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बिहार में चुप्पी, तमिलनाडु में सख़्ती —कहानी बीजेपी के ‘चुनाव ऑपरेशन विंग’ की

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नई दिल्ली 10 नवंबर 2025

भारत का लोकतांत्रिक ढांचा एक बार फिर बड़े सवालों के घेरे में है, और इस बार निशाने पर है वह संस्था जिसके कंधों पर चुनावों की निष्पक्षता की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है—चुनाव आयोग (EC)। बिहार के चुनावी माहौल में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित ₹10,000 की सीधी सहायता योजना MMRY को लेकर EC की चुप्पी अब एक राष्ट्रीय राजनीतिक विस्फोट बन चुकी है। विपक्ष का आरोप है कि यह योजना चुनावी रिश्वत का आधुनिक स्वरूप है, लेकिन चुनाव आयोग ऐसे ‘साफ़-साफ़ उल्लंघन’ के सामने भी बिलकुल शांत पड़ा रहा। यह वही EC है जिसने तमिलनाडु में बिल्कुल ऐसी ही परिस्थितियों में दो बड़ी कल्याणकारी योजनाएँ—मुफ़्त टीवी योजना और किसानों के लिए नकद सहायता—को तुरंत रोक दिया था। सवाल अब यह है कि क्या EC के नियमों का इस्तेमाल राज्य दर राज्य बदलता है, या सत्ता की जरूरतों के हिसाब से?

तमिलनाडु में EC का रुख इतना सख़्त था कि 2003, 2004 और 2011 में उसने कल्याणकारी योजनाओं पर गाज गिराते हुए साफ़ आदेश दिया कि चुनाव की अवधि में “एक भी टीवी, एक भी पैसा” मतदाताओं तक नहीं पहुँचना चाहिए। उस समय DMK और AIADMK दोनों सरकारों को EC ने कठोरता से काबू में रखा था। लेकिन वही चुनाव आयोग आज बिहार में प्रधानमंत्री की चुनावी घोषणा पर मूकदर्शक बनकर खड़ा है। न चेतावनी, न आदेश, न रोक—सिर्फ और सिर्फ खामोशी। यह वही EC है, जिसने कभी अपनी सख़्ती से देश का सम्मान कमाया था, लेकिन अब उसकी चुप्पी ने पूरे लोकतंत्र की रीढ़ पर सवाल खड़ा कर दिया है।

विपक्ष का गुस्सा यहाँ एकदम सीधा और उग्र है—उनका कहना है कि “चुनाव आयोग भी अब ED, IT और CBI की तरह बीजेपी का एक और विभाग बन चुका है।” आरोप है कि जहाँ-जहाँ बीजेपी को फायदा होता दिखता है, वहाँ EC ‘स्लीप मोड’ में चला जाता है, और जहाँ विपक्ष के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गुंजाइश होती है, वहाँ EC ‘सुपर ऐक्टिव’ हो जाता है। पिछले कई वर्षों में ED से लेकर CBI तक, सभी केंद्रीय संस्थाओं पर इसी तरह के आरोप लग चुके हैं, और अब चुनाव आयोग पर भी वही छवि चिपकती दिखाई दे रही है—एक ऐसी संस्था जो सत्ता के दबाव में अपना संवैधानिक चरित्र खो रही है।

तमिलनाडु में रोक और बिहार में मौन—यह दोहरा रवैया देश की जनता को साफ़ संकेत दे रहा है कि चुनाव आयोग की सक्रियता अब न्यायसंगत प्रक्रिया से नहीं, बल्कि राजनीतिक हिदायतों से तय हो रही है। जो योजना दक्षिण में मतदाताओं को प्रभावित करने वाली मानी गई, वही योजना बिहार में ‘कल्याणकारी’ कैसे हो सकती है? यह सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि आम नागरिक भी पूछ रहा है।

सबसे खतरनाक और चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था ही अपने मूल चरित्र—निष्पक्षता और पारदर्शिता—से डगमगाने लगे, क्योंकि फिर चुनावों की पवित्रता और लोकतंत्र की विश्वसनीयता किसके भरोसे बचेगी? जिन संस्थाओं का काम जनता और संविधान को जवाब देना है, वे अगर राजनीतिक सत्ता की जरूरतों के अनुसार कभी चुप्पी और कभी सक्रियता दिखाने लगें, तो यह लोकतंत्र की जड़ें हिलाने वाली स्थिति है। बिहार का ताज़ा मामला बताता है कि चुनाव आयोग की साख एक गहरे संकट से गुजर रही है, और यह संकट केवल किसी एक राज्य या एक चुनाव का नहीं, बल्कि पूरे भारत की लोकतांत्रिक आत्मा पर मंडराता हुआ तूफ़ान है। अब देश यह पूछने पर मजबूर है—क्या EC के नियम सबके लिए एक समान हैं या सत्ता के हिसाब से बदलते हैं? क्या संवैधानिक संस्थाएँ जनता की हैं या सरकार की? और सबसे बड़ा, सबसे भयावह सवाल—क्या भारत वाकई लोकतंत्र है, या धीरे-धीरे एक ‘प्रबंधित चुनावी तंत्र’ में बदलता जा रहा है?

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