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सऊदी का ‘स्टेल्थ’ प्लान — F-35 सौदे पर चर्चा से मचा भूचाल, इज़राइल की हवाई बढ़त को सीधी चुनौती

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अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 8 नवंबर 2025

मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन का नया दौर शुरू होने जा रहा है। सऊदी अरब ने अब अमेरिका से अत्याधुनिक F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट्स खरीदने की औपचारिक पहल की है, जिससे न केवल इज़राइल की वायु बढ़त को सीधी चुनौती मिलेगी बल्कि पूरा पश्चिम एशिया एक नए सामरिक संतुलन में प्रवेश कर जाएगा। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की यह योजना उस भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा का हिस्सा है जिसके तहत सऊदी अरब खुद को केवल ऊर्जा शक्ति नहीं बल्कि सैन्य और तकनीकी महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है।

रिपोर्टों के अनुसार, क्राउन प्रिंस सलमान इस महीने के अंत में अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे, जहाँ वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस संभावित सौदे पर चर्चा करेंगे। यदि यह सौदा पक्का हो गया, तो सऊदी अरब F-35 खरीदने वाला पहला अरब देश बन जाएगा — और यही बात इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की चिंता का मुख्य कारण बन चुकी है। क्योंकि अब तक इज़राइल ही मध्य पूर्व का एकमात्र देश था जिसके पास अमेरिका द्वारा निर्मित पाँचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट्स थे।

सऊदी की मांग क्यों बढ़ी? पृष्ठभूमि में है युद्ध और भय:

इस वर्ष की शुरुआत में 12 दिन तक चले इज़राइल-ईरान युद्ध ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा गणना बदल दी। इज़राइल के F-35 जेट्स ने तेहरान के भीतर गहराई तक हमले कर दिखाया कि उसकी हवाई क्षमता पूरे क्षेत्र में अप्रतिरोध्य है। इन हमलों के बाद सऊदी, तुर्की, क़तर और मिस्र जैसे देशों में हड़कंप मच गया और सभी ने अपनी वायु शक्ति को अपग्रेड करने की दिशा में प्रयास तेज़ कर दिए।

सऊदी अरब की तत्कालिक चिंता ईरान-समर्थित हूथी विद्रोही हैं, जिन्होंने पिछले वर्षों में यमन से रियाद और तेल संयंत्रों पर मिसाइलें और ड्रोन हमले किए हैं। ऐसे में F-35 जैसी स्टेल्थ क्षमता सऊदी को वह शक्ति देगी जिससे वह दूरस्थ लक्ष्यों पर बिना पकड़े सटीक प्रहार कर सके। यह केवल रक्षा सौदा नहीं बल्कि एक सामरिक संदेश है — कि रियाद अब किसी भी खतरे का जवाब आधुनिक तकनीक से देगा, न कि पुराने हथियारों से।

अमेरिका की भूमिका — राजनीति, सौदा और रणनीति का मेल:

अमेरिका ने पहले भी सऊदी अरब के साथ 142 बिलियन डॉलर का विशाल रक्षा समझौता किया था, जिसमें मिसाइल डिफेंस सिस्टम, एयरफोर्स टेक्नोलॉजी, समुद्री सुरक्षा और कम्युनिकेशन नेटवर्क शामिल थे — लेकिन F-35 को इससे अलग रखा गया था। कारण था — इज़राइल की सुरक्षा गारंटी। अब, ट्रंप प्रशासन इसे दोबारा विचाराधीन लाने को तैयार दिख रहा है, क्योंकि व्हाइट हाउस सऊदी को “सबसे बड़ा अरब सहयोगी” मानता है।

पेंटागन और डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर ने भी इस सौदे के लिए हरी झंडी दे दी है। माना जा रहा है कि सऊदी लगभग 48 F-35 विमानों का बेड़ा खरीदने की योजना बना रहा है। हालांकि, यह सौदा “राजनीतिक” शर्तों से जुड़ा है। पिछली बाइडन प्रशासन ने सऊदी से यह मांग की थी कि अगर वह F-35 चाहती है, तो उसे पहले इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने होंगे। अब, चूंकि ट्रंप “अब्राहम समझौते” के जनक माने जाते हैं, इसलिए यह माना जा रहा है कि वे भी इसी तरह की शर्त रखेंगे — यानी “शांति के बदले सुरक्षा।”

भू-राजनीति की बिसात — रियाद का लक्ष्य और इज़राइल की बेचैनी:

रियाद का असली लक्ष्य सिर्फ़ हूथी विद्रोहियों या ईरान को रोकना नहीं है। यह सौदा पूरे क्षेत्र में इज़राइल के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में है। 2023 में सऊदी और अमेरिका के बीच इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने की वार्ता लगभग अंतिम चरण में थी, लेकिन 7 अक्टूबर के हमास हमले ने उस प्रक्रिया को रोक दिया। अब सऊदी अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को दोबारा परिभाषित कर रहा है — “अगर शांति रुक गई, तो सुरक्षा तेज़ होगी।”

विश्लेषकों का मानना है कि यह सौदा केवल तकनीकी नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति का प्रतीक भी है। F-35 जैसे स्टेल्थ जेट्स केवल हथियार नहीं, बल्कि “एयर सुप्रीमेसी” का बयान हैं — और अगर यह तकनीक सऊदी के पास आती है, तो इज़राइल की क्षेत्रीय बढ़त को पहला वास्तविक झटका लगेगा।

सऊदी की सैन्य क्षमता पहले से ही मज़बूत:

फिलहाल सऊदी एयरफोर्स के पास F-15 स्ट्राइक ईगल्स, टॉर्नेडो IDS और यूरोफाइटर टाइफून जैसे आधुनिक जेट्स हैं। लेकिन ये सभी चौथी पीढ़ी के विमान हैं, जो अब स्टेल्थ युद्ध के युग में पर्याप्त नहीं माने जाते। F-35 में रडार से अदृश्य रहने की तकनीक, हाइपर टारगेटिंग सिस्टम और AI संचालित मिसाइल नियंत्रण जैसी क्षमताएँ हैं, जो किसी भी प्रतिद्वंदी को अंधेरे में रख सकती हैं।

सऊदी ने तुर्की से KAAN फाइटर जेट खरीदने की योजना भी बनाई थी, लेकिन अगर अमेरिका से F-35 सौदा तय हो जाता है तो रियाद उस योजना को रद्द कर देगा। यह सीधे तौर पर तुर्की और रूस जैसे देशों के लिए आर्थिक और कूटनीतिक झटका साबित होगा, जो सऊदी के साथ रक्षा क्षेत्र में घुसने की कोशिश कर रहे थे।

क्यों यह “नेटन्याहू” के लिए बड़ी परेशानी है?

इज़राइल दशकों से अमेरिका का सबसे विशेष सैन्य साझेदार रहा है, और उसे दी जाने वाली हर तकनीक पर वॉशिंगटन सख्त नियंत्रण रखता आया है। लेकिन अब अगर वही स्टेल्थ जेट्स रियाद को मिलते हैं, तो इज़राइल की “एयर शील्ड” नीति कमजोर पड़ सकती है। नेटन्याहू सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उसने अपने देश की हवाई शक्ति को पूरे क्षेत्र में अद्वितीय बनाए रखा। सऊदी सौदा उस संतुलन को तोड़ देगा — जिससे इज़राइल को न केवल सामरिक बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव का भी सामना करना पड़ेगा।

 शक्ति, सौदे और शांति के बीच खिंची रेखा:

यह सौदा अगर तय हो गया, तो यह मध्य पूर्व की भू-राजनीति का अगला टर्निंग पॉइंट होगा। जहाँ एक ओर सऊदी अरब अपनी रक्षा और आक्रामक क्षमता को पाँचवीं पीढ़ी की तकनीक तक पहुँचा देगा, वहीं इज़राइल और ईरान दोनों को अपनी रणनीतियाँ नए सिरे से लिखनी पड़ेंगी। यह केवल एक F-35 डील नहीं, बल्कि भविष्य के शक्ति समीकरण का संकेत है — जिसमें अमेरिका मध्यस्थ है, सऊदी निर्णायक खिलाड़ी, और इज़राइल संभावित चिंतित पर्यवेक्षक।

2026 से पहले यदि यह समझौता मूर्त रूप ले लेता है, तो मध्य पूर्व की आकाश रेखा बदल जाएगी — और इसके साथ ही सऊदी अरब का नाम सिर्फ़ तेल और तीर्थों से नहीं, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक और रणनीतिक प्रभुत्व से भी जुड़ जाएगा। दुनिया अब देख रही है कि क्या वाकई “क्राउन प्रिंस सलमान” इस आसमान में भी अपना झंडा गाड़ पाएँगे। 

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