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CJI सूर्यकांत पर भ्रष्टाचार के पुराने गंभीर आरोप फिर उठे, न्यायपालिका कटघरे में

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नई दिल्ली, 25 नवंबर 2025

देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था में नेतृत्व परिवर्तन के बीच एक बार फिर ऐसी चर्चा तेज़ हो गई है जिसने भारतीय न्यायपालिका की पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए जस्टिस सूर्य कांत पर लगे पुराने आरोपों की फाइलें फिर से खुलने लगी हैं। खास तौर पर प्रतिष्ठित खोजी पत्रकारिता के लिए पहचान रखने वाली कारवां मैगजीन की पुरानी विस्तृत रिपोर्ट एक बार फिर सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। इस रिपोर्ट में जस्टिस सूर्य कांत के करियर के शुरुआती वर्षों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक की नियुक्तियों से जुड़े कई गंभीर और चौंकाने वाले आरोप दर्ज हैं, जिन्हें उस समय अनदेखा कर दिया गया था या फिर प्रभाव और ताकत के चलते दबा दिया गया। यह पूरा मामला अब इसलिए और संवेदनशील हो गया है क्योंकि आज वही व्यक्ति देश की सर्वोच्च अदालत का शीर्ष पद संभाल रहा है और संवैधानिक महत्व के मामलों की सुनवाई कर रहा है।

कारवां मैगजीन के अनुसार वर्ष 2012 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में बतौर जज तैनात रहते हुए जस्टिस सूर्य कांत का नाम एक बड़े रियल एस्टेट सौदे में विवादित रूप से सामने आया था। एक रियल एस्टेट एजेंट ने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने कम कीमत दिखाकर करोड़ों रुपये की प्रॉपर्टी डील को वैध बनाने में मदद की और इसके बदले भारी नकद राशि प्राप्त की। एजेंट का यह भी दावा था कि इस प्रक्रिया में न केवल संपत्ति की कीमतों में हेरफेर किया गया, बल्कि पूरे लेन-देन को बेनामी और अवैध रूप से संपन्न कराया गया। इसी एजेंट ने कुछ दस्तावेज़ और कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग पेश करने का भी दावा किया था, जिनमें जस्टिस कांत के करीबी लोगों के साथ बातचीत दर्ज बताई गई। यह मामला उस समय मीडिया और कानूनी जगत में काफी चर्चा में रहा था, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कोई औपचारिक जांच आगे नहीं बढ़ी। रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस कांत की राजनीतिक और प्रशासनिक पहुंच इतनी मजबूत थी कि स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने मामले को आगे बढ़ाने में रुचि ही नहीं दिखाई और धीरे-धीरे यह पूरा विवाद दबा दिया गया।

वर्ष 2017 का मामला इन आरोपों को और भी गंभीर बना देता है। उस वर्ष पंजाब की एक जेल में बंद एक कैदी ने भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को सीधे शिकायत भेजकर दावा किया था कि जस्टिस सूर्य कांत ने आठ आपराधिक मामलों में रिश्वत लेकर जमानतें मंजूर की थीं। कैदी ने अपनी शिकायत में हर मामले का केस नंबर, तारीख, कोर्ट रूम विवरण और कथित लेन-देन की जानकारी दी थी। उसका आरोप था कि हत्या, फिरौती और ड्रग तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में शामिल आरोपियों को लाखों रुपये लेकर जमानत दी गई, जबकि वह स्वयं पैसे और प्रभाव के अभाव में जेल में सड़ रहा है। इस शिकायत को हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस को भी भेजा गया था, लेकिन उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह सवाल आज भी जस का तस मौजूद है कि इतनी विस्तृत और गंभीर शिकायत को बिना किसी जांच के कैसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इन दोनों मामलों के बावजूद वर्ष 2019 में जस्टिस सूर्य कांत को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त कर दिया गया। उस समय भी कारवां मैगजीन ने मई 2019 में एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें न केवल पुराने आरोपों का जिक्र किया गया था, बल्कि इनकम टैक्स चोरी और बेनामी संपत्तियों के नए आरोप भी शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस कांत ने अपनी संपत्ति विवरण में कई करोड़ रुपये की अघोषित आय को छिपाया था और चंडीगढ़-पंचकूला क्षेत्र में कई लग्जरी प्रॉपर्टी बेनामी नामों पर खरीदी थीं। इसके बावजूद कोलेजियम ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी और सरकार ने भी कोई आपत्ति नहीं जताई। यह सवाल आज और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की कोई जगह है या फिर प्रभावशाली पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए अलग मानदंड लागू होते हैं।

आज जब जस्टिस सूर्य कांत देश के मुख्य न्यायाधीश बन चुके हैं और संवैधानिक बेंच में बैठकर महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय ले रहे हैं, तब इन पुराने मामलों का फिर से उठना भारतीय न्याय व्यवस्था की साख पर गहरी चोट के रूप में देखा जा रहा है। न्यायपालिका को देश में लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है, लेकिन यदि इसी स्तंभ पर भ्रष्टाचार, पक्षपात और प्रभाव के आरोप लगे रहें, तो जनता का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या इन आरोपों पर कोई स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच बैठाई जाती है या फिर एक बार फिर सब कुछ प्रभावशाली नेटवर्क के दबाव में रफा-दफा कर दिया जाएगा। यदि ऐसा हुआ, तो यह न केवल न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भारी प्रहार होगा, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए भी अत्यंत चिंताजनक संकेत साबित होगा।

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