एबीसी नेशनल न्यूज | जिनेवा | 18 फरवरी 2026
करीब चार वर्षों से जारी युद्ध के बीच रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधियों के बीच हुई ताज़ा शांति वार्ता बिना किसी बड़े समझौते के समाप्त हो गई। दोनों पक्षों ने बातचीत को “कठिन” और “तनावपूर्ण” बताया, हालांकि संवाद जारी रखने पर सहमति जताई गई है।
स्विट्जरलैंड के शहर जिनेवा में आयोजित इस बैठक से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उम्मीद थी कि शायद युद्धविराम या मानवीय राहत के मुद्दों पर कोई ठोस प्रगति हो सकेगी। लेकिन वार्ता के बाद जारी आधिकारिक बयानों से स्पष्ट है कि प्रमुख राजनीतिक और सैन्य मुद्दों पर मतभेद अब भी गहरे हैं।
यूक्रेन के राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy ने कहा कि उनकी प्राथमिकता देश की क्षेत्रीय अखंडता और ठोस सुरक्षा गारंटी सुनिश्चित करना है। उन्होंने दोहराया कि यूक्रेन अपनी अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सीमाओं से पीछे हटने को तैयार नहीं है और किसी भी समझौते में उसकी संप्रभुता सर्वोपरि रहेगी।
वहीं रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin की ओर से आई प्रतिक्रिया में वार्ता को “व्यावहारिक लेकिन जटिल” बताया गया। रूसी पक्ष का कहना है कि सुरक्षा संबंधी उसकी चिंताओं और मौजूदा जमीनी हालात को स्वीकार किए बिना किसी स्थायी समाधान तक पहुंचना संभव नहीं है।
मुख्य मतभेद क्या हैं?
वार्ता के दौरान जिन मुद्दों पर सबसे अधिक असहमति रही, उनमें पूर्वी यूक्रेन के क्षेत्रों का नियंत्रण, संभावित युद्धविराम की शर्तें और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा गारंटी शामिल हैं। यूक्रेन जहां अपने कब्जे वाले सभी क्षेत्रों की वापसी की मांग कर रहा है, वहीं रूस अपने नियंत्रण वाले इलाकों पर रुख नरम करने के संकेत नहीं दे रहा।
इसके अलावा युद्धबंदियों की अदला-बदली, नागरिकों की सुरक्षित निकासी और मानवीय सहायता के मार्ग खोलने जैसे विषयों पर भी व्यापक सहमति नहीं बन पाई। हालांकि सूत्रों के मुताबिक तकनीकी स्तर की बातचीत जारी रखने पर सहमति बनी है, जिससे संवाद की प्रक्रिया पूरी तरह ठप न हो।
राजनयिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इस दौर की वार्ता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंची, लेकिन बातचीत का जारी रहना ही फिलहाल सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। आने वाले हफ्तों में विशेषज्ञ स्तर की बैठकों और संभावित नए प्रस्तावों पर चर्चा की संभावना जताई जा रही है।
लंबे समय से जारी संघर्ष, बढ़ते आर्थिक दबाव और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच यह साफ है कि शांति की राह अब भी जटिल और लंबी है। फिलहाल दुनिया की निगाहें अगले वार्ता दौर पर टिकी हैं, जहां शायद गतिरोध तोड़ने की नई कोशिश की जाएगी।




