताते हुए कहा कि यह कोई सुधार नहीं बल्कि देश को अराजकता की ओर ले जाने वाला कदम है, जिसमें अब तक कई BLO अपनी जान गंवा चुके हैं। विपक्ष का आरोप है कि बिना पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन, स्टाफ और तकनीकी सहायता के इस प्रक्रिया को जल्दबाज़ी में लागू किया गया, जिसके कारण ज़मीनी कर्मचारियों पर असहनीय दबाव पड़ रहा है। उनका कहना है कि लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने की बजाय यह प्रक्रिया उन लोगों को कुचल रही है जो मतदाता सूची तैयार करने के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
दूसरी ओर, सरकारी अधिकारियों का कहना है कि ये “अलग-अलग दुर्भाग्यपूर्ण मामले” हैं और BLOs को सहयोग प्रदान किया जा रहा है। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिलकुल अलग है। अधिकांश BLOs बिना सुरक्षा, बिना साधन और बिना पर्याप्त तकनीकी ज्ञान के इस काम को कर रहे हैं। मोबाइल ऐप की खराबी, इंटरनेट की कमी, प्रशिक्षण का अभाव और लगातार दबाव उनकी मुश्किलों को कई गुना बढ़ा रहा है। उनके पास न तो आराम का समय है और न ही मानसिक राहत का कोई उपाय।
यह पूरा विवाद एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है—लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण काम, यानी मतदाता सूची तैयार करना, क्या उन लोगों से करवाया जाना चाहिए जिन्हें अपनी जान की कीमत पर यह काम करना पड़ रहा है? क्या सुधार के नाम पर उन कर्मचारियों को यातना देना उचित है जो देश की चुनाव प्रणाली का सबसे अहम हिस्सा हैं?
अब ज़रूरत इस बात की है कि Election Commission of India और राज्य निर्वाचन आयोग तुरंत इस प्रक्रिया की समीक्षा करें, काम का बोझ कम करें, BLOs को सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराएं, तकनीकी सहायता दें और जिनकी सेहत या जीवन इस प्रक्रिया से प्रभावित हुआ है, उनके लिए उचित मुआवजा और समर्थन सुनिश्चित करें। क्योंकि लोकतंत्र तब तक सुरक्षित नहीं कहा जा सकता, जब तक उसे संचालित करने वाले लोग ही खतरे में हों।




