आज सार्वजनिक हुए एक आधिकारिक दस्तावेज़ ने देश की न्यायपालिका और सरकार की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। कानून और न्याय मंत्रालय (Department of Legal Affairs, Judicial Section) के दफ्तर का वह पत्र — जिसका शीर्षक और विवरण स्पष्ट रूप से दिखते हैं — 25 फ़रवरी 2025 तारीख़ का है और यह सीधे अहमदाबाद जिला एवं सत्र न्यायालय को भेजा गया है। पत्र में अमेरिकी अधिकारियों की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों के परिप्रेक्ष्य में गौतम अडानी को निर्दिष्ट पते (Shantivan Farm, Behind Karnavati Club, Gandhinagar Sarkhej Highway, Ahmedabad) पर सर्विस / समन प्रदान करने का अनुरोध किया गया है ताकि विदेशी न्यायप्राधिकरण के साथ समन्वय स्थापित किया जा सके।
पर सवाल यह है — क्या वही समन अभी तक सर्व नहीं हुआ?
दस्तावेज़ साफ़ कहता है कि परे किये गए काग़ज़ात की एक प्रति कोर्ट द्वारा सर्व कर रिपोर्ट (proof of service) के साथ भेजी जाए — और इस रिपोर्ट का अंग्रेजी अनुवाद भी अनिवार्य है। पर सार्वजनिक रिकॉर्ड, सोशल मीडिया और स्थानीय अदालत के रेकोर्ड्स की जाँच में इस अवधि के बाद भी इस समन की सर्विस/रिटर्न की कोई पारदर्शी सूचना सामने नहीं आई है।
यह राज्य और केन्द्र के बीच की एक सोची-समझी प्रक्रिया का मामला नहीं लगता — यह जानबूझकर देरी या संरक्षण जैसा दिखता है। जब विदेशों की मांग (जो कि दस्तावेज़ में खुद स्पष्ट है) पर क़दम उठाने की बात आती है, तो सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता अनिवार्य है — ख़ासकर तब जब उस पर देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों का नाम जुड़ा हो।
क्या यह केवल कानूनी पेचीदगी है या ‘रूल बुक’ के बाहर संरक्षण?
दस्तावेज़ से स्पष्ट है कि विदेशी अदालत/अधिकारी ने भारत में समन भेजकर कानूनी प्रक्रिया का अनुरोध किया।
मंत्रालय ने औपचारिक तौर पर कोर्ट से कहा — दस्तावेज़ सर्व कर रिपोर्ट भेजें — जिसका अर्थ है कि केन्द्र ने प्रक्रिया की शर्तों के अनुरूप कार्रवाई का आग्रह किया।
पर तलाशी के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि स्थानीय अदालत ने आवश्यक कार्रवाई औपचारिक रूप से रिकॉर्ड में दर्ज नहीं कराई, या कम-से-कम सार्वजनिक रूप से इसकी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई।
ये संकेत क्यों खतरनाक हैं?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोर्ट का आदेश और उसके पालन के बीच समानांतर पारदर्शिता का होना ज़रूरी है। जब भारत की न्यायिक और प्रशासनिक मशीनरी विदेशी अदालतों के समक्ष ‘समान रूप से’ कार्य नहीं करती — और ऊपर से सरकार की तरफ़ से भी अफ़वाहें चलती हैं कि कुछ मामलों में देरी जानबूझकर कराई जा रही है — तो यह केवल कानूनी नाकामी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की प्रतिष्ठा पर हमला है।
जुड़ा सवाल: दोस्तों को संरक्षण — सरकार की विफल जिम्मेदारी?
कई सवाल उठते हैं:
क्या यह देरी मात्र ब्यूक्रैसी है, या एक गणना-भरी साजिश ताकि बड़े हितधारक को कानूनी कार्रवाई से बचाया जा सके?
क्या स्थानीय अदालतों पर किसी राजनीतिक दवाब का असर दिख रहा है?
क्या केन्द्र सरकार ने स्पष्ट निर्देश देने के बाद भी कार्रवाई का पालन सुनिश्चित करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई — खासकर जब मामला विदेश के अनुरोध से जुड़ा हुआ था?
किसने चुप्पी साध दी — मंत्रालय, कोर्ट या अडानी समूह?
हमने तीनों पक्षों — Ministry of Law & Justice, Ahmedabad District Court (judicial records / registry) और Adani Group — से टिप्पणी माँगने का प्रयत्न किया।
(प्रकाशन तक) मिनिस्ट्री ने फिलहाल कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी; स्थानीय कोर्ट के रजिस्ट्री ने भी कोई स्पष्ट ऑफिशियल नोटिस साझा नहीं किया; और अडानी समूह की तरफ़ से भी सार्वजनिक स्पष्टीकरण अभी तक सामने नहीं आया।
मांगें — पारदर्शिता और जवाबदेही चाहिए
- Ahmedabad District Court को चाहिए कि वह तुरन्त सार्वजनिक करे कि उक्त समन सर्व हुआ था या नहीं — और यदि हुआ है तो सर्विस रिपोर्ट और तारीख़ें जारी की जाएँ।
- Ministry of Law & Justice को चाहिए कि वह बताये कि उसने क्या कार्रवाई की और अगर सर्विस पूरा नहीं हुआ तो क्यों नहीं — क्या किसी तरह की रोक-टोक या दबाव रहा?
- Adani Group को चाहिए कि वह सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करे कि उसे कोई समन मिला या नहीं — और यदि मिला है तो उसने किन वजहों से जवाब दर्ज नहीं किया।
- SECGov और विदेशी विनियामक संस्थाएँ (जिन्होंने अनुरोध भेजा) को भारत सरकार से स्पष्टता मांगने का अधिकार है — और लोकतंत्र में पारदर्शिता का यही तरीका है।
लोकतंत्र की जाँच का पल
यह मामला सिर्फ़ एक कानूनी तकनीक नहीं है; यह उस नैतिकता की जाँच है जो सरकार और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के रिश्तों पर जनता को विश्वास दिलाती है।
अगर नियम सभी के लिए बराबर नहीं हैं — और अगर केंद्र-प्रशासन बड़े व्यापारिक घरानों के लिए ‘अपवाद’ बना देते हैं — तो यह व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत हैं।
हम अदालतों और मंत्रालय से पारदर्शिता की तत्काल अपील करते हैं — और जनता का हक़ है कि उसे पता चले कि क्या प्रक्रिया हुई, कब हुई और किसके कहने पर देरी हुई। कोई भी व्यवस्था उस समय तक मज़बूत नहीं मानी जा सकती जब तक उसके नियम और निर्णय सबके लिए बराबर न हों — चाहे नाम कोई भी हो।





