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‘वह कभी खाली नहीं बैठती’: दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक संदेश, गृहिणियों के अधिकारों को नई ताकत

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 4 मार्च 2026

देश की न्यायपालिका से एक महत्वपूर्ण और दूरगामी संदेश सामने आया है। Delhi High Court ने अपने हालिया फैसले में गृहिणियों की भूमिका को लेकर स्पष्ट और सशक्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “वह कभी खाली नहीं बैठती।” अदालत ने माना कि घरेलू कामकाज को हल्का या गैर-उत्पादक मानना वास्तविकता से परे है।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि एक गृहिणी का दिन सुबह की पहली जिम्मेदारी से शुरू होकर देर रात तक चलता है। भोजन बनाना, घर की व्यवस्था संभालना, बच्चों की शिक्षा और देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य और भावनात्मक संतुलन का ध्यान रखना—ये सभी कार्य निरंतर और जिम्मेदारीपूर्ण श्रम हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू कार्य को “आर्थिक रूप से शून्य” मान लेना न्यायोचित नहीं है। यह श्रम भले वेतन में न दिखे, लेकिन इसका प्रत्यक्ष प्रभाव परिवार की आय, स्थिरता और सामाजिक संरचना पर पड़ता है।

मुआवजे और कानूनी अधिकारों पर असर

यह फैसला विशेष रूप से उन मामलों में अहम माना जा रहा है, जहां दुर्घटना या पारिवारिक विवादों के दौरान मुआवजे का निर्धारण किया जाता है। अदालत ने संकेत दिया कि गृहिणी की भूमिका को कमतर आंककर उसे केवल आश्रित मान लेना उचित नहीं होगा।

कानूनी जानकारों का कहना है कि इस रुख से भविष्य में मुआवजा तय करते समय घरेलू श्रम के मूल्य को अधिक गंभीरता से देखा जाएगा, जिससे महिलाओं को न्यायिक प्रक्रिया में बेहतर संरक्षण मिल सकेगा।

सामाजिक सोच पर प्रहार

अदालत की टिप्पणी केवल कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि सामाजिक सोच को चुनौती भी है। लंबे समय से घरेलू कार्य को ‘कर्तव्य’ कहकर उसकी आर्थिक और सामाजिक अहमियत को अनदेखा किया जाता रहा है। न्यायालय ने इस सोच पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए संकेत दिया कि घर संभालना भी पूर्णकालिक जिम्मेदारी है।

व्यापक प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिलाओं की गरिमा और समानता के अधिकार को मजबूत करता है। बीमा दावों, दुर्घटना मामलों और पारिवारिक विवादों में अब गृहिणी के योगदान का अधिक संतुलित और यथार्थ मूल्यांकन संभव होगा।

दिल्ली हाई कोर्ट के इस स्पष्ट संदेश ने यह स्थापित किया है कि घर चलाने वाली महिला का श्रम अदृश्य नहीं है। वह परिवार की धुरी है—और कानून भी अब इस सच्चाई को स्वीकार कर रहा है।

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