एबीसी डेस्क, 24 दिसंबर 2025
हिंदी साहित्य आज अपने सबसे कोमल और मानवीय स्वरों में से एक को खो बैठा। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कवि, कथाकार और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उपचाररत थे। मंगलवार शाम लगभग 4:58 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। एम्स प्रशासन के अनुसार, उम्र संबंधी जटिलताओं के साथ-साथ गंभीर निमोनिया और सांस की तकलीफ से वे जूझ रहे थे।
1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में थे, जिनकी लेखनी शोर नहीं करती, बल्कि धीरे-धीरे पाठक के भीतर उतर जाती है। उनकी कविताओं और कथाओं में साधारण जीवन की असाधारण संवेदना बसती थी। वे बड़े विचारों को छोटे, बेहद सादे शब्दों में कहने के लिए जाने जाते थे। उनकी पंक्तियाँ— “हताशा को जानता था, इसलिए पास गया…”—जैसे जीवन की उदासी से डरने के बजाय उसे समझने और सहलाने का साहस देती हैं।
शुक्ल जी की रचनात्मक दुनिया आम आदमी की रोज़मर्रा की जिंदगी से बनी थी—नौकरी, घर, सड़क, दीवार, खिड़की, कपड़े, मौसम—लेकिन इन्हीं साधारण चीज़ों के भीतर वे गहरे दर्शन और करुणा खोज लेते थे। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ न केवल साहित्यिक हलकों में चर्चित हुआ, बल्कि मशहूर फिल्मकार मणि कौल द्वारा फिल्माए जाने के बाद व्यापक दर्शकों तक भी पहुंचा। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, जो उनकी रचनात्मक ऊंचाई का प्रमाण है।
उनकी अन्य उल्लेखनीय कृतियों में ‘लगभग जयहिंद’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और कविता संग्रह ‘वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह’ शामिल हैं। इन रचनाओं ने उन्हें न केवल हिंदी के पाठकों का प्रिय बनाया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई। वर्ष 2024 में उन्हें 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया—छत्तीसगढ़ से यह सम्मान पाने वाले वे पहले साहित्यकार थे। यह सम्मान उनके शांत, लेकिन गहरे प्रभाव वाले साहित्यिक योगदान की औपचारिक स्वीकृति थी।
उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, “ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। हिंदी साहित्य जगत में अपने अमूल्य योगदान के लिए वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।”
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी इसे साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया और कहा कि शुक्ल जी की संवेदनशील दृष्टि और मौलिक भाषा-शैली आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
विनोद कुमार शुक्ल का जाना केवल एक लेखक का जाना नहीं है, उस संवेदनशील दृष्टि का जाना है, जो जीवन की मामूली-सी लगने वाली बातों में भी मनुष्यता का उजाला देख लेती थी। हालांकि वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं—वो खिड़की, वो कमीज़, वो सरल और गहरे शब्द—हमेशा हमें यह याद दिलाते रहेंगे कि साहित्य का सबसे बड़ा काम मनुष्य को मनुष्य के करीब लाना होता है।
हिंदी साहित्य, उनके परिवार, प्रशंसकों और पाठकों के प्रति गहरी संवेदनाएं। ॐ शांति।




