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भारतीय शेयर बाजार में सनसनी, विदेशी निवेशकों के पलायन से निवेशकों का बड़ा घाटा

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लेखक: प्रोफेसर शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री

विदेशी निवेशकों का ₹1.16 लाख करोड़ का पलायन: क्या भारत निवेशकों के लिए ‘नो-गो जोन’ बन गया है?

2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से अब तक लगभग ₹1.16 लाख करोड़ की निकासी की है, जो भारतीय बाजारों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अगस्त के पहले पखवाड़े में ही FPIs ने ₹21,000 करोड़ निकाले, जिससे निवेशकों के बीच असुरक्षा और डर की भावना और गहरी हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक ‘मार्जिनल रिबैलेंसिंग’ नहीं है, बल्कि भारतीय बाजारों में विदेशी निवेशकों के विश्वास में गंभीर कमी को दर्शाता है। निवेशकों की मानसिकता पर यह प्रभाव लंबी अवधि तक बना रह सकता है और बाजार की स्थिरता पर संकट उत्पन्न कर सकता है। इस प्रक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी निवेशकों की निकासी की स्थिति में भारतीय शेयर बाजार अत्यधिक संवेदनशील है।

एक दिन में ₹5 लाख करोड़ का नुकसान: भारतीय बाजारों का ब्लैक फ्राइडे

8 अगस्त 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ़ की घोषणा के बाद भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त गिरावट देखने को मिली। BSE सेंसेक्स 765 अंक (0.95%) गिरकर 79,857.79 पर बंद हुआ, जबकि Nifty 50 भी 232.85 अंक (0.95%) गिरकर 24,363.30 पर आ गया। इस एक दिन की गिरावट ने निवेशकों की संपत्ति में लगभग ₹5 लाख करोड़ की कमी कर दी, जो भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में एक गंभीर संकट और काले दिन के रूप में दर्ज की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नुकसान केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि निवेशकों के विश्वास और बाजार की स्थिरता पर गहरा असर डालने वाला है।

अमेरिकी टैरिफ़ और वैश्विक मंदी: भारतीय बाजारों पर दोहरी मार

अमेरिकी टैरिफ़ की घोषणा के बाद भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौतियाँ और बढ़ गई हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, जिससे संबंधित कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई। इसके अलावा, वैश्विक मंदी और अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने भारतीय रुपये को दबाव में डाल दिया, जिससे विदेशी निवेशकों का विश्वास और कमजोर हुआ। निवेशकों की धारणा है कि वैश्विक परिस्थितियों और अमेरिकी नीतियों का भारतीय शेयर बाजार पर अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। बाजार में लगातार अस्थिरता और अनिश्चितता ने निवेशकों को सतर्क रहने के लिए मजबूर कर दिया है।

 घरेलू संस्थागत निवेशकों का समर्थन: कितनी राहत मिली?

घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने विदेशी निवेशकों की निकासी के बावजूद बाजार में ₹55,795 करोड़ का निवेश किया। यह निवेश कुछ हद तक बाजार को स्थिर करने में सफल रहा, लेकिन यह विदेशी निवेशकों की निकासी की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं था। विशेषज्ञों का मानना है कि DIIs का यह योगदान केवल अस्थायी राहत प्रदान कर सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए विदेशी निवेशकों का विश्वास और निवेश आवश्यक है। बाजार के वर्तमान संकट को देखते हुए यह स्पष्ट है कि घरेलू संस्थानों का योगदान ही पूरी तरह से भरोसा दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

कृषि और अमेरिकी दबाव: भारत का कड़ा रुख़

हालांकि अमेरिकी टैरिफ़ को बाजार गिरावट का मुख्य कारण माना जा रहा है, लेकिन असली वजह भारत की कृषि और डेयरी नीति में अमेरिका के दबाव को ठुकराना भी है। भारत ने अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने कृषि और डेयरी उत्पादों का मुक्त प्रवाह नहीं अपनाया है और जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड खाद्य उत्पादों पर प्रतिबंध जारी रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा है, “हमारे लिए हमारे किसानों का कल्याण सर्वोपरि है।” इस नीति के चलते अमेरिकी अनाज, फल और डेयरी आयात बंद हैं, जो न केवल बाजार बल्कि राजनीतिक स्थिरता के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

नीतिगत सुधार: क्या यह निवेशकों का विश्वास वापस ला पाएंगे?

सरकार ने आर्थिक पैकेज में $20 बिलियन की घोषणा की है, जिसमें GST सुधार, घरेलू खपत बढ़ाने के उपाय और वित्तीय संस्थाओं को राहत देने वाले कदम शामिल हैं। SEBI ने ब्लॉक डील और क्लोजिंग ऑक्शन सत्र (CAS) जैसी नई नीतियां लागू की हैं। ये कदम बाजार को स्थिर करने के लिए उठाए गए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये सुधार केवल अस्थायी राहत प्रदान कर सकते हैं। दीर्घकालिक स्थिरता तब ही संभव होगी जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और विदेशी निवेश दोनों हाथ मिलाएँ। इस संदर्भ में यह स्पष्ट है कि सरकार की नीति निवेशकों की उम्मीदों को केवल थोड़े समय के लिए संतुष्ट कर सकती है।

 वैश्विक दबाव और ट्रेड युद्ध: भारत की परीक्षा

भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिकी टैरिफ़, चीन और रूस के साथ द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक मंदी की चुनौती झेल रही है। किसी भी समय ट्रम्प–पुतिन बैठक, भारत–चीन या भारत–रूस शिखर वार्ता, या QUAD बैठक बाजार की दिशा बदल सकती है। WTO की स्थिरता पर भी सवाल उठ रहे हैं। भारत ने ट्रम्प के टैरिफ़ पर अपना रुख़ मजबूती से रखा है, लेकिन वार्ता का अंत अभी अनिश्चित है। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ और द्विपक्षीय संघर्ष भारतीय बाजारों पर लंबे समय तक प्रभाव डाल सकते हैं।

निर्यात और निवेश में हल्की रौशनी: उम्मीद की किरण

हालांकि बाजार अस्थिर है, लेकिन भारत के कुल निर्यात में वृद्धि हुई है, खासकर इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा में। IMF ने 2025 के लिए 6.7% और 2026 के लिए 6.4% विकास का अनुमान लगाया है। भारतीय शेयर बाजार ने 1992 से अब तक कई संकट झेले हैं और हर बार उबरकर खड़ा हुआ है। यही निवेशकों के लिए आशा की किरण है कि वैश्विक दबावों और अमेरिकी टैरिफ़ के बावजूद भारत का आर्थिक परिदृश्य स्थिर रह सकता है।

सतर्क निवेश ही समाधान

भारतीय शेयर बाजार वर्तमान में गंभीर संकट का सामना कर रहा है। विदेशी निवेशकों की निकासी, अमेरिकी टैरिफ़, वैश्विक मंदी और घरेलू नीतिगत चुनौतियाँ निवेशकों के लिए चिंता का विषय हैं। हालांकि सरकार ने कुछ सुधारात्मक कदम उठाए हैं, दीर्घकालिक स्थिरता के लिए वैश्विक और घरेलू दोनों मोर्चों पर संतुलित नीतियाँ आवश्यक हैं। निवेशकों को सतर्क रहकर और सूझबूझ से निवेश निर्णय लेने की आवश्यकता है, क्योंकि भारतीय बाजार अभी भी बड़े झटकों के प्रति संवेदनशील है।

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