भारत की महान टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने हाल ही में पैरेंटिंग पर एक बेहद संवेदनशील और दिल को छू लेने वाला बयान दिया। उन्होंने बताया कि उनके बेटे इजहान मिर्जा मलिक के जन्म से पहले ही लोग सवाल पूछने लगे थे—“आगे चलकर क्रिकेट खेलेगा या टेनिस?” यह सवाल सुनकर उन्हें महसूस हुआ कि समाज बच्चों पर कितनी जल्दी अपेक्षाओं का पहाड़ डाल देता है। सानिया का कहना है कि एक बच्चा पैदा भी नहीं होता, और लोग उसके करियर की दिशा तय करने लगते हैं—यह बिल्कुल गलत है।
सानिया ने स्पष्ट कहा कि बच्चों पर माता-पिता या समाज की इच्छाएँ थोपना गलत है, क्योंकि हर बच्चे को अपनी प्रतिभा, अपनी पसंद और अपनी दिशा खोजने की आज़ादी मिलनी चाहिए। उन्होंने बताया कि वे अपने बेटे को सबसे पहले यह सिखाती हैं कि हारना कोई समस्या नहीं — कोशिश करना ज़रूरी है। दुनिया के सबसे सफल लोग भी कभी न कभी हारते हैं, और हारने के बाद फिर उठना ही असली जीत है।
सानिया का यह बयान न सिर्फ एक खिलाड़ी या एक मां की राय है, बल्कि यह उस लंबे समय से चली आ रही भारतीय मानसिकता को भी चुनौती देता है, जहां कई माता-पिता अपने बच्चों को अपनी अधूरी इच्छाओं और उम्मीदों के बोझ तले धकेल देते हैं। यह दबाव सिर्फ एक घर या एक परिवार की कहानी नहीं होती — यह कई बार राष्ट्रीय स्तर तक दिखाई देता है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण क्रिकेट जगत में साफ दिखता है। भारत रत्न और दुनिया के सबसे महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर पर भी बचपन से ही ऐसा भारी दबाव लादा गया था कि “उन्हें भी अपने पिता जैसा महान खिलाड़ी बनना है।” मीडिया, पब्लिक और क्रिकेट जगत सभी की निगाहें उन पर थीं, हर प्रदर्शन का मूल्यांकन उनके पिता की महानता की तुलना में होता था। इस अस्वाभाविक दबाव का परिणाम यह हुआ कि अर्जुन अपनी स्वतंत्र पहचान खोजने के संघर्ष में उलझ गए। वे निश्चित रूप से प्रतिभाशाली हैं, लेकिन वह रास्ता कभी खुलकर नहीं चल पाए, जो उनके पिता के लिए स्वाभाविक रूप से बना था — और इसीलिए आज तक उन्हें भारतीय टीम में जगह तक नहीं मिल पाई।
इसी तरह दिग्गज भारतीय बल्लेबाज सुनील गावस्कर के बेटे रोहन गावस्कर का उदाहरण भी सामने आता है। उनसे भी उम्मीद थी कि वे अपने पिता की तरह भारतीय क्रिकेट के स्तंभ बनेंगे, लेकिन उन पर भी वही दबाव हावी रहा—“पिता जैसा बनो।” रोहन गावस्कर भारतीय टीम का हिस्सा बने जरूर, लेकिन लंबे समय तक जगह पक्की न कर पाए। उनका सबसे सुनहरा क्षण 1992 वर्ल्ड कप के दौरान आया, जब उन्होंने भारत की ओर से खेलते हुए एक मैच में 54 रन बनाए और 2 विकेट भी लिए। यह प्रदर्शन आज भी उनके करियर का सबसे यादगार अध्याय माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद वे उससे आगे नहीं बढ़ पाए—क्योंकि तुलना की दीवार बहुत ऊँची थी।
ये दोनों उदाहरण इस बात का प्रमाण हैं कि बच्चे चाहे कितने भी प्रतिभाशाली क्यों न हों, माता-पिता की उपलब्धियों का बोझ उनकी उड़ान रोक सकता है। सचिन और गावस्कर जैसे महान खिलाड़ियों के बच्चों तक पर जब यह दबाव हावी हो सकता है, तो सामान्य परिवारों में बच्चों के साथ क्या-क्या होता होगा—यह सहज ही समझा जा सकता है।
सानिया मिर्जा का बयान इसी गहरे सच की ओर इशारा करता है। एक मां, एक खिलाड़ी और एक स्वतंत्र सोच रखने वाली महिला के रूप में उन्होंने कहा, “बच्चों को अपनी पसंद की राह चुनने दीजिए। माता-पिता का काम उन्हें ढालना नहीं — उन्हें आज़ादी देना है।”
आज जब सानिया अपने बेटे के साथ दुबई में रहती हैं, अपने पति शोएब मलिक से अलग होकर एकल मातृत्व निभा रही हैं, तब उनके शब्द जीवन के अनुभव और गहरी समझ से भरे हुए लगते हैं। वे हर दिन अपने बेटे को यह सिखाने की कोशिश करती हैं कि जीवन में जीत या हार का नहीं, बल्कि साहस और प्रयास का महत्व है।
और इसी अनुभव से उठता है वह अंतिम सवाल—
आख़िरकार सवाल हम सबके सामने वही खड़ा है—क्या बच्चों को अपनी इच्छाओं के अनुसार ढाला जाए, या उन्हें अपनी रुचि का रास्ता चुनने की पूरी आज़ादी मिले?
यह चर्चा न सिर्फ खेल की दुनिया में, बल्कि हर घर, हर स्कूल, हर परिवार में होने की ज़रूरत है।




